रूमी कहते हैं, ‘एक दीपक बनो, एक जीवन-नौका बनो और एक सीढ़ी बनो। किसी की आत्मा के घाव भरने में सहायता करो। अपने घर से ऐसे निकलो, जैसे कोई चरवाहा अपने झुंड का मार्गदर्शन करने निकलता है।’ इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे एक और पंक्ति याद आ जाती है, जिसे मैंने कभी पढ़ा था। उसमें एक विद्यार्थी अपने शिक्षक से कहता है, ‘मुझे इतना दिखाओ कि मैं तुम्हारे कंधों पर खड़ा होकर आगे देख सकूं। अपने ज्ञान का ऐसा प्रकाश दो कि मैं कुछ नया बन सकूं। मुझ पर अपना ज्ञान मत थोपो, मुझे अज्ञात की खोज करने दो और अपनी खोजों का स्वयं स्रोत बनने दो। जो ज्ञात है, वह मेरी मुक्ति बने, मेरी गुलामी नहीं।’
इन विचारों ने मुझे यह सिखाया कि शिक्षा से ही जीवन सुंदर बनता है। एक सच्चा शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं होता, बल्कि वह नए विचारों का संवाहक, नवाचार का प्रेरक और स्वतंत्र चिंतन का मार्गदर्शक होता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो मन को प्रज्वलित करे, कल्पनाशक्ति को उड़ान दे व व्यक्ति को नए विचारों के सृजन के लिए प्रेरित करे। सीखने से रचनात्मकता आती है, रचनात्मकता से विचार जन्म लेते हैं, विचार ज्ञान प्रदान करते हैं, और ज्ञान आपको महान बनाता है। एक शिक्षक का लक्ष्य किताबें पढ़ाने के साथ बच्चों के चरित्र का निर्माण करना तथा उनमें मानवीय मूल्यों का विकास करना भी होना चाहिए, ताकि वे निर्भीक होकर सोच सकें, प्रश्न कर सकें और सृजनात्मकता के विकास कर सकें।
शिक्षा एक अनंत यात्रा है। यह यात्रा मनुष्य को संकीर्णताओं, ईर्ष्या, द्वेष और वैमनस्य से ऊपर उठाकर मानवता के उच्चतम आदर्शों तक पहुंचाती है। सच्ची शिक्षा व्यक्ति के आत्मसम्मान को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे विश्व के लिए उसे एक मूल्यवान संपदा भी बना देती है। यदि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के भीतर ज्ञान के साथ-साथ जिज्ञासा, करुणा और नवाचार की ज्योति जला दें, तो वे केवल सफल नागरिक ही नहीं, बल्कि बेहतर इन्सान भी तैयार करेंगे। और जब शिक्षा का यह वास्तविक उद्देश्य हर व्यक्ति के जीवन में उतर जाएगा, तब यह संसार वास्तव में एक बेहतर और अधिक सुंदर स्थान बन सकेगा।