इजरायल और ईरान के बीच का तनाव, वैचारिक और भू-राजनीतिक मतभेदों से उपजा है, जो हाल के वर्षों में खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यह संघर्ष, जो कभी गुप्त अभियानों और प्रॉक्सी युद्धों तक सीमित था, अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में बदल चुका है। ईरान, एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति, इस संघर्ष को और जटिल बनाता है।
इजरायल और ईरान के बीच का संघर्ष एक जटिल और खतरनाक खेल है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी शक्ति और संकल्प का प्रदर्शन कर रहे हैं। 2019 से 2025 तक, यह छाया युद्ध से प्रत्यक्ष टकराव में बदल गया है। ईरान की क्षेत्रीय शक्ति और वैश्विक प्रभाव इसे एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाते हैं, जिसके साथ टकराव के परिणाम केवल मध्य पूर्ण तक सीमित नहीं रहेंगे। ।
क्षेत्रीय युद्ध, परमाणु दौड़, और वैश्विक अस्थिरता के जोखिमों को देखते हुए, संयम और कूटनीति की जरूरत है, लेकिन अभी दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिखते। ।
इस्लामी क्रांति से पहले तनावमुक्त थे दोनों देश
1979 की इस्लामी क्रांति से पहले, शाह के शासनकाल में ईरान और इजरायल के बीच एक शीतल शांति थी। क्रांति के बाद, अयातुल्ला खोमैनी के नेतृत्व में ईरान ने इजरायल की वैधता को खारिज कर दिया और फिलिस्तीनी समूहों (जैसे हमास) और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों का समर्थन शुरू किया।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव इजरायल के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बन गया। दूसरी ओर, इजरायल ने गुप्त अभियानों, हत्याओं और साइबर हमलों (जैसे 2010 का स्टक्सनेट वायरस) के माध्यम से ईरान को कमजोर करने की रणनीति अपनाई।
2019: छाया युद्धों का तेज होना
2019 में इजरायल ने सीरिया, इराक और लेबनान में ईरान समर्थित ठिकानों पर हमले किए। ईरान ने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। 2020 में अमेरिका ने ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या की, जिसका इजरायल ने समर्थन किया।
उसी वर्ष ईरान के परमाणु वैज्ञानिक मोहसन फखरीजादेह की हत्या हुई, जिसके लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहराया गया। 2021 में समुद्री हमलों की श्रृंखला हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर जहाजों को निशाना बनाने का आरोप लगाया। 2022 में इजरायल और अमेरिका ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने की प्रतिबद्धता जताई।
2023: इजरायल-हमास युद्ध और क्षेत्रीय तनाव
7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल पर हमला किया, जिसमें 1,200 से अधिक लोग मारे गए। इससे गाजा में युद्ध शुरू हुआ। हिजबुल्लाह और हाउथी जैसे ईरान समर्थित समूहों ने इजरायल पर हमले किए। दिसंबर 2023 में इजरायल ने सीरिया में ईरान के एक कमांडर को मार गिराया। 2024 में तनाव चरम पर पहुंचा। अप्रैल में इजरायल ने दमिश्क में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर हमला किया, जिसके जवाब में ईरान ने इजरायल पर 300 से अधिक ड्रोन और मिसाइलें दागीं।
जुलाई में हमास नेता इस्माइल हनियाह की तेहरान में हत्या और सितंबर में हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की बेरूत में हत्या ने स्थिति को और गंभीर किया। अक्टूबर में ईरान ने 180 मिसाइलों से इजरायल पर दूसरा हमला किया। इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ जमीनी अभियान शुरू किया।
2025: ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला
12 जून 2025 को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने ईरान को परमाणु दायित्वों का उल्लंघन करने वाला घोषित किया। अगले दिन इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों और सैन्य सुविधाओं पर हमले किए। तेहरान में विस्फोट हुए, और ईरान की हवाई रक्षा प्रणाली क्षतिग्रस्त हो गई। ईरान ने जवाबी कार्रवारी का वादा किया, लेकिन उसकी क्षमता सीमित दिख रही है।
दीर्घकालिक प्रभाव: ईरान की स्थिति का महत्व
ईरान कोई मामूली देश नहीं है। यह एक ऊर्जा महाशक्ति है, जिसके पास विशाल तेल भंडार, एक मजबूत वैचारिक आधार, और क्षेत्रीय प्रभाव है। ईरान की जवाबी कार्रवाही, चाहे प्रत्यक्ष या प्रॉक्सी के माध्यम से, एक बहु-मोर्चा युद्ध को जन्म दे सकती है। हिजबुल्लाह या हाउथी के हमले लेबनान, सीरिया, या यमन में संघर्ष को और भड़का सकते हैं।
यह क्षेत्र पहले से ही शरणार्थी संकट और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है। इजरायल के हमले ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अस्थायी रूप से कमजोर कर सकते हैं, लेकिन वे ईरान को गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित करने के लिए और प्रेरित कर सकते हैं। यह सऊदी अरब और तुर्की जैसे अन्य देशों को परमाणु हथियारों की दौड़ में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकता है, जो मध्य पूर्व को और अस्थिर करेगा।
ईरान के तेल क्षेत्र पर हमले वैश्विक तेल कीमतों को बढ़ा सकते हैं, जो पहले से ही अस्थिर हैं। लाल सागर में हाउथी हमले वैश्विक व्यापार को और प्रभावित कर सकते हैं। इससे भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएं, जो आयातित ऊर्जा पर निर्भर हैं, प्रभावित हो सकती हैं। यह संघर्ष वैश्विक शक्तियों को और विभाजित कर सकता है।
अमेरिका और उसके सहयोगी इजरायल के साथ हैं, जबकि रूस और चीन ईरान के करीब हैं। इससे संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर कूटनीतिक गतिरोध बढ़ सकता है, और वैश्विक सहयोग कमजोर हो सकता है। ईरान में आर्थिक दबाव और सैन्य झटके सरकार विरोधी प्रदर्शनों को भड़का सकते हैं। हालांकि, यह ईरान के सर्वोच्च नेता को राष्ट्रीय एकता के लिए जनता को एकजुट करने का अवसर भी दे सकता है, जिससे शासन और मजबूत हो सकता है।
भारत और एशिया के लिए इसके निहितार्थ
भारत, जो ऊर्जा का लगभग 85% आयात करता है, इस संघर्ष से सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है। तेल के दाम बढ़ने से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) और मुद्रास्फीति दोनों बढ़ सकते हैं।
खाड़ी देशों में लगभग 85 लाख भारतीय कामगार हैं। इस क्षेत्र में युद्ध की स्थिति उनके जीवन और रोजगार को खतरे में डाल सकती है। भारत के अमेरिका और इज़राइल दोनों से गहरे रक्षा संबंध हैं, वहीं ईरान से पारंपरिक ऊर्जा और भू-राजनीतिक हित जुड़े हैं। इससे भारत की “संतुलित विदेश नीति” की परीक्षा होगी।
इजरायल-ईरान संघर्ष एक नाजुक मोड़ पर
इज़राइल-ईरान संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं रहा — यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता का परीक्षा-पत्र बन चुका है। एक चिंगारी पूरे क्षेत्र को जला सकती है। ईरान की जवाबी कार्रवाही की क्षमता उसकी क्षतिग्रस्त रक्षा प्रणालियों के बावजूद बनी हुई है। हिजबुल्लाह या मिसाइलों के जरिए हमला एक क्षेत्रीय युद्ध को जन्म दे सकता है। कूटनीति के रास्ते बंद होते जा रहे हैं, क्योंकि ईरान परमाणु प्रतिबंधों को अस्वीकार करता है और इजरायल आक्रामक रुख अपनाए हुए है।
वैश्विक समुदाय के लिए, यह संघर्ष केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। यह ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा को प्रभावित करता है। भारत जैसे देशों को, जो ईरान से तेल आयात करते हैं और मध्य पूर्व में आर्थिक हित रखते हैं, इस संघर्ष के परिणामों पर नजजर रखने की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसे केवल ‘इज़राइल बनाम ईरान’ का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि सक्रिय भूमिका निभाते हुए शांति की दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए।
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