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उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा और जीवन मूल्य: अल्पाइन घाटियों में पवित्र वन, धार्मिक प्रथाएं और संरक्षण

सार

उत्तराखंड में जंगलों, घास के मैदानों और चुनिंदा स्थलों को पवित्र माना जाता है। आम मान्यताओं में से एक यह है कि देवता और पवित्र आत्माएं इन जंगलों में निवास करती हैं। इस प्रकार, इन परिदृश्यों को पवित्र उपवन या पवित्र स्थल कहा जाता है।
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उत्तराखंड में जंगलों, घास के मैदानों और चुनिंदा स्थलों को पवित्र माना जाता है। - फोटो : Chandra Singh Negi
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विस्तार
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उत्तराखंड में जंगलों, घास के मैदानों और चुनिंदा स्थलों को पवित्र माना जाता है। आम मान्यताओं में से एक यह है कि देवता और पवित्र आत्माएं इन जंगलों में निवास करती हैं। इस प्रकार, इन परिदृश्यों को पवित्र उपवन या पवित्र स्थल कहा जाता है। इसके अलावा, कई पेड़, पौधे, झाड़ियां और घास पवित्र माने जाते हैं।  

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उत्तराखंड की दोनों प्रशासनिक इकाइयों- कुमाऊं और गढ़वाल में, औपचारिक उद्देश्य के लिए स्थानीय देवता को भूमि या जंगल का एक टुकड़ा समर्पित करने का एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास है। इनमें से कई पवित्र उपवन मंदिरों या पवित्र तीर्थस्थलों के आसपास हैं।
  
चौदस, व्यास, जोहर और दारमा, उत्तराखंड की उच्च अल्पाइन घाटियों में संरक्षण में पवित्र तत्वों को शामिल करने की आवश्यकता संसाधनों की कमी से जुड़ी है। इन घाटियों के गांव उस क्षेत्र में स्थित हैं, जहां पुनर्जनन बेहद धीमा है और संसाधनों के सावधानीपूर्वक प्रबंधन की आवश्यकता है।
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उदाहरण के लिए, पवित्र वन सर्दियों के महीनों के दौरान आने वाले हिमस्खलन या पूरे वर्ष भूस्खलन से नीचे स्थित मंदिरों और गांवों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केवल मंदिर के मेलों और त्योहारों के दौरान, समुदाय को पवित्र वनों या परिदृश्यों से संसाधन लेने की अनुमति है।  

दारमा घाटी: 'आलम' स्थापित करने की परंपरा

दारमा घाटी में, गांव दुग्तु के लोग 'आलम' स्थापित करने की परंपरा का पालन करते हैं। 'आलम' स्थानीय देवता का प्रतीक है। लोक परंपरा के अनुसार, 'आलम' हर घर के सामने के आंगन में अनुष्ठानिक रूप से स्थापित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि 'आलम' शुभ शकुन, शांति और समृद्धि लाता है। हर दो या तीन साल में पुराने 'आलम' को बदल दिया जाता है।

आलम को बदलने की अवधि अलग-अलग गांवों में अलग-अलग होती है। प्रकाश सिंह दुग्ताल बताते हैं, गांव दुग्तु के लोग जुलाई के महीने में हर दो साल में आलम बदलने की परंपरा का पालन करते हैं।
 

'आलम' एक स्थानीय पेड़ की प्रजाति 'वम्बालो सिंग' का तना है, जिसे ग्रामीण दुग्तु से आठ किलोमीटर दूर बालिंग गांव के पवित्र जंगल से लाते हैं। 'आलम' लाने का जुलूस शुरू होने से पहले पुरुष और महिला दोनों अपने पारंपरिक परिधान पहनते हैं। ढोल और दमाऊ की थाप पर ग्रामीण लोकनृत्य करते हैं। गांव की एक निश्चित सीमा के बाद, महिलाएं 'चक्ति' नामक स्थानीय मादक पेय बनाने के लिए वापस लौटती हैं, जबकि पुरुष बालिंग जंगल में जाते हैं।


दुग्ताल बताते हैं-
 

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि किसी भी पेड़ को 'आलम' नहीं बनाया जा सकता। पेड़ का चयन इस बात को ध्यान में रखते हुए किया जाता है कि तना सीधा हो, ऊपर के पत्ते और शाखाएं सम हों। स्थानीय बोलचाल में, पेड़ को सुंदर दिखना चाहिए। एक बार पेड़ की पहचान हो जाने के बाद, सफेद कच्चे चावल (पुच्छुम) को पेड़ की पूजा करने के लिए हवा में उछाला जाता है। अगर किसी तरह से कुल्हाड़ी पेड़ को छूती है, तो आलम बनाने के लिए उस पेड़ को लेना अनिवार्य हो जाता है।


आलम बनाने के लिए पेड़ों की पसंद उपलब्धता के साथ बदलती रहती है। उदाहरण के लिए, दुग्तु के ऊपर के गांव उन पेड़ों का उपयोग कर सकते हैं, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने पवित्र माना है। 'आलम' बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य पेड़ हैं 'सल्दी सिंग' (देवदार), बिल सिंग (जूनिपेरस इंडिका), स्यालपा (बांज), और श्या सिंग (भोजपत्र या बुटिलिस)। दुग्तु गांव की स्थानीय बोली में 'सिंग' का मतलब लकड़ी होता है। 

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'आलम' बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य पेड़ हैं 'सल्दी सिंग' (देवदार), बिल सिंग (जूनिपेरस इंडिका), स्यालपा (बांज), और श्या सिंग (भोजपत्र या बुटिलिस)। - फोटो : Chandra Singh Negi
आलम को वापस लाते समय कई सावधानियां बरती जाती हैं। आलम टूटा-फूटा, मुड़ा-तुड़ा नहीं होना चाहिए और न ही उसे लांघना चाहिए।

जोहार घाटी: ''सिङ्ग-गु-ल्हा'

जनपद पिथौरागढ़ की मुनस्यारी तहसील के मल्ला जोहार निवासी सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी सुरेन्द्र सिंह पांगती के अनुसार क्षेत्र के सभी 14 राजस्व ग्रामों के अपने-अपने पवित्र वन हैं।

स्थानीय बोलचाल में, इन पवित्र उपवनों या जंगलों को 'सिङ्ग-गु-ल्हा' के नाम से जाना जाता है। शब्द ''सिङ्ग-गु-ल्हा' तिब्बती भाषा में निहित है, जिसका अर्थ है सिङ्ग=जंगल/लकड़ी; गु=संरक्षित वन; ल्हा=देवत्व या भगवान के नाम पर।

उदाहरण के लिए, रालम गांव के जंगल में एक विशाल 'सिङ्ग-गु-ल्हा’ था, लेकिन पलायन के साथ, ये गांव अब भूतिया हो गए हैं। जोहार घाटी का अंतिम गांव मिलम है। स्नोलाइन (मिलम ग्लेशियर) से ठीक पहले, गांव मर्तोली में एक बर्च जंगल है। यहीं पर नंदा देवी का प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित है।

वर्ष में एक बार जुलाई-अगस्त के महीने में नंदा-अष्टमी के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है। राजकीय फूल, 'ब्रह्मकमल', मर्तोली के ऊपर जंगल में उगता है। केवल त्योहार के समय में, स्थानीय लोगों को देवी को चढ़ाए जाने वाले पके फूलों को तोड़ने की अनुमति होती है।

इन पवित्र वनों के बारे में कई लोक कथाएं और वर्जनाएं प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी इन जंगलों में प्रवेश करता है या इन वनों की वनस्पतियों और जीवों को नुकसान पहुंचाता है, वह देवता के क्रोध को आमंत्रित करता है।

एक शिकारी के बारे में ऐसी ही एक कहानी मेरी मां ने सुनाई थी, पांगती बताते हैं-

उसने गलती से एक 'खासी' (देवी नंदा को चढ़ाया गया बकरा) मार डाला। शिकारी उसी दिन अपने घर लौटने से पहले ही मर गया।


हल्द्वानी स्थित शोधकर्ता चंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि गर्भवती और मासिक धर्म वाली महिलाओं को पवित्र जंगलों या स्थलों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। इनमें से कई पवित्र वन जंगल ताजे पानी के स्रोत हैं। नेगी को लगता है कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को रोकने का कारण हाइजीन के उद्देश्य से हो सकता है।

व्यास घाटी  

अल्मोड़ा स्थित जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट ने 2017 में एक पेपर प्रकाशित किया था, जिसमें व्यास घाटी में प्रथाओं का दस्तावेजीकरण किया गया था। पवित्र वनों में प्रवेश प्रतिबंधित है। ग्रामीण पेड़ों को काटने से परहेज करते हैं, लेकिन जंगल से चारे और ईंधन की लकड़ी के लिए गिरी हुई पत्तियों या टहनियों को इकट्ठा कर सकते हैं।

निष्कर्ष जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल प्लानिंग एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित हुए थे। इसके अलावा, जिन पेड़ों पर सफेद या लाल झंडे लगे होते हैं, उन्हें काटा नहीं जाता।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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