'आलम' बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य पेड़ हैं 'सल्दी सिंग' (देवदार), बिल सिंग (जूनिपेरस इंडिका), स्यालपा (बांज), और श्या सिंग (भोजपत्र या बुटिलिस)।
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आलम को वापस लाते समय कई सावधानियां बरती जाती हैं। आलम टूटा-फूटा, मुड़ा-तुड़ा नहीं होना चाहिए और न ही उसे लांघना चाहिए।
जोहार घाटी: ''सिङ्ग-गु-ल्हा'
जनपद पिथौरागढ़ की मुनस्यारी तहसील के मल्ला जोहार निवासी सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी सुरेन्द्र सिंह पांगती के अनुसार क्षेत्र के सभी 14 राजस्व ग्रामों के अपने-अपने पवित्र वन हैं।
स्थानीय बोलचाल में, इन पवित्र उपवनों या जंगलों को 'सिङ्ग-गु-ल्हा' के नाम से जाना जाता है। शब्द ''सिङ्ग-गु-ल्हा' तिब्बती भाषा में निहित है, जिसका अर्थ है सिङ्ग=जंगल/लकड़ी; गु=संरक्षित वन; ल्हा=देवत्व या भगवान के नाम पर।
उदाहरण के लिए, रालम गांव के जंगल में एक विशाल 'सिङ्ग-गु-ल्हा’ था, लेकिन पलायन के साथ, ये गांव अब भूतिया हो गए हैं। जोहार घाटी का अंतिम गांव मिलम है। स्नोलाइन (मिलम ग्लेशियर) से ठीक पहले, गांव मर्तोली में एक बर्च जंगल है। यहीं पर नंदा देवी का प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित है।
वर्ष में एक बार जुलाई-अगस्त के महीने में नंदा-अष्टमी के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है। राजकीय फूल, 'ब्रह्मकमल', मर्तोली के ऊपर जंगल में उगता है। केवल त्योहार के समय में, स्थानीय लोगों को देवी को चढ़ाए जाने वाले पके फूलों को तोड़ने की अनुमति होती है।
इन पवित्र वनों के बारे में कई लोक कथाएं और वर्जनाएं प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी इन जंगलों में प्रवेश करता है या इन वनों की वनस्पतियों और जीवों को नुकसान पहुंचाता है, वह देवता के क्रोध को आमंत्रित करता है।
एक शिकारी के बारे में ऐसी ही एक कहानी मेरी मां ने सुनाई थी, पांगती बताते हैं-
उसने गलती से एक 'खासी' (देवी नंदा को चढ़ाया गया बकरा) मार डाला। शिकारी उसी दिन अपने घर लौटने से पहले ही मर गया।
हल्द्वानी स्थित शोधकर्ता चंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि गर्भवती और मासिक धर्म वाली महिलाओं को पवित्र जंगलों या स्थलों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। इनमें से कई पवित्र वन जंगल ताजे पानी के स्रोत हैं। नेगी को लगता है कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को रोकने का कारण हाइजीन के उद्देश्य से हो सकता है।
व्यास घाटी
अल्मोड़ा स्थित जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट ने 2017 में एक पेपर प्रकाशित किया था, जिसमें व्यास घाटी में प्रथाओं का दस्तावेजीकरण किया गया था। पवित्र वनों में प्रवेश प्रतिबंधित है। ग्रामीण पेड़ों को काटने से परहेज करते हैं, लेकिन जंगल से चारे और ईंधन की लकड़ी के लिए गिरी हुई पत्तियों या टहनियों को इकट्ठा कर सकते हैं।
निष्कर्ष जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल प्लानिंग एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित हुए थे। इसके अलावा, जिन पेड़ों पर सफेद या लाल झंडे लगे होते हैं, उन्हें काटा नहीं जाता।
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