सियासी दलों में भगवा रंग को लेकर इन दिनों बहस छिड़ी है कि आखिर इस रंग पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार कैसे हो सकता है? कांग्रेस अगर भगवा रंग का इस्तेमाल करती है तो भला यह हिन्दूवादी राजनीति का हिस्सा कैसे हो गया?
बात अगर इंदिरा गांधी के जमाने की करें या फिर इससे नेहरू जी के जमाने की भी करें तो क्या उस दौर में कांग्रेस का कोई नेता कभी मंदिर नहीं जाता था, भगवान को शीश नहीं नवाता था या फिर अपने देश की धार्मिक परंपराओं को नहीं मानता था? अगर आप ये सवाल कम्युनिस्टों पर उठाएं तो कुछ हद तक समझ में भी आता है।
सुप्रीम कोर्ट की हाल ही में उठाई गई एक अहम आपत्ति गौर करने लायक है जिसमें ये कहा गया है कि जबतक धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जाएगा तबतक भड़काऊ भाषणों पर रोक नहीं लगाया जा सकता। जिस दिन राजनेता सियासत में धर्म का इस्तेमाल बंद कर देंगे, नफरती भाषण खुद ब खुद बंद हो जाएंगे।
सर्वोच्च अदालत भी ये जानती है कि ऐसा इस देश में नहीं होने जा रहा और पिछले कम से कम तीन दशकों से धर्म और सियासत के रिश्ते बेहद गहरे हो चुके हैं। देश में कई पार्टियों की बुनियाद ही धर्म को केन्द्र में रखकर बनाई गई है। ऐसे में हालात बदलना एक तरह से नामुमकिन सा दिखता है।
जाहिर है ऐसे में भगवा रंग को लेकर हो, या फिर हिन्दू या वैदिक परंपराओं को लेकर या फिर इस्लाम को केन्द्र में रखकर हो, सियासत का खेल जारी रहेगा। तो फिर कमलनाथ या राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई नेता और यहां तक कि कम्युनिस्ट भी अगर भगवा का सियासी इस्तेमाल करते हैं तो इसे आज के दौर में उनकी सियासत का ही हिस्सा माना जाएगा।
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