ऋग्वेद में शिव के दो रुप मिलते हैं। रुद्र के रूप में वे एक शक्तिशाली और उग्र देवता के रुप में चित्रित किये गए हैं। जो तूफान, बारिश और विनाश से जुड़े हैं। शिव रुप में उन्हें कल्याणकारी और सर्वव्यापी कहा गया है। ऋग्वेद में में पाये जाने वाले 'महामृत्युंजय मंत्र' में उन्हें अमरता प्रदान करने वाले देवता के रुप में चित्रित किया गया है। एक पौराणिक कथा है।
कामास्तग्रे समवर्तताधि मनसो रेत: प्रथम: यदासीत्।
सतो बन्धुमसमति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा।।(10/129/4ऋग्वेद)
शिव की चौथी कला की 'पशुपति' और 'नीलोहित ' नामों से उपासना होती हैं। पांचवीं कला वांग्मय मूर्ति भूतेश नाम से उपास्य है। शिव के इस अक्षर रुप में उपासना का विधान हमारे शास्त्रों में किया गया है। हमारे शरीर में भी हृदय कमल में ब्रह्म की, नाभि में विष्णु की और और मस्तिष्क में शिव की उपस्थिति मानी जाती हैं। वृक्षों में यह स्थिति बदल जाती हैं। वहां मूल से जो रस प्राप्त होता है उसी से उसका पोषण होता है। इस लिए कहा गया है -
मूलत ब्रह्मरुपाय मध्यतो विष्णु रुपिणे। अग्रत: शिवरुपाय अश्वत्थाय नमो नमः।।
शिव ऐसे देवता है जिनकी उपासना देवता और लिंग दोनों रुपों में होती हैं। स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है कि -
आकाशं लिंगमित्याहु: पृथ्वीं तस्य पीठिका।
आलय: सर्व देवानां लयनार्लिंगमुच्ते।।
अर्थात् आकाश लिंग रुप है, पृथ्वी उसका आधार है। प्रलय काल में सृष्टि, देवता आदि उसी लिंग में समाविष्ट हो जाते हैं। सभी देवताओं का प्रादुर्भाव भी ज्योतिर्लिंग से ही माना गया है ।
शिव का एक विश्वरुपभी है। 'शेरतेsस्मिन् सर्व इति शिव:' शिव का यह वह रुप है, जिसमें सब कुछ समाहित है। अग्नि जिसका मस्तिष्क है। चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं। वेद जिसकी वाणी है। विश्वरुपी प्राणवायु अर्थात् प्राण जिसके हृदय में है। पृथ्वी पादरुप है। और जो सभी भूतों का अंतरात्मा है।
इनमें सोम तत्व चन्द्रमा रुप में, अप् गंगा रुप में वायु जटा रुप में शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। इस लिए शिव का एक नाम 'व्योमकेश' है।अर्थात् आकाश तत्व उनकी जटा है। हमारे शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की सावन में निम्न मन्त्रों से उपासना करने पर हर तरह की मनोकामनाएं पूरी होती हैं -
ऊं नमः शिवाय। ऊं भगवते रुद्राय। धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। उर्वारुकमिव वन्धनान् मृत्योर्मुक्षीव माममृतात्।।
शतपथ ब्राह्मण में एक कथा आती है। श्रेष्ठता पाने के लिए मन और वाणी में कलह हो गया। मन का कहना था कि मेरे द्वारा जो ज्ञात नहीं है, उसे वाणी नहीं बोल सकती। वाणी का कहना था कि तुम जो जानते हो, उसे मैं ही प्रकट करती हूं। अतः मैं ही श्रेष्ठ हूं। दोनों प्रजापति के पास गये। प्रजापति ने अपना निर्णय मन के पक्ष में दिया। अर्थात् वाणी की अपेक्षा मन को श्रेष्ठ माना गया।
इस मन को श्रेष्ठ मानने का एक कारण यह भी हो सकता है कि- मन ही हमारे कल्याणकारी संकल्प को कार्य रुप में प्रकट करता है। भगवान शिव का संकल्प भी कुछ ऐसा ही है। समुद्र-मंथन से प्राप्त विष का पान तो जगत् कल्याण के लिए वे पी गये , पर यह उनके संकल्प शक्ति की ही बलिहारी है कि उस विष को गले के नीचे उतरने नहीं दिया। इस लिए वे नीलकंठ कहलाये।वह विष भी कोई ऐसा - वैसा नहीं था। उसके ताप से देवताओं का समूह जलने लगा था। गोस्वामी तुलसीदास लिखते है -
जयंत सकल सूर वृंद, विषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस।।
यजुर्वेद के 34 वें अध्याय के चौथी ऋचा में ऐसे ही संकल्प को शिवसंकल्प की संज्ञा दी गयी है -
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृति: च यज्जयोतिरन्तरमृतं प्रजासु।
यस्मान्न ऋते किचन कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
अर्थात् जिस अमृतस्वरुप मन के द्वारा भूत , भविष्यत् और वर्तमान सम्बन्धी सभी विषयों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, जिसके द्वारा सप्तहोतात्मक अग्निष्टोम (सोमयाग का एक प्रकार) सम्पन्न होता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प से युक्त हो।
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