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तीजन बाई: जिनके लिए पंडवानी ही बनी जीवन की सबसे बड़ी मुक्ति

सुधीर सक्सेना
Updated Mon, 06 Jul 2026 07:33 AM IST

सार

पंडवानी ही उन्हें स्याह बोगदे के बाहर उस ठौर ले गई, जहां खुली हवा थी, रोशनी थी और उन्हें सराहती हुई एक बड़ी दुनिया थी। कला कोई भी हो, वह तैयारी या रियाज मांगती है। तीजन ने अपने को तैयार किया, मांजा या परिष्कृत किया और सबसे बढ़कर उसे नवाचारित भी किया।
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स्मृति शेष तीजन बाई - फोटो : ANI


तीजन को अनपढ़ होने का मलाल नहीं था। उनके तईं सब प्रभु की माया है। 80 के दशक में उन पर रंगकर्मी हबीब तनवीर की निगाह पड़ी। कला-गुरु को कलासाधिका की प्रतिभा चीन्हते देर न लगी। वह भारत महोत्सव में गईं। दिल्ली में इंदिरा गांधी के सम्मुख उन्होंने पंडवानी प्रस्तुत की। उन्हें जगह-जगह से न्यौता मिला। दिशाएं गौण हो गईं। वह फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्किये, रोमानिया, बांग्लादेश और स्विट्जरलैंड गईं ही, माल्टा, ट्यूनीशिया और साइप्रस भी हो आईं। तीजन ने कहा था-‘मैं पढ़ी होती, तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती। बहुत दुख झेले, लेकिन सरस्वती मैया की कृपा कि पंडवानी मेरी जिंदगी हो गई। सब उसी का दिया है।’ तीजनबाई की कहानी न केवल लोककला की शक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई भी सीमा पार की जा सकती है।
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