तीजन को अनपढ़ होने का मलाल नहीं था। उनके तईं सब प्रभु की माया है। 80 के दशक में उन पर रंगकर्मी हबीब तनवीर की निगाह पड़ी। कला-गुरु को कलासाधिका की प्रतिभा चीन्हते देर न लगी। वह भारत महोत्सव में गईं। दिल्ली में इंदिरा गांधी के सम्मुख उन्होंने पंडवानी प्रस्तुत की। उन्हें जगह-जगह से न्यौता मिला। दिशाएं गौण हो गईं। वह फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्किये, रोमानिया, बांग्लादेश और स्विट्जरलैंड गईं ही, माल्टा, ट्यूनीशिया और साइप्रस भी हो आईं। तीजन ने कहा था-‘मैं पढ़ी होती, तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती। बहुत दुख झेले, लेकिन सरस्वती मैया की कृपा कि पंडवानी मेरी जिंदगी हो गई। सब उसी का दिया है।’ तीजनबाई की कहानी न केवल लोककला की शक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई भी सीमा पार की जा सकती है।