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डॉ. राधाकृष्णन की जयंती पर विशेष: एक दार्शनिक और राष्ट्रपति का जीवन जो बन गया शिक्षकों का सम्मान

सार

Teachers Day 2025: अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली और उस औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक हमारा छुटकारा नहीं हो पा रहा है। उससे मुक्ति की छटपटाहट और अकुलाहट तो दिख रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा को नये सिरे से देखने -समझने और अनुसंधान के रूप में अपनाने का उत्साह और ललक भी दिखाई दे रही है।
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भारत के राष्ट्रपति रहे डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। - फोटो : Adobe
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विस्तार
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5 सितम्बर 1888 को  पैदा हुए डॉ राधाकृष्णन की इच्छा थी कि उनका जन्मदिन दिन 'शिक्षक दिवस' के रूप में ही मनाया जाए। सन् 1962 में जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तब से उनके जन्मदिन को 'शिक्षक दिवस' के रूप में बनाने की परम्परा चली आ रही है। डॉ. राधाकृष्णन को भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति बनाए जाने पर पाश्चात्य दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने अपना उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था-

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"भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर महान दार्शनिक प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित किया है।"

प्लेटो कहा करते थे कि एक दार्शनिक को शासक होना चाहिए। एक दार्शनिक होने के नाते मैं खुश हूं कि यह विश्व के दर्शनशास्त्र का सम्मान है। संविधान सभा के सदस्य ,एक राजनयिक और भारत के उपराष्ट्रपति -राष्ट्रपति होने के बावजूद आजीवन एक शिक्षक रूप में बने रहने को ही डॉ राधाकृष्णन अपने जीवन की धन्यता समझते थे। एक ऐसा शिक्षक जो अपने विद्यार्थियों को बताएं  कि "एक आदर्श शिक्षक केवल सूचना का संवाहक नहीं होता, बल्कि चरित्र का निर्माण करता है। वे सदैव राष्ट्र निर्माण और मानवता की सेवा का सर्वोपरि  मानते थे।शिक्षा और नैतिकता  के आधार पर ही  एक सशक्त, न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण सम्भव है।"

इसके दो तरीके हैं, पहला -व्यक्ति के चरित्र निर्माण से समाज में बदलाव किया जा सकता है। दूसरा तरीका है, व्यवस्था में बदलाव होने पर समाज में परिवर्तन हो सकता है। एक तीसरा तरीका भी है, प्रयोग करके उसे आचरण में उतारना। ऐसा ही प्रयोग महात्मा गांधी ने अपने जीवन के साथ ही नहीं मृत्यु के साथ भी किया है। इसलिए गांधी जी जिस प्रयोग को पहले अपने ऊपर आजमा नहीं लेते थे, उसे दूसरों को करने के लिए कभी नहीं कहते थे। यह प्रयोग और कुछ नहीं जीवन को खुली आंखों से देखना और अपने अनुभव और शास्त्र ज्ञान को जीवन में उतरना है। तुलसीदास का भी यहीं सुझाव है -
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पर उपदेश कुशल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनरे ।।

 

इस अर्थ में शिक्षा प्रणाली में हो रहे तमाम प्रयासों को भी एक रचना और प्रयोग के तहत ही देखना-समझना चाहिए। पर आज के परिवेश में शिक्षा के नाम पर जो प्रयोग हो रहे हैं  वे कितने भयावह है उस पर भी नजर रखना जरूरी है। जब से शिक्षा व्यवस्था को  जीविकोपार्जन और व्यवसाय से जोड़ा गया और माता-पिता  की अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए सिर्फ इंजीनियर और डॉक्टर बनाना ही शिक्षा का एक मात्र का उद्देश्य समझा जाने लगा, तो उसका अंतिम हश्र क्या हुआ? अनुभव से यह तथ्य सामने आया है कि कोचिंग संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों के तमाम कोशिशों के बावजूद अगर थोड़ी भी चूक हुई, तो उनका हश्र 'आत्महत्या, हताशा और डिप्रेशन' के रूप में सामने आने लगा।
 

इतिहास का सबक यह है कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद जब से ब्रिटिश राज भारत में कायम हुआ और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में हमारी अपनी प्रचलित  ज्ञान परम्पराको ढालने की कोशिश शुरू हुई, हम अपनी जड़ों से कटते गये। हम ब्रिटिश हुकुमत की संचालित शिक्षा प्रणाली का सक्रिय हिस्सेदार होते गए, जिसका घोषित लक्ष्य अपनी शासन व्यवस्था के संचालन के लिए सिर्फ क्लर्क बनाना था। ऐसा क्लर्क जो शरीर, रंग-रूप से भले भारतीय हों, दिल - दिमाग से पूरी तरह अंग्रेज होना चाहिए।


उस शिक्षा प्रणाली और उस औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक हमारा छुटकारा नहीं हो पा रहा है। उससे मुक्ति की छटपटाहट और अकुलाहट तो दिख रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा को नये सिरे से देखने -समझने और अनुसंधान के रूप में अपनाने का उत्साह और ललक भी दिखाई दे रही है। पर यह समझना भी जरूरी है कि चूंकि सत्य का अनुसंधान ही भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान का उद्देश्य है। इसलिए ज्ञान यात्रा ठीक रास्ते पर चलें, उसका निरन्तर परिष्कार भी होता चलें, इसकी गुंजाइश भी बरकरार रहनी चाहिए। यह भी उतना ही जरूरी है। अपने एक लेख 'भारतीय परंपरा में भारत' में आचार्य विद्यानिवास मिश्र जी कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम् ' का एक श्लोक को उद्धृत करते हुए अपनी बात कहते है-

 

     

 पुराणमित्येव न साधु सर्वं  

न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्। 
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढ़: परप्रत्ययनेय बुद्धि:



अर्थात् पुराना होने से कोई मूल्य अच्छा नहीं हो जाता, न नया होने से निन्दनीय होता है। जो लोग जीना जानते हैं, वे परीक्षण करके ही एक का त्याग करते हैं और दूसरे को स्वीकार करते हैं। वह मोहग्रस्त है, जो दूसरे की परीक्षण -प्रक्रिया से संतुष्ट रहते हैं। परंपरा में आंशिक रूप से स्वीकार्य और आंशिक रूप से परिहार दोनों हैं। हमारा समाज परंपरा से जुड़ा समाज है, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हमारा समाज अतीत से बंधा समाज है। यह सोच हमारी ज्ञान परम्परा में दिखाई देती है। यह चार सोपानों से होकर गुजरती हैं- अध्ययन, मनन, प्रवचन और प्रयोग

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सन् 1962 में जब वे भारत के राष्ट्रपति बने तो पाश्चात्य दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने अपना उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था- "भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर महान दार्शनिक प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित किया है। - फोटो : adobe stock
शिक्षा केवल अक्षर की नहीं होती और यह भी जरूरी नहीं कि सीखाने वाला साक्षर ही हों। वह बिना डिग्री प्राप्त किया हुआ निरक्षर भी हो सकता है। सारनाथ में शिक्षा पर हुए एक सम्मेलन में गांधीवादी चिंतक धर्मपाल जी ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि पढ़ने- लिखने की कला ही शिक्षा है क्या? या कुछ और है? शिक्षा को मैं समझता हूं और हमारे यहां इसका अर्थ है प्रज्ञा, शील और समाधि के ज्ञान से है। इन तीनों को जानना  शिक्षा है। बाकी जो तकनीक है, भौतिक विज्ञान है, शिल्प और कलाएं हैं वे शिक्षा में नहीं आती। वे कुछ दूसरी चीजें हैं। उन्हें हमारे यहां शिक्षा नहीं माना जाता है। लेकिन यदि आज हम आचरण, व्यवहार  काम- धंधे चला पाने की क्षमता को शिक्षा नहीं मानते और अक्षर ज्ञान को शिक्षा मानते हैं, तो भारत में आज भी 60% से 70% तक लोग अशिक्षित ही होंगे।

इस तरह के प्रश्नों का कोई सनातन समाधान एक झटके में नहीं प्राप्त होगा। परंतु वैदिक काल से लेकर औपनिषदिक काल तक संवाद सूक्तों और प्रश्नोत्तर के जरिए ही हम सर्वस्वीकार्य स्थायी -अस्थायी समाधान तक पहुंचते रहे हैं। महात्मा बुद्ध के 'मिलिंद पन्हों' और भगवत् गीता में भी ऐसे ही प्रश्नोत्तरी परम्परा से सम्भव समाधान की ओर हम उन्मुख होते हैं। मुण्डकोपनिषद् में शौनक ऋषि अंगिरा ऋषि से प्रश्न पूछते हैं कि "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञात भवति।" वह क्या है जिसके जानने मात्र से सब कुछ जाना जा सकता है? उसे परा विद्या और अपरा विद्या कहा गया है। परा विद्या वह है, जो पर-ब्रह्म का ज्ञान कराती है। अपरा विद्या जिससे लोक - परलोक सम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्ति का ज्ञान होता है। शंकराचार्य के अनुसार, अपरा विद्या धर्म-अधर्म और उनके फल से सम्बन्ध रखने वाली विद्या है। भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि-   
 
यथैधांसि समिद्धोsग्निर्भस्मसात्कुरुते अर्जुन।
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्मणि भस्मसात्कुरुते तथा।। (4/37)

अर्थात् जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रुपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को नष्ट कर देती है। समस्त प्रकार के राग- द्वेष अज्ञान और सुख - दुख  और भोगों को नष्ट कर देती है। इसी अर्थ में भारतीय ज्ञान परम्परा में  विद्या को 'या विद्या सा  विमुक्तये' कहा गया है। यह विद्या हमें तमाम तरह के झंझटों से मुक्ति दिलाने का साधन है। यह हमें काम- क्रोध- लोभ-लालच और मद-मोह से भी छुटकारा दिलाने वाली है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में एक कथा आती है कि एक बार देवों, मनुष्यों और असूरों ने अपने पिता प्रजापति के सानिध्य में रहकर अखंड ब्रह्मचर्य की साधना किया। साधना के पश्चात् देवों ने प्रजापति से कहा कि आप हमें कोई उपदेश दीजिए। प्रजापति ने उन्हें एक अक्षर ' ' का उपदेश दिया। प्रजापति ने पूछा कि क्या आप इसका आशय समझ गए हैं? थोड़ी देर मनन करने के बाद देवों ने कहा कि जी हां! हम इसका आशय समझ गए हैं। आपने कहा कि दमन करो अर्थात् ज्यादा भोगों में मत फंसो। भोग पर नियंत्रण रखो।

मनुष्यों ने भी प्रजापति से उपदेश देने का आग्रह किया। उनको भी एक अक्षर '' का ही उपदेश प्रजापति ने दिया। फिर पूछा कि वे क्या इसका आशय जान गए हैं? तो मनुष्यों ने कहा, जी हां ! आपने कहा कि वस्तुओं के प्रति संग्रह की प्रवृत्ति का त्याग करो और दान देते  रहो। असुरों को भी प्रजापति ने '' अक्षर का ही उपदेश दिया। प्रजापति ने पूछा कि तुम लोग मेरे उपदेश का आशय ठीक से समझ गये हो न? असूरों ने कहा,  जी! हमने भी समझ लिया है कि दया करो।

यह दैवी वाणी थी। द द द की गर्जना करने वाली दैवी वाणी! दमन करो, दया करो और दान दो। मनुष्यों का जीवन सार्थक तब है, जब वह दान करें, अन्यथा विकास रूक सकता है। देवताओं में अहंकार न बढ़ जाए, इसलिए उन्हें दमन का उपदेश दिया गया है और असूरों को ऊंची भूमिका में उठाना है, तो उनके लिए दया के अलावा और क्या उपाय है?

अब सवाल है कि प्रजापति कौन है? ऋषि ने गाया यह हृदय तत्व है। दया, करुणा, श्रद्धा, सर्वस्व दान और दमन की आधार भूमि। जिसे सिर्फ सूचना और बौद्धिक क्षमता के विकास से हासिल नहीं किया जा सकता है। यही भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल आधार भी है। आज की शिक्षा व्यवस्था में सब कुछ एक झटके सिखाने की आपाधापी मची हुई है। महर्षि अरविन्द का मानना है कि हमें किसी को कुछ सिखाना नहीं है। हर मनुष्य में कुछ सोचने-विचारने, कल्पना करने और कुछ रचनात्मक क्षमता होती हैं। एक आदर्श शिक्षक का गुण है कि वे अपने विद्यार्थियों में इन क्षमताओं के विकास में सहयोगी की भूमिका निभावें उसके चिन्तन-मनन के क्षितिज का विस्तार करें।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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