इक्कीसवीं सदी में जो जितनी बड़ी आर्थिक शक्ति है, वह उतना बड़ा सफल, संपन्न और सक्षम देश
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हमें यह भी समझना होगा कि इस दौर की दुनिया महाभारत, हल्दी घाटी,प्लासी, हिरोशिमा, नागासाकी के जैसे युद्ध से फैसले करने की नहीं है। यह केवल मिसाइलों, परमाणु बम से हार-जीत का मसला भी नहीं है। इक्कीसवीं सदी में जो जितनी बड़ी आर्थिक शक्ति है, वह उतना बड़ा सफल, संपन्न और सक्षम देश है। वही सुपर पॉवर है, वही विश्व विजेता है। तो यह लड़ाई सुपर पॉवर के सिंहासन डोलने की है। यह संघर्ष विश्व व्यापार में एकाधिकार खोते जाने का है। यह दौर बरबाद होकर भी सामने वाले को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के हठधर्मी आचरण पर अडिग रहने का है।
अमेरिका वही कर रहा है। वह विकल्पहीन है। वह बेहद आहत है। उसका अहंकार बेतरह जख्मी है, इस बात से कि उसके वार झेलने का माद्दा पैदा हो चुका है और उससे भी बढ़कर पलटवार भी होने लगा है, जो उसके अस्तित्व के घनघोर संकट का संकेत है। ऐसे में वह बिलबिलायेगा, तिलमिलायेगा, बौखलायेगा, चौधराहट दिखायेगा और एक हड़बड़जदा व्यक्ति जो-जो कर सकता है, वह सब करेगा।
तब हम कैसे पेश आए, कैसे दुनिया इसका मुकाबला करे? यह भूल जाइये कि कोई भी देश अपने हितों से परे जाकर किसी दूसरे देश की मदद करेगा या कोई संयुक्त मोर्चा बनाकर अमेरिका के खिलाफ लड़ेगा। जो आज अमेरिका से पीड़ित हैं, कल वे उसकी गोद में बैठे थे और जो आज उसकी आंखों में झांककर देख रहे हैं, वे कल उससे गलबहिया करते नजर आ सकते हैं। यानी शिकार को लेकर झगड़ रहे शेरों के झुंड का ध्यान भटकने पर सियारों का समूह उस शिकार को लेकर भाग जाने में जरा-सी देर नहीं करेगा। यही 21वीं सदी में लोगों या राष्ट्रों का चरित्र है।
खासकर पश्चिमी समाज का, जिन्होंने अतीत में दुनिया को फतह कर अपना झंडा लहराने से परहेज नहीं किया। देशों को गुलाम बनाया, दोहन किया, उन्हें कंगला बनाकर छोड़ दिया। फिर उन्हें आत्म निर्भर भी बनने नहीं देना चाहते, ताकि वे उन संपन्न देशों पर अवलंबित रहें।
अनिश्चितता के दौर में दुनिया खेमों में बंटी है
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इस अनिश्चितता के दौर में दुनिया इतने खेमों में बंटी नजर आ रही है कि जब आपको लगे कि फलां देश अमेरिका के खिलाफ या आपके साथ है, तब वह पलक झपकने जितने अगले क्षण में व्हाइट हाउस में डिनर लेते नजर आने लगता है। भारत अभी इसी गहमागहमी,असंमजसता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। उसने घरेलू मोर्चे पर 11 साल जो संघर्ष किया,उससे तो जैसे-तैसे निपट ही रहा था, अब तो विदेशी ताकतें भी उनसे आ मिली प्रतीत होती हैं। इसलिये,भारत जैसे देश की असल परीक्षा तो अब शुरू हुई है। इससे वह कैसे और कब निपट पाता है,उसी पर उसका आगे का मार्ग निर्धारित होगा।
भारत के भाग्य में शायद यही लिखा है कि वह कभी निश्चिंत होकर नहीं रह पायेगा। कभी आक्रांताओं से निपटना होगा तो कभी उसके अपने पीठ पर सवार होकर घात को उतावले रहेंगे। सामने दिख रहे शत्रु से लड़ना आसान रहता है, लेकिन उस दुश्मन के साथ मिले अपने लोगों को देख पाने की दिव्य दृष्टि नहीं है तो आप पृथ्वीराज चौहान की गति को प्राप्त हो सकते हैं।
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