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अमेरिका और भारत के बीच आखिर ये कैसा तनाव है? क्या ट्रेड वार संपूर्ण वॉर का रूप लेगा?

सार

क्या भारत या ट्रंप के टैरिफ को न मानने वालों के खिलाफ युद्ध जैसे हालात भी पैदा किये जा सकेंगे? यह आशंका 50-50 प्रतिशत मानी जा सकती है। प्रत्यक्ष और सीधे तौर पर युद्ध न भी करें तो स्थितियां वैसी बनाई जा सकती हैं, तो इससे कैसे निपटा जाये और क्या इसका कोई आसान या तत्काल हल संभव है?
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क्या ट्रेड वार संपूर्ण वार का रूप लेगा? - फोटो : ANI
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विस्तार
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क्या भारत और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग दो राष्ट्राध्यक्षों के अहंकार की लड़ाई है? कतई नहीं। क्या अमेरिका पहली बार ऐसा कर रहा है? हर्गिज नहीं। क्या ट्रंप बेहद सनकी हैं, जिन्हें आगे-पीछे अपने ही देश में खारिज किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं, वे सनक पर सवार तो हैं , लेकिन अमेरिका में खारिज नहीं किए जा रहे। तो सवाल यह है कि यह सिलसिला कहां जाकर रुकेगा। क्या भारत या ट्रंप के टैरिफ को न मानने वालों के खिलाफ युद्ध जैसे हालात भी पैदा किए जा सकेंगे?

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दरअसल, यह आशंका 50-50 प्रतिशत मानी जा सकती है। प्रत्यक्ष और सीधे तौर पर युद्ध न भी करें तो स्थितियां वैसी बनाई जा सकती हैं, तो इससे कैसे निपटा जाए और क्या इसका कोई आसान या तत्काल हल संभव है? इसका जवाब बेहद कठिन है। उसकी वजह है कि अमेरिका के सौ साल की पृष्ठभूमि, जो दोगलेपन, धोखा, स्वार्थपरकता, लालच, ब्लैंकमेलिंग के अस्त्रों के जखीरे से भरी पड़ी है। फिर भी जो बड़ा बदलाव आया है, वह यह कि भारत, चीन, रूस जैसे देश दो-दो हाथ करने को तैयार हैं। व्यापारिक और सामरिक दोनों तरह से। यही पीड़ा ट्रंप को विचलित कर रही है।

इसमें यह समझना नादानी होगी कि यह लड़ाई जल्द समाप्त हो जाएगी या ट्रंप अपने कदम पीछे खींच लेंगे। यह भी न समझें कि भारत झुक जाएगा या 50 प्रतिशत दर के साथ व्यापार जारी रखेगा। हम भारतीयों को अब इतना तो स्वीकार करना चाहिए कि पिछले 11 वर्षों में हमने जो आर्थिक मजबूती हासिल की है, वह किसी गीदड़ भभकी से मटियामेट कर दी जाएगी। यह भी न समझें कि हम कटोरे वाले देश हैं, जो विकल्पहीन है। यह भी न मानें कि कोई फैसला या पंगा किसी तानाशाही प्रवृत्ति के तहत लिया जा रहा है। हम चूंकि विश्व की एक निरंतर मजबूत होती अर्थव्यवस्था वाले देश हैं तो इस तरह के दबावों, खटकरम से दो-चार होना रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि किसी मुश्किल दौर में हम धैर्य के साथ अपनी सरकार पर विश्वास रखते हुए उसके पीछे खड़े रह सकते हैं या कारणों की गहराई को जाने बिना आलोचना न करें ,उसे कोसे नहीं ।

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इक्कीसवीं सदी में जो जितनी बड़ी आर्थिक शक्ति है, वह उतना बड़ा सफल, संपन्न और सक्षम देश - फोटो : Freepik
हमें यह भी समझना होगा कि इस दौर की दुनिया महाभारत, हल्दी घाटी,प्लासी, हिरोशिमा, नागासाकी के जैसे युद्ध से फैसले करने की नहीं है। यह केवल मिसाइलों, परमाणु बम से हार-जीत का मसला भी नहीं है। इक्कीसवीं सदी में जो जितनी बड़ी आर्थिक शक्ति है, वह उतना बड़ा सफल, संपन्न और सक्षम देश है। वही सुपर पॉवर है, वही विश्व विजेता है। तो यह लड़ाई सुपर पॉवर के सिंहासन डोलने की है। यह संघर्ष विश्व व्यापार में एकाधिकार खोते जाने का है। यह दौर बरबाद होकर भी सामने वाले को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के हठधर्मी आचरण पर अडिग रहने का है।

अमेरिका वही कर रहा है। वह विकल्पहीन है। वह बेहद आहत है। उसका अहंकार बेतरह जख्मी है, इस बात से कि उसके वार झेलने का माद्दा पैदा हो चुका है और उससे भी बढ़कर पलटवार भी होने लगा है, जो उसके अस्तित्व के घनघोर संकट का संकेत है। ऐसे में वह बिलबिलायेगा, तिलमिलायेगा, बौखलायेगा, चौधराहट दिखायेगा और एक हड़बड़जदा व्यक्ति जो-जो कर सकता है, वह सब करेगा।

तब हम कैसे पेश आए, कैसे दुनिया इसका मुकाबला करे? यह भूल जाइये कि कोई भी देश अपने हितों से परे जाकर किसी दूसरे देश की मदद करेगा या कोई संयुक्त मोर्चा बनाकर अमेरिका के खिलाफ लड़ेगा। जो आज अमेरिका से पीड़ित हैं, कल वे उसकी गोद में बैठे थे और जो आज उसकी आंखों में झांककर देख रहे हैं, वे कल उससे गलबहिया करते नजर आ सकते हैं। यानी शिकार को लेकर झगड़ रहे शेरों के झुंड का ध्यान भटकने पर सियारों का समूह उस शिकार को लेकर भाग जाने में जरा-सी देर नहीं करेगा। यही 21वीं सदी में लोगों या राष्ट्रों का चरित्र है।

खासकर पश्चिमी समाज का, जिन्होंने अतीत में दुनिया को फतह कर अपना झंडा लहराने से परहेज नहीं किया। देशों को गुलाम बनाया, दोहन किया, उन्हें कंगला बनाकर छोड़ दिया। फिर उन्हें आत्म निर्भर भी बनने नहीं देना चाहते, ताकि वे उन संपन्न देशों पर अवलंबित रहें।
 
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अनिश्चितता के दौर में दुनिया खेमों में बंटी है - फोटो : Adobe Stock
इस अनिश्चितता के दौर में दुनिया इतने खेमों में बंटी नजर आ रही है कि जब आपको लगे कि फलां देश अमेरिका के खिलाफ या आपके साथ है, तब वह पलक झपकने जितने अगले क्षण में व्हाइट हाउस में डिनर लेते नजर आने लगता है। भारत अभी इसी गहमागहमी,असंमजसता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। उसने घरेलू मोर्चे पर 11 साल जो संघर्ष किया,उससे तो जैसे-तैसे निपट ही रहा था, अब तो विदेशी ताकतें भी उनसे आ मिली प्रतीत होती हैं। इसलिये,भारत जैसे देश की असल परीक्षा तो अब शुरू हुई है। इससे वह कैसे और कब निपट पाता है,उसी पर उसका आगे का मार्ग निर्धारित होगा।

भारत के भाग्य में शायद यही लिखा है कि वह कभी निश्चिंत होकर नहीं रह पायेगा। कभी आक्रांताओं से निपटना होगा तो कभी उसके अपने पीठ पर सवार होकर घात को उतावले रहेंगे। सामने दिख रहे शत्रु से लड़ना आसान रहता है, लेकिन उस दुश्मन के साथ मिले अपने लोगों को देख पाने की दिव्य दृष्टि नहीं है तो आप पृथ्वीराज चौहान की गति को प्राप्त हो सकते हैं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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