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भारतीय गणराज्य ने एक दार्शनिक को राष्ट्रपति बनाकर महान दार्शनिक प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित किया है।"
प्लेटो कहा करते थे कि एक दार्शनिक को शासक होना चाहिए। एक दार्शनिक होने के नाते मैं खुश हूं कि यह विश्व के दर्शनशास्त्र का सम्मान है। संविधान सभा के सदस्य ,एक राजनयिक और भारत के उपराष्ट्रपति -राष्ट्रपति होने के बावजूद आजीवन एक शिक्षक रूप में बने रहने को ही डॉ राधाकृष्णन अपने जीवन की धन्यता समझते थे। एक ऐसा शिक्षक जो अपने विद्यार्थियों को बताएं कि "
एक आदर्श शिक्षक केवल सूचना का संवाहक नहीं होता, बल्कि चरित्र का निर्माण करता है। वे सदैव राष्ट्र निर्माण और मानवता की सेवा का सर्वोपरि मानते थे।शिक्षा और नैतिकता के आधार पर ही एक सशक्त, न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण सम्भव है।"
इसके दो तरीके हैं,
पहला -व्यक्ति के चरित्र निर्माण से समाज में बदलाव किया जा सकता है।
दूसरा तरीका है, व्यवस्था में बदलाव होने पर समाज में परिवर्तन हो सकता है। एक
तीसरा तरीका भी है, प्रयोग करके उसे आचरण में उतारना। ऐसा ही प्रयोग महात्मा गांधी ने अपने जीवन के साथ ही नहीं मृत्यु के साथ भी किया है। इसलिए गांधी जी जिस प्रयोग को पहले अपने ऊपर आजमा नहीं लेते थे, उसे दूसरों को करने के लिए कभी नहीं कहते थे। यह प्रयोग और कुछ नहीं जीवन को खुली आंखों से देखना और अपने अनुभव और शास्त्र ज्ञान को जीवन में उतरना है।
तुलसीदास का भी यहीं सुझाव है -
पर उपदेश कुशल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनरे ।।
इस अर्थ में शिक्षा प्रणाली में हो रहे तमाम प्रयासों को भी एक रचना और प्रयोग के तहत ही देखना-समझना चाहिए। पर आज के परिवेश में शिक्षा के नाम पर जो प्रयोग हो रहे हैं वे कितने भयावह है उस पर भी नजर रखना जरूरी है। जब से शिक्षा व्यवस्था को जीविकोपार्जन और व्यवसाय से जोड़ा गया और माता-पिता की अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए सिर्फ इंजीनियर और डॉक्टर बनाना ही शिक्षा का एक मात्र का उद्देश्य समझा जाने लगा, तो उसका अंतिम हश्र क्या हुआ? अनुभव से यह तथ्य सामने आया है कि कोचिंग संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों के तमाम कोशिशों के बावजूद अगर थोड़ी भी चूक हुई, तो उनका हश्र 'आत्महत्या, हताशा और डिप्रेशन' के रूप में सामने आने लगा।
इतिहास का सबक यह है कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद जब से ब्रिटिश राज भारत में कायम हुआ और मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में हमारी अपनी प्रचलित ज्ञान परम्पराको ढालने की कोशिश शुरू हुई, हम अपनी जड़ों से कटते गये। हम ब्रिटिश हुकुमत की संचालित शिक्षा प्रणाली का सक्रिय हिस्सेदार होते गए, जिसका घोषित लक्ष्य अपनी शासन व्यवस्था के संचालन के लिए सिर्फ क्लर्क बनाना था। ऐसा क्लर्क जो शरीर, रंग-रूप से भले भारतीय हों, दिल - दिमाग से पूरी तरह अंग्रेज होना चाहिए।
उस शिक्षा प्रणाली और उस औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक हमारा छुटकारा नहीं हो पा रहा है। उससे मुक्ति की छटपटाहट और अकुलाहट तो दिख रही है। भारतीय ज्ञान परम्परा को नये सिरे से देखने -समझने और अनुसंधान के रूप में अपनाने का उत्साह और ललक भी दिखाई दे रही है। पर यह समझना भी जरूरी है कि चूंकि सत्य का अनुसंधान ही भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान का उद्देश्य है। इसलिए ज्ञान यात्रा ठीक रास्ते पर चलें, उसका निरन्तर परिष्कार भी होता चलें, इसकी गुंजाइश भी बरकरार रहनी चाहिए। यह भी उतना ही जरूरी है। अपने एक लेख '
भारतीय परंपरा में भारत' में आचार्य विद्यानिवास मिश्र जी कालिदास के '
मालविकाग्निमित्रम् ' का एक श्लोक को उद्धृत करते हुए अपनी बात कहते है-
पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्।
सन्त: परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढ़: परप्रत्ययनेय बुद्धि:
अर्थात् पुराना होने से कोई मूल्य अच्छा नहीं हो जाता, न नया होने से निन्दनीय होता है। जो लोग जीना जानते हैं, वे परीक्षण करके ही एक का त्याग करते हैं और दूसरे को स्वीकार करते हैं। वह मोहग्रस्त है, जो दूसरे की परीक्षण -प्रक्रिया से संतुष्ट रहते हैं। परंपरा में आंशिक रूप से स्वीकार्य और आंशिक रूप से परिहार दोनों हैं। हमारा समाज परंपरा से जुड़ा समाज है, इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हमारा समाज अतीत से बंधा समाज है। यह सोच हमारी ज्ञान परम्परा में दिखाई देती है। यह चार सोपानों से होकर गुजरती हैं- अध्ययन, मनन, प्रवचन और प्रयोग।