यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है।
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यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है। और इस भरोसे की बदौलत स्वीडन हालात को क़ाबू में करने की उम्मीद लगाए बैठा है। मुमकिन है कि कोरोना से मुक्ति के लिए वैक्सीन तैयार होने में साल दो साल या उससे भी ज़्यादा समय लग जाए। तब किसी भी देश में जनता का अनुशासन ही सही मायने में जीवनरक्षक का काम करेगा। यह समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए सरकार की पाबंदी से ज़्यादा कारगर उपाय है।
यहांं कोरोना के कारण लॉकडाउन नहीं है। देश के अंदर परिवहन व्यवस्था बंद नहीं है। कुछ को सीमित ज़रूर किया गया है। शुरू में बस व मेट्रो का परिचालन सीमित किया गया लेकिन यह महसूस किया गया कि इस तरह आमजनता को नहीं चाहते हुए भी अनुशासन तोड़ना पड़ सकता है, इसलिए जल्द ही बस व मेट्रो पुराने अंतराल पर दौड़ने लगी। जनता को यह याद दिलाया गया कि यह आपकी ज़रूरत के लिए है, इसलिए अनुशासित रहकर ज़िम्मेदारी के साथ इसका उपयोग करें।
स्टॉकहोम में बसों व सार्वजनिक स्थलों पर जनता के ध्यानाकर्षण के लिए पोस्टर लगाए गए कि आपकी सुविधा के लिए परिचालन बाधित नहीं किया जा रहा, लेकिन आप बसों में चढ़ने से पहले दो बार यह ज़रूर सोचें कि क्या आपका इसमें चढ़ना वाक़ई ज़रूरी है। यानी यह व्यवस्था ज़रूरतमंदों के लिए रहने दें। लोगों के बीच यह बात घर कर गई। देखते ही देखते बसों और मेट्रो में सफ़र करने वालों की संख्या कम होती चली गई। इसी तरह सार्वजनिक स्थलों, रेस्तराँ, कैफ़े व बार में भी आने वालों की संख्या में गिरावट आई है।
बुजुर्गों और अस्वस्थ लोगों को घर में रहने की सलाह दी गई। लेकिन उनपर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई गई है यही अनुशासन यहांं की सरकार और जनता को एक-दूसरे में भरोसा दिलाती है। बल्कि यह अनुरोध किया गया कि ऐसा करके वे अपने साथ दूसरों की जान बचाने में भी मददगार साबित हो सकते हैं। धीरे-धीरे इस बात का असर भी हुआ। बुजुर्ग अपने ज़रूरत के लिहाज़ से बाहर तो निकलते हैं लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग को भूलते नहीं। यह अलग बात है कि उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण कोरोना का सबसे ज़्यादा प्रभाव और उससे सर्वाधिक मौत बुजुर्गों की हो रही है।जिसे रोकने में यहाँ की नीतियाँ कारगर साबित नहीं हो रही।
ठंडे प्रदेशों में गर्मी के दिनों का महत्व मैं तब पूरी ईमानदारी से समझ पाई जब मैंने यहांं की सर्दी के मौसम को देखा और महसूस किया। शरीर के लिए सूरज की रोशनी कितनी लाभदायी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। विटामिन डी से लेकर कैंसर तक के इलाज में सूर्य की किरणों का महत्व अतुलनीय है। लेकिन यह आप में ऊर्जा का संचार करने और प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने में मददगार भी तो होता है।
अब किसी ऐसे देश जहां सूरज की गर्मी महज़ पाँच-छह महीनें ही महसूस की जाए, वहाँ के लिए तो इन महीनों का महत्व बढ़ जाना स्वभाविक है। स्वीडन भी एक ऐसा ही देश है जहां जनता गर्मी के दिनों को घर में दुबक कर गँवाना नहीं चाहती। वो इन्हीं महीनों में सूर्य की गर्मी से होने वाले फ़ायदों को उठाने में व्यस्त रहती है। लेकिन इस बार की गर्मी अलग है।
बुजुर्गों और अस्वस्थ लोगों को घर में रहने की सलाह दी गई। लेकिन उनपर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगाई गई है।
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कोरोना से चारों ओर तबाही का मंजर है। इसलिए गर्मी के दिनों को धूमधाम से उत्सव की तरह नहीं मना सकते। लेकिन पचास से कम लोगों को एक साथ सोशल डिस्टेंसिंग के साथ इसे मनाने के लिए किसी ने नहीं रोका है। यानी लोग सार्वजनिक जगहों, समुद्र के किनारे, पार्क या जंगलों के बीच बैठेंगे तो ज़रूर पर एक दूसरे से निश्चित दूरी का ख़्याल रखकर।
यह सुनने में भले ही अटपटा है कि दुनिया के ज़्यादातर देश कोरोना से लड़ने के लिए लॉकडाउन का विकल्प चुने हुए हैं वहीं स्वीडन सोशल डिस्टेंसिंग के बूते ही आगे बढ़ रहा है। लोगों में अनुशासन और इस अनुशासन में सरकारी एजेंसियों का विश्वास है कि यहाँ ज़िंदगी की रफ़्तार पर पूरी तरह ब्रेक नहीं लग पाया है।
अनुशासन और विश्वास के भरोसे ही यहाँ की पब्लिक हेल्थ एजेंसी अभी फ़्रंट फुट पर खेल रही है। बेशक यहाँ कोरोना से मरने वालों की संख्या पड़ोसी देशों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है लेकिन जनता में अनुशासन और दूरगामी नीतियों की बदौलत स्वीडन को कोरोना काल से उबरने का भरोसा है। यह उम्मीद भी है कि स्वीडन को कोरोना से इटली और स्पेन जितनी क्षति नहीं होगी।
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