ग्रामीण अंचलों में ये योजना घर-घर पहुंची है।
- फोटो : फोटोः अनुज अनुज द्विवेदी
योजना अच्छी लेकिन खस्ताहाल शौचालय
इस योजना की सबसे सुखद बात ये है कि ग्रामीण अंचलों में घर-घर तक ये योजना तेजी से पहुंच तो रही है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अधिकांश स्थानों पर प्रधानों और सचिवों द्वारा ही शौचालय निर्माण कराया जा रहा है। शौचालय निर्माण के दौरान खराब क्वालिटी का मसाला भी प्रयोग किया जा रहा है। शासन से लेकर जिला प्रशासन और ब्लॉक तक इस योजना को तय समयसीमा तक पूर्ण कराने हेतु सिर्फ तेजी के दिखावे के साथ दबाव में भी है जिसके कारण निर्माण कार्य भी अच्छा नहीं हो रहा।
पानी की जद्दोजहद के बीच 'शौचालय'
एक तरफ शौचालय निर्माण को लेकर प्रशासन तेजी से लगा है और अधिकांश गांवो में निर्माण प्रक्रिया अपने आखिरी चरण में है, वहीं बुन्देलखण्ड जो कि सूखे के लिए हमेशा से चर्चा में रहा है, यहां शौचालय निर्माण होने के बाद लोग सिर्फ इसलिए प्रयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि पानी की समस्या है। इस समस्या के कारण सबसे ज्यादा दिक्कत पाठा क्षेत्र में हो रही है। यहां मारकुंडी, अमचूर नेरुआ, इटवां, डोडामाफी, ददरी, रुकमा,रानीपुर,कशेरुआ जैसे क्षेत्रों में पानी की समस्या के कारण शौचालय बनने के बाद भी अधिकांश ग्रामीण बाहर ही शौच के लिए जाते हैं। सैकड़ो गांव पानी की समस्या के कारण प्रभावित हैं।
अशिक्षा के कारण खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त ग्रामीण
- फोटो : फोटोः अनुज अनुज द्विवेदी
अशिक्षा के कारण खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त ग्रामीण
किसी भी योजना का आम लोग तभी फायदा उठा सकते हैं जब वह शिक्षित हों। शायद यही कारण है कि खुले में शौच जाने को लेकर ज्यादातर लोग सही मानते हैं, जबकि ऐसा नही है। सरकार को यही तेजी और दबाव लोगों की शिक्षा की गुणवत्ता पर लगाना चाहिए था। बुन्देलखण्ड क्षेत्र वैसे भी शिक्षा की दृष्टि से काफी पीछे है और इसका पाठा क्षेत्र तो काफी पीछे है। यहां रहने वाले आधे से ज्यादा आदिवासी जाति के लोग बड़ी मुश्किल से ही हाईस्कूल तक पढ़ने गए होंगे। ऐसे में जिस योजना का (शौचालय) का जागरूकता से सीधा ताल्लुक हो उसमे अशिक्षित लोगों के समूह से आप किंतनी आशा कर सकते हैं। शायद यही विडम्बना है कि सरकार को जिस क्षेत्र में शिक्षा की गुणवत्ता पर धन और बल खर्च करना चाहिए, वहीं पूरा सरकारी सिस्टम शौचालय और आवास निर्माण में लगा है।
ओडीएफ के बावजूद खुले मे क्यों?
स्वच्छ भारत मिशन बड़ी संख्या में गांवों को ओडीएफ यानी की खुले से शौच मुक्त घोषित करने के बावजूद खुले में शौच की आदत बरकरार है क्योंकि शौचालय तो बनवा दिए गये लेकिन शौचालय के महत्व के बारे मे नहीं बताया गया। ओडीएफ की अनिवार्य शर्त शौचालय का इस्तेमाल है. यानी जब तक किसी गांव के सभी घरों के सभी सदस्य शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते, तब तक उस गांव को ओडीएफ घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन जल्दबाजी के चक्कर मे शौचमुक्त गांव का दिखावा किया जा रहा है। गांवों को ओडीएफ घोषित करने मे जबरदस्त तेजी है। ओडीएफ घोषित करने के तौर-तरीकों पर सवालिया निशान लग रहा है।
बुंदेलखंड से ग्राउंड रिपोर्ट.
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