वो जिंदगी के सबसे हसीन पल थे। तब बड़ों की तरह हमें और आपको जाड़े नहीं, बल्कि गर्मियां पसंद थीं।
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कोई बड़ा पानी पीने के लिए जाग जाता तो चोरी पकड़ी जाती कि बच्चे घर से फरार हैं। फिर बच्चों को अगली दोपहरी एक मजेदार सजा मिलती। सभी को एक कमरे में बच्चों की मैग्जीन और कॉमिक्स के साथ बंद कर दिया जाता। फिर पूरी दोपहरी हम सब कॉमिक्स पढ़ते। मैग्जीन में रास्ता ढूंढो जैसे खेल खेलते। पढ़ने से ऊब जाते तो लूडो और सांप सीढ़ी खेलते।
वो ऐसा दौर था, जब गर्मी के फुरसत भरी दोपहरी में सभी कुछ न कुछ पढ़ते थे। पढ़ते-पढ़ते मुंह पर किताब रखकर सो जाने का रिवाज था। मोबाइल के साथ ऐसा नहीं कर सकते हैं। बच्चों के लिए ढेरों मैग्जीन छपती थीं, जिन्हें बच्चे एक-दूसरे से एक्सचेंज करके पढ़ते थे। भइया क्रिकेट की मैग्जीन पढ़ते। मम्मी और दादी सारिका पढ़ते।
दादा और पापा दिनमान या धर्मयुग पढ़ा करते थे। धर्मयुग का ढब्बू जी वाला कार्टून तो हम बच्चे भी पढ़ लिया करते। हम सब ढब्बू जी, चाचा चौधरी और साबू के इस कदर फैन थे कि कापियों पर उसे बड़ी खूबसूरती से उकेरा करते। कई बार जोश में इसे गलत कॉपी पर बना दिया करते। स्कूल में कुटाई होने पर ही मालूम पड़ता कि दिल गलती कर बैठा है। तब के मास्टर ऐसे उदार नहीं थे कि सिर्फ बेंच पर खड़ा करके छोड़ दें। मां जैसे अदरख कूटती हैं वैसे ही बच्चे कूटे जाते थे। गर्मी की वो कुटाई ज्यादा असर नहीं करती थी, जितनी जाड़े की।
गूलर के पेड़ की फुनगी और परी वाली कहानी
तब सभी कुदरत के संग जीते थे। गर्मी की रातों में बड़े से आंगन में खूब सारी चरपाइयां बिछा करतीं। सभी खुले आसमान के नीचे सोया करते। रात को पुरवाई के बीच खुले आसमान तले ओस से नम बिस्तर पर लेटकर साफ आसमान में तारे गिनना भी एक मजेदार खेल था। इस बीच कोई जुगनू दिख जाता तो बड़ा ही मजा आता। लगता कोई तारा आसमान में उड़ा चला जा रहा है।
गर्मी की रातों में जब बच्चे खुली छत पर दादी के साथ सोते, तो दादी कहती कि रात को गूलर के पेड़ की फुनगी पर बहुत सुंदर सा फूल खिलता है। उसे रात बारह बजे चुपके से बहुत खूबसूरत सी परी तोड़ ले जाती है। उस परी को देखने के इंतजार में कितनी ही रातें बोझिल आंखों से जागने की कोशिश करते हुए सो जाते।
कभी भी रात बारह बजे तक नहीं जाग सके और इसलिए न गूलर का फूल देख सके और न ही उस खूबसूरत परी के ही दीदार हो सके, जिसके पंख सोने के होते थे। दादी ऐसा ही कहा करती थीं। दादी यह भी कहती थीं कि अगर किसी को गूलर का फूल मिल जाए तो वह आदमी बहुत अमीर हो जाता है।
नवीं क्लास में जब पढ़ाया गया कि गूलर का फूल उसके फल के अंदर बहुत बारीक सा पाया जाता है तो पता चला कि लोग गूलर के फूल से नहीं, बल्कि मेहनत से अमीर होते हैं। बेचारी दादी। वो बहुत भोली थीं।
वो जिंदगी के सबसे हसीन पल थे। तब बड़ों की तरह हमें और आपको जाड़े नहीं, बल्कि गर्मियां पसंद थीं। गर्मी के वो दिन सुनहरे थे। कभी थोड़ी सी फुर्सत निकालिए न और यादों की अलमारी को जरा आहिस्ता से खोलिए। वहां आपके बचपन की एक किताब होगी। उसे झाड़िए-पोंछिए और फिर आहिस्ता-आहिस्ता उसके पन्ने पलटिए।
उन पन्नों पर भूला-बिसरा सा बहुत कुछ मिलेगा, जो छूट गया है। सच मानिए आपको बहुत ही मजा आएगा, जब आप किसी इतवार की शाम कुछ दोस्तों के साथ बैठकर लेमन टी के साथ किताब के उन पन्नों को पलटेंगे। वहां आपको गर्मी की दोपहरियां मिलेंगी। लू के थपेड़ों के बीच खेलते-कूदते आप मिलेंगे। इमली, कमरख, शहतूत, फालसा तोड़ते-बीनते बच्चों का समूह नजर आएगा। जबरदस्ती किसी कमरे में कॉमिक्स के साथ बंद कर दिए गए कुछ बच्चे मिलेंगे।
वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है। बच्चे अब खेलते नहीं हैं। वो मोबाइल में मस्त हैं। मोबाइल उनकी स्मृति को ही कमजोर नहीं कर रहा है, बल्कि उनकी कल्पनाशीलता भी छीन रहा है। कल्पनाशीलता जीवन में बहुत ही उपयोगी है। खास तौर से क्रिएटिव फील्ड के लिए। अपने बच्चों को अपने जैसा बचपन दीजिए। इससे आप उनकी दुनिया को खूबसूरत बना सकेंगे।
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