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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सुधा कोंगारा- बहुभाषीय सिने निर्देशक

सार

सुधा कोंगारा ने अपने 15-16 साल के सिने-कैरियर में कई भाषाओं में काम किया। दो नेशनल, दो साउथ फिल्मफेयर तथा सीमा (SIIMA) एवं अन्य कई पुरस्कार जीते हैं।
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निर्देशक सुधा कोंगरा - फोटो : Twitter
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विस्तार
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आपने ‘साला खडूस’ फिल्म अवश्य देखी और सराही होगी। इस फिल्म ने माधवन को एक बार फिर से फिल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया था। इस फिल्म के लिए माधवन ने दो साल कड़ी मेहनत की और यह मेहनत रंग लाई। माधवन का शारीरिक सौष्ठव और मासूम मुस्कान इस फिल्म पर आइसिंग है। हम सब जानते हैं कि भ्रष्टाचार हर विभाग में है, खेल विभाग में इसका होना कोई आश्चर्य नहीं है। पर जब दर्शक इसे रुपहले परदे पर देखता है, तो उसका खून खौल उठता है। वह चाहता है कि नायक को न्याय मिले।

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‘साला खडूस’ में भी आदि (आर. माधवन) बॉक्सिंग फेडेरेशन के भ्रष्टाचार का शिकार होता है और उसे परिदृश्य से गायब करने के लिए अधिकारी देव खत्री (ज़ाकिर हुसैन) दक्षिण रवाना कर देता है। अब वह वहां नेशनल वीमेन’स बॉक्सिंग का कोच है। वह बहुत कड़क पर अप्रतिम कोच है, इसीलिए ‘साला खडूस’ कहलाता है। इस फिल्म की दूसरी मजबूत कड़ी है, इसकी नायिका रितिका सिंह, और फिल्म की सफलता का श्रेय जाता है सिने-निर्देशक सुधा कोंगारा को।

असल में मैं ‘साला खडूस’ फिल्म से अधिक उसकी निर्देशक सुधा कोंगारा (कहीं-कहीं क्रेडिट में प्रसाद लिखा भी आता है) की बात करना चाह रही हूं। वही सुधा कोंगारा जिन्होंने अपने 15-16 साल के सिने-कैरियर में कई भाषाओं में काम किया, दो नेशनल, दो साउथ फिल्मफेयर तथा सीमा (SIIMA) एवं अन्य कई पुरस्कार जीते हैं।
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यूं तो सुधा का जन्म एक तेलगू भाषाभाषी परिवार में 29 मार्च 1989 को हुआ है पर उन्होंने बहु भाषीय सिनेमा रचा है। वे तमिल, तेलगू, हिन्दी, इंग्लिश भाषाओं के सिनेमा को सहजता से सृजित करती हैं।

वैसे उनका लालन-पालन चेन्नई (एक समय के मद्रास) में हुआ और उन्होंने चेन्नई के वोमेन’स क्रिश्चियन कॉलेज से हिस्ट्री तथा मॉस कम्युनिकेशन में डिग्री प्राप्त की। उन्होंने अपने फिल्मी-जीवन का प्रारंभ इंग्लिश में बनी भारतीय फिल्म ‘मित्र, माई फ्रेंड’ की। वे इस फिल्म की स्क्रीनराइटर थीं और इस फिल्म को उस वर्ष (49वां राष्ट्रीय फिल्म समारोह) का सर्वोत्तम इंग्लिश फिल्म का पुरस्कार हासिल हुआ था। 

फिल्म ‘मित्र, माई फ्रेंड’

इस फिल्म की निर्देशक भी एक स्त्री है। रेवती इसकी निर्देशक हैं। इसमें एक उपेक्षित पत्नी चैट-रूम में ई-फ्रैडशिप खोजती है, जबकि उसकी बेटी शक करती है कि उसकी मां पड़ोसी से इश्क लड़ा रही है। ‘मित्र, माई फ्रैंड’ में शोभना, नासर अब्दुल्ला जैसे मंझे हुए अभिनेताओं ने काम किया है। फिल्म का बैकग्राउंड म्युजिक भव्यतारिणी आर. तथा कार्तिक राजा का है। खैर लौटें सुधा कोंगारा पर।

इस स्क्रीमराइटिंग के बाद सुधा ने 7 साल तक मणि रत्नम जैसे दिग्गज सिने-निर्देशक के सहायक के रूप में काम किया और निर्देशन के गुर सीखे। 2008 में सुधा ने तेलगू फिल्म ‘आंध्रा अंडगाडु’ (आंघ्रा का खूबसूरत आदमी) बनाई। इस फिल्म की स्क्रीनराइटिंग के साथ-साथ सुधा ने इसका निर्देशन भी किया। मगर फिल्म कुछ खास न चली। पर सुधा ने हार नहीं मानी और दो साल बाद 2010 में वे तमिल फिल्म ‘द्रोही’ के साथ हाजिर थीं। इसका भी उन्होंने लेखन तथा निर्देशन किया।

करीब दो घंटे की यह फिल्म दो वर्ग के दोस्तों की दोस्ती और दुश्मनी की कहानी के साथ-साथ प्रेम कहानी भी है। फिर छ: साल बाद सुधा तमिल और हिंदी में एक साथ लेकर आईं ‘साला खडूस’/ ‘इर्युडि शुट्रु’ (लास्ट राउंड) जिसे एक साल बाद तेलगू में ‘गुरु’ नाम से बनाया।

इस फिल्म के विषय में ऊपर थोड़ा-सा लिखा जा चुका है। इस फिल्म के साथ सुधा कोंगारा राष्ट्रीय फलक पर छा गईं। फिल्म का संगीत संतोष नारायन का है और सिनेमाटोग्राफर हैं शिवकुमार विजयन। सारे अभिनेताओं ने बेहतरीन काम किया है। 
 

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फिल्म सूराराई पोट्ट्रु का एक दृश्य - फोटो : Twitter
माधवन कोच के रूप में कड़क है, मगर अपनी खूबसूरत मुस्कान से न केवल दर्शकों वरन नायिका का दिल भी जीत लेते हैं। इसीलिए मदि बनी अभिनेत्री रितिका फिल्म में कहती है ‘तुम भले ही बूढ़े खडूस मास्टर हो...मगर तुम्हारी मुस्कान गजब की प्यारी है।’ नासर ने जूनियर कोच के रूप में कमाल का अभिनय किया है उनकी हिन्दी सुनना अच्छा लगता है।

काली वेंकट की हिन्दी सुन कर आश्चर्य होता है, रितिका के पिता की भूमिका में उन्होंने डबिंग के लिए सटीक होंठ संचालन किया है। ज़ाकिर हुसैन ने खलनायक को साकार कर दिया है। कहने का मतलब है यदि आपको स्पोर्ट्स मूवीज पसंद है तो ‘साला खडूस’ अवश्य देखें।

तमिल फिल्म ‘सूराराई पोट्ट्रु’

2020 में सुधा ने एक बार फिर स्क्रीनप्ले और निर्देशन किया और एयर डेकन के संस्थापक जी. आर. गोपीनाथ के जीवन से प्रेरित हो कर ‘सूराराई पोट्ट्रु’ फिल्म तमिल में बनाई। फिल्म का नायक मारा (सूर्या) के सपने न केवल खुद उड़ने के हैं बल्कि वह हर सामान्य आदमी को हवाई यात्रा कराना चाहता है। मारा स्वयं एक सामान्य पृष्ठभूमि से आता है। फिल्म मार्क्सवाद, स्त्री-पुरुष समानता के आदर्शों को लेकार आगे बढ़ती है।

मारा सामाजिक भेदभाव के खिलाफ है, वह चाहता है कि न केवल अमीर हवाई यात्रा करें वरन हर सामान्य नागरिक भी उड़ान भर सके। उसकी चाहत की शुरुआत होती है जब वह अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए पैसों की कमी के कारण जहाज से नहीं जा पाता है, वह प्रण करता है कि न केवल धरती पर वह आकाश में भी वर्ग समानता लाएगा। इसी दौरान वह भूमि (अपर्णा बालमुरली) से मिलता है। भूमि भी जिद की पक्की है, दोनों मिल कर पितृसत्ता से भी लड़ते हैं।

नेडुमारान मतलब मारा की इस जटिल यात्रा में कई बाधाएं आती हैं मगर उसकी लगन, परिश्रम तथा जिद एक दिन रंग लाती है। जितना ही उसे दबाने की कोशिश की जाती है उसकी जिद उतनी ही बढ़ती जाती है। वह संघर्ष से पीछे नहीं हटता है, घबराता नहीं है और एक दिन वह लो-कॉस्ट कैरियर लाइन स्थापित करने में सफल होता है।

इस फिल्म में हिन्दी फिल्मों के अभिनेता परेश रावेल भी हैं।

ढ़ाई घंटे की इस फिल्म का संगीत जी. वी. प्रकाश कुमार ने दिया है और कैमरा संभाला है निकेत बोमीरेड्डी ने। फिल्म ‘सूराराई पोट्ट्रु’ ने अभी तक कुल 23 पुरस्कार हासिल किए हैं। इन पुरस्कारों में फिल्मफेयर साउथ पुरस्कार, नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स (सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले तथा सर्वोत्त्म फिल्म), इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ मेकबर्न (सूर्या को सर्वोत्तम अभिनेता) एवं सर्वोत्तम निर्देशन हेतु SIIMA पुरस्कार शामिल है। 

आजकल सुधा कोंगारा तमिल फिल्म ‘सूराराई पोट्ट्रु’ को हिन्दी में बनाने में जुटी हुई हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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