मनुष्य अपने जीवन का ज्यादातर वक्त अपनी सीमाओं से संघर्ष करते हुए गुजार लेता है। वह अपनी दुर्बलताओं पर दुखी होता है, असफलताओं से निराश होता है और अपनी कमियों को अपने दुखों का कारण मानता है। उसे लगता है कि अगर वह ज्यादा बुद्धिमान, शक्तिशाली, धनी या कामयाब होता, तो उसका जीवन और बेहतर होता। लेकिन, मैं मानता हूं कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसकी सीमाएं नहीं, उसका अहंकार है। सीमाएं तो मनुष्य के अस्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा हैं। हम सीमित ज्ञान के साथ जन्म लेते हैं। हमारा शरीर, समय और हमारी शक्ति भी सीमित है। हम सब कुछ नहीं जान सकते, सब कुछ नहीं कर सकते। यह कोई त्रासदी नहीं है। त्रासदी तो तब शुरू होती है, जब हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं। और, ऐसा सिर्फ अपने अहंकार की वजह से।
अहंकार हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमें सीमित नहीं रहना चाहिए। वह हमारे कान में फुसफुसाता है कि हम दूसरों से ज्यादा बेहतर, महत्वपूर्ण व योग्य हैं। वह हमें वास्तविकता से नहीं, बल्कि अपने बारे में एक कल्पना से प्रेम करना सिखा देता है। यही कारण है कि मनुष्य की बहुत-सी पीड़ाएं उसकी कमियों से नहीं, बल्कि उसकी आत्म-छवि से उत्पन्न होती हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वीकार कर ले कि उसके जीवन में कमियां हैं, तो वह उन्हें सुधारने की दिशा में बढ़ेगा। परंतु, अहंकार कहता है-तुम्हें हारना नहीं चाहिए। तुम्हें हमेशा श्रेष्ठ दिखना चाहिए। और इस प्रकार अहंकार मनुष्य को एक ऐसे बोझ तले दबा देता है, जिसे कोई भी मनुष्य उठा नहीं सकता। यह संसार सीमित प्राणियों का संसार है। फिर भी, हम अपने लिए ऐसी अपेक्षाएं बना लेते हैं, जैसे हमें पूर्ण होना ही चाहिए। और, जब हकीकत उन अपेक्षाओं को तोड़ती है, तो हम दुखी हो जाते हैं।
मुझे लगता है कि ईश्वर ने मनुष्य को सीमित इसलिए बनाया, ताकि वह संबंधों में जीना सीखे, ईश्वर के साथ भी और मनुष्यों के साथ भी। हमें प्रेम, दोस्ती और मार्गदर्शन की भी जरूरत है। लेकिन, अहंकार आत्मनिर्भरता का ऐसा स्वप्न दिखाता है, जिसमें किसी और के लिए कोई स्थान नहीं होता। वह चाहता है कि मनुष्य स्वयं ही अपना केंद्र, अपना नियम और अपना उद्देश्य बन जाए। यही कारण है कि अहंकार प्रेम का सबसे बड़ा शत्रु है। प्रेम कहता है-मैं तुम्हें देखता हूं। अहंकार कहता है-मुझे देखो।
जब मनुष्य अपने अहंकार से मुक्त होने लगता है, तभी वह पहली बार स्वतंत्र होता है। तब वह सीख सकता है, क्योंकि उसे अज्ञानी दिखने का भय नहीं रहता। तब वह प्रेम कर सकता है, इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि मनुष्य की समस्या उसकी सीमाएं हैं। सीमाएं तो उसके अस्तित्व का हिस्सा हैं। समस्या यह है कि वह अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं करना चाहता। उसका अहंकार उसे वास्तविकता से युद्ध करने के लिए उकसाता है। और जब तक यह युद्ध चलता रहेगा, मनुष्य अशांत रहेगा।
सूत्र- खुद को स्वीकार करें
मनुष्य की सच्ची शक्ति उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को स्वीकार करने के साहस में है। जो अपनी कमियों से भागता है, वह जीवनभर अशांत रहता है, लेकिन जो उन्हें अपनाकर निरंतर स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करता है, वही वास्तविक सफलता और शांति प्राप्त करता है। विनम्रता हमें भीतर से महान बनाती है।