निर्भया कांड के बाद बीबीसी द्वारा एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई। नाम था 'इंडियाज डॉटर।'
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दिल्ली के घाव और हमारी सोच
दिल्ली में हुए भयावह निर्भया कांड को कोई भी भूला नहीं है। भूलेगा भी कैसे लगभग हर रोज कोई न कोई लड़की निर्भयता से आगे बढ़ने को क़दम बढाती है और कहीं न कहीं शरीर या मन के स्तर पर रौंद दी जाती है। चाहे उसकी उम्र कुछ भी हो, चाहे वो घर में हो या घर के बाहर और चाहे उसने साड़ी पहनी हो, बुर्का या फ्रॉक।
तो उस घटना के बाद बीबीसी द्वारा एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई गई। नाम था 'इंडियाज डॉटर।' लेस्ली उडविन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में निर्भया के दोषियों में से एक का इंटरव्यू था जिसमें उसका कहना था-'उस लड़की को बलात्कार के समय लड़ना नहीं चाहिए था। चुपचाप पड़ी रहती और हमें अपना 'काम' करने देती तो हम उसे बाद में 'बिना चोट पहुंचाए' बस से उतार देते। वैसे भी रात के 9 बजे भले घर की लड़कियां ऐसे घर से बाहर थोड़े ही घूमती हैं। इसलिए बलात्कार के लिए लड़कों से ज्यादा लड़कियां ही दोषी हैं।'
किसी ने यह नहीं कहा कि हमारी बेटी या बहन के साथ कोई ऐसा करता तो हम उस आरोपी के साथ क्या करते क्योंकि ज्यादातर मामलों में तो सबसे पहले अपनी बेटी या बहन पर ही घटना का दोष मढ़ दिया जाता है। बलात्कारियों के लिए तो हमारे पास तयशुदा सजाएं हैं। मगर बलात्कार पीड़ित के लिए सजाओं के कई विकल्प हैं।
उदाहरण के लिए, अगर लड़की किसी तरह मरने से बच जाए तो बलात्कार के बाद जीवन भर के लिए उसका घर से निकलना, सामाजिक जीवन जीना बंद करवा दो और अगर वह पढ़ रही है तो सबसे पहले उसका स्कूल या कॉलेज छुड़वा दो।
उसके बाद जिंदगी भर उसे उस तकलीफ के लिए कोसो जो लड़की होने के कारण उसने पाई। उसे जीवन भर सिर नीचा किए जीने को कहते रहो क्योंकि उसने अपने सहित पूरे परिवार, समाज की इज्जत गंवा दी।
यदि किसी तरह न्याय व्यवस्था तक मामला पहुंचा और आरोप सिद्ध होने और सजा मिलने तक यदि लड़की बची रह गई तो आरोपी को मिलने वाली सजा मुकर्रर होगी जिसका प्रतिशत बहुत कम है।
और फिर लड़की के लिए एक सजा होगी, जिन्दगी भर इस डर के साथ जीना कि आरोपी कहीं बदला लेने न आ धमके। वैसे न्याय व्यवस्था के अलावा समाज व्यवस्था ने भी एक सजा तय कर रखी है, जो है पीड़िता की शादी बलात्कारी से ही करवा देने की सजा।
ये सजा बलात्कारी से ज्यादा पीड़ित के लिए सजा है क्योंकि इसके बाद समाज तो अपराध करने वाले को खुले दिल से अपना लेता है बल्कि उसे रोज अपना अपराध दोहराने की छूट दे देता है और पीड़ित जिंदगी भर सजा पाते रहने की पात्र हो जाती है।
जरूरी ये है कि हम लड़कों को ये सिखाएं कि लड़कियां महज शरीर नहीं हैं, उनका सम्मान करना जरूरी है।
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शर्मसार करते हैं आकड़े
आंकड़े बताते हैं कि देशभर में हर साल लड़कियों से होने वाली छेड़छाड़ (असली अपराध, झूठे मुकदमे नहीं) की रिपोर्ट बमुश्किल कुछ प्रतिशत लड़कियां या उनके परिजन लिखवाने की हिम्मत कर पाते हैं। बलात्कार को तो छोड़ ही दीजिए, छेड़छाड़ तक की ज्यादातर रिपोर्ट वापस ले ली जाती हैं।
ज्यादा दूर क्यों जाएं। अभी दो दिन पहले ही तमिलनाडु में एक स्कूली बच्ची ने यौन प्रताड़ना से तंग आकर जान दे दी। उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि दुनिया में सिर्फ दो ही जगहें हैं जो (लड़कियों के लिए) सुरक्षित हैं। पहली है माँ की कोख और दूसरी है कब्र! एक बच्ची जो भविष्य के सपने आंखों में लेकर, अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ने के बारे में सोच रही होती है। वो सिर्फ इसलिए अपनी जान दे देती है क्योंकि उसका शरीर किसी की नजर में आ जाता है।
यह पहला केस नहीं है जहां शिकायत करने की बजाय (या शिकायत अनसुनी होने के बाद) लड़कियों ने तंग आकर जान दे दी है। अब दो ही चीजें बचती हैं, या तो सारी लड़कियां मिस्टर इंडिया हो जाएं (मिस इंडिया तो अदृश्य हुई तो भी सूंघ ली जाएगी) या फिर केवल लड़के ही पैदा होते चले जाएं।
आश्चर्यजनक है यह सोच पीड़ित और पीड़ा दोनों का मजाक उड़ा सकती है। नेता हों या अभिनेता, बलात्कार उनके लिए महज शब्द है जिसे वे कहीं भी उपयोग में ला सकते हैं, बिना सोचे, बिना समझे। वैसे सोच-समझ होती तो ये नौबत ही क्यों आती भला।
तो जरूरी ये है कि हम लड़कों को ये सिखाएं कि लड़कियां महज शरीर नहीं हैं, उनका सम्मान करना जरूरी है। लड़कियों को भी ये गांठ बांधने को कहें कि उनका शरीर शर्म की वजह नहीं और अगर कुछ गलत होता है तो हम तुम्हारे साथ हैं, गलत करने वाले के साथ नहीं।
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