आयोजकों को भी ऐसे हादसों को गंभीरता से लेना चाहिए। आने वाले भक्तों का ख्याल रखना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
- फोटो : अमर उजाला
आपदा प्रबंधन की चुनौतियां और भारत
आजादी के 77 वर्ष बाद भी आपदा प्रबंधन को लेकर देश आज भी बहुत पीछे है। हाथरस हादसे ने एक बार सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोली है। हद तो यह है कि जब घायलों को लेकर लोग अस्पताल में पहुंचे तो वहां भी उचित प्रबंध नहीं था। डॉक्टर नदारद थे। शवों को अस्पतालों में फर्श पर डाल दिया गया। घायल भी वहीं पटक दिए गए। जिस समय हाथरस हादसे की खबर आई, उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चाओं का जवाब दे रहे थे। उन्होंने अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। कुछ देर बाद मुआवजा राशि का भी ऐलान किया। अब प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि देश में एक और हाथरस न हो, इसके लिए उचित कदम उठाए जाएं।
हाथरस से लेकर लखनऊ तक पूरा सरकारी तंत्र राहत और बचाव कार्यों में जुट गया, लेकिन इतना भर करने से काम नहीं चलने वाला। हाथरस जैसे हादसों की पुनरावृत्ति रुकनी चाहिए। धार्मिक आयोजन करने से शासन-प्रशासन किसी को रोक नहीं सकता है, लेकिन नियम बनाकर उनका सख्ती से पालन कराना तो सरकार की जिम्मेदारी है, ताकि ऐसे हादसों से बचा जा सके।
आयोजकों को भी ऐसे हादसों को गंभीरता से लेना चाहिए। आने वाले भक्तों का ख्याल रखना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि हमने पूर्व के ऐसे हादसों से सबक लिया होता तो ईश्वर का नाम लेने आए 100 से अधिक लोग अपनी जान न गंवाते। हमारे लिए हाथरस केवल एक घटना नहीं, एक सबक होना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।