इस बार ये आग रामभक्त हनुमान की पूंछ ने नहीं लगाई है, क्योंकि अब न तो लंका सोने की रह गई है और न पीतल की। अब लंका को जलाने वाली खुद वहां की बदहाल, परेशान जनता है जो लंबे समय से भूख, गरीबी और भीषण महंगाई के बीच जीने को अभिशप्त हो गई है। महंगाई तो छोड़िए, वहां के सत्ताधारियों ने जनता के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं है। तमाम तीसरी दुनिया के देश कर्ज लेते हैं और तकरीबन हर देश अमेरिका, चीन, जापान, रूस जैसे विकसित देशों के कर्जजाल में फंसा हुआ है। पाकिस्तान हो नेपाल हो, बांग्लादेश हो या फिर श्रीलंका, इन अमीर देशों की नजर में भारतीय उपमहाद्वीप के इन देशों को अपना आर्थिक गुलाम बनाने की प्रक्रिया बदस्तूर जारी रहती है। रिश्ते बेहतर बनाने और मदद के नाम पर यहां के हर सत्ताधारी विकास का हवाला देकर इस चक्रव्यूह में फंसते हैं और इसका खामियाजा उठाती है- वहां की जनता। अगर आपका प्रबंधन ठीक नहीं है तो हालात श्रीलंका जैसे होने में वक्त नहीं लगता।
श्रीलंका में विद्रोह की लपटें पिछले तीन चार महीनों से उठने लगी थीं। हालात धीरे धीरे बेकाबू होते जा रहे थे। चीन पर बढ़ती निर्भरता और कर्ज के भयानक जाल में बुरी तरह उलझ चुके इस देश के सत्ताधारियों ने आम जनता की सुध नहीं ली, उनकी रोजमर्रा की तकलीफों के बारे में नहीं सोचा और उन्हें भूखे, प्यासे और अंधेरे में रहने को मजबूर कर दिया। जाहिर है विद्रोह होना ही था। इसकी भूमिका महीनों से बन रही थी। शनिवार को इसकी पराकाष्ठा थी और आगे भी तबतक रहेगी जबतक कोई कारगर सरकार नहीं बन जाती। राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए रास्ते खोले गए हैं लेकिन इससे भी स्थितियां कितनी सुधरेंगी कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो लोगों का जो गुस्सा है वो देश से भागे मौजूदा राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के खिलाफ है। उन्हें लगता है कि हमारे पैसों पर ये नेता एय्य्शी कर रहे हैं और हम भूखे मरने को मजबूर हैं। इसी गुस्से का इजहार राष्ट्रपति निवास में घुसे हजारों लोगों की भीड़ ने किया.. बेडरूम से लेकर, स्वीमिंग पूल तक और पूरे परिसर में इनका कब्जा यूं ही नहीं हो गया। पीएम आवास को यूं ही नहीं जला दिया गया। अप्रैल में भी ऐसे हिंसक प्रदर्शन हुए थे। राष्ट्रपति निवास के सामने आगजनी हुई थी। राजपक्षे ने डर कर अपना निवास छोड़ दिया था और कोलंबो फोर्ट में रहने लगे थे। इस बार तो वो देश से ही भाग गए।
श्रीलंका में विद्रोह की ऐसी तस्वीरें पहले किसी ने नहीं देखी होंगी। शायद किसी देश में ऐसा नहीं हुआ कि राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास पर सीधे तौर पर कब्जा करने और आग लगाने की ऐसी कोशिश हुई हो। नेपाल में राजशाही के खात्मे के वक्त वहां के राजमहल पर कब्जा हुआ था और तत्कालीन राजा को भागना पड़ा था, लेकिन वहां भी ऐसा भयानक मंजर नहीं आया था। सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुक्मरानों पर हमले भी कई दफा हुए, हत्याएं हुईं, लेकिन जनता का ऐसा सैलाब कभी नहीं उमड़ा।
दुनिया के तमाम देश इस वक्त भीषण आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं, खासकर तीसरी दुनिया के देशों में हालात हमेशा से खराब रहे हैं। आंदोलन तो तमाम चलते ही रहे हैं, सत्ता पलटने की कोशिशें भी हुई हैं, लेकिन करीब सवा दो करोड़ की आबादी वाले श्रीलंका में पिछले तीन महीनों से जो हालात बन रहे थे, शनिवार को उसकी परिणति कुछ इस तरह हुई कि दुनिया देखती रह गई।
देश में बेहद गहरे होते आर्थिक संकट की वजह से श्रीलंका में ‘गोटा गो होम’ (गोतबया वापस जाओ) आंदोलन की जिस तरह तीन महीने पहले शुरुआत हुई, तब से ये लगातार पूरे देश में फैलता गया और इसका विस्तार इस कदर हुआ कि आम जनता ने सत्ताधारियों को पूरी आक्रामकता के साथ ये संदेश दे दिया कि जनता भूखी रहे, महंगाई में पिसती रहे, ऐसे में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ऐशो आराम के साथ सरकार में नहीं बैठे रह सकते। जनता ने ही उन्हें सत्ता पर बैठाया है तो उस ‘ऐशो आराम’ की हकदार जनता भी है।
शनिवार को ये आंदोलन और इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन तो पहले से तय था, लेकिन उसका यह रूप होगा, यह नहीं सोचा गया था। हालांकि खुफिया तंत्र की जानकारियों की वजह से ही वक्त से पहले राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे राष्ट्रपति भवन छोड़कर भाग चुके थे, प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी खुद को बचाते हुए पद से इस्तीफा दे दिया और उन्हें इस संभावित हमले से बचाकर शाम पांच बजे ही निकाल लिया गया। राष्ट्रपति राजपक्षे विदेश भाग गए हैं। लेकिन हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आखिरकार राष्ट्रपति को भी इस्तीफे की घोषणा करनी पड़ी। हालांकि इतना कुछ होने पर भी राजपक्षे ने इस्तीफे का वक्त उन्होंने तीन दिन बाद का दिया है, यानी वो 13 जुलाई को पद छोड़ेंगे। इस बीच वो क्या करेंगे, क्या लोगों के गुस्से के शांत होने का इंतजार या फिर चीन के साथ मिलकर कोई नई रणनीति तैयार करेंगे, ये सवाल उठाए जाने लगे हैं।
श्रीलंका पर विदेशी कर्ज का बोझ पिछले 12 सालों से लगातार बढ़ रहा था। हालात ये हो गए कि जरूरी चीजों का आयात घटाना पड़ा। दवाओं, पेट्रोल-डीजल, गैस और खाद्य वस्तुओं की कमी होने लगी। श्रीलंकाई रुपये की कीमत तेजी से गिरने लगी। जनता का आक्रोश देखते हुए 2019 में राष्ट्रपति गोतबाया ने उन्हें लुभाने के लिए टैक्स कम करने शुरू कर दिए। इससे सरकार का राजस्व 2020 में 656 करोड़ डॉलर रह गया, 2017 में यह 1095 करोड़ डॉलर था। सबसे ज्यादा कमाई वाला श्रीलंका का पर्यटन उद्योग कई वजहों से खत्म होने लगा। आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने लगीं। 2019 में तौहीद जमात नामक मुस्लिम संगठन ने ईस्टर पर चर्च में तीन बम विस्फोट करवाए, 260 निर्दोष नागरिकों की जान गई। इन घटनाओं से दुनियाभर से आने वाले करीब 25 प्रतिशत पर्यटकों ने यहां आना बंद कर दिया। उसके बाद कोरोना काल ने और तबाही मचाई और पर्यटन उद्योग पूरी तरह चौपट हो गया।
दूसरी तरफ सत्ता पर कब्जे के खेल में राजपक्षे परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इस परिवार ने सभी प्रमुख पदों पर कब्जा कर लिया। महिंदा प्रधानमंत्री बने तो भाइयों में से गोतबाया को राष्ट्रपति, बासिल राजपक्षे को वित्त मंत्री, चामल राजपक्षे को सिंचाई व कृषि मंत्री व बेटे नामल राजपक्षे को खेल मंत्री बना दिया। देश के कुल बजट का 70 फीसदी ने इस परिवार ने अपने कब्जे में कर लिया। भ्रष्टाचार के आरोप लगे। बावजूद इसके देश को कर्ज के जाल में डुबोने का खेल जारी रहा। महिंदा राजपक्षे ने 700 करोड़ डॉलर की गैर-जरूरी परियोजनाओं के लिए चीन से फिर कर्ज लिया। इस कर्ज से बने एयरपोर्ट पर कोई उड़ान नहीं थी। नतीजतन हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल के लिए चीन को लीज पर देना पड़ा। आरोप है कि महिंदा व गोतबाया ने तमिलों को क्रूरता से कुचला, जिससे यह समुदाय आर्थिक विकास से कट गया।
जाहिर है लोगों का गुस्सा बढ़ता गया। भीतर ही भीतर आक्रोश चरम तक पहुंचता गया। खासकर श्रीलंका के प्रभावशाली बौद्ध भिक्षुओं ने राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे के इस्तीफे पर जोर डालने के लिए नए सिरे से आंदोलन शुरू कर दिया। इसके लिए वो अनशन पर बैठे। इसके साथ साथ देशव्यापी प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई और आखिरकार शनिवार को लंका जल उठी। बौद्ध भिक्षुओं ने अपना अभियान तीन दिन पहले ही शुरू कर दिया था। गुरुवार को वे वट्टाला नाम की जगह से 12 किलोमीटर पैदल चलते हुए कोलंबो फोर्ट पहुंचे। बीते अप्रैल से राष्ट्रपति राजपक्षे यहीं रह रहे हैं। अप्रैल में उग्र भीड़ ने राष्ट्रपति के निजी आवास को घेर लिया था। उसके बाद राजपक्षे सपरिवार कोलंबो फोर्ट आ गए थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गुरुवार को पैदल मार्च में तकरीबन 100 भिक्षु शामिल थे। लेकिन एक अदालती आदेश के कारण उनके मार्च को बीच में रोक दिया गया।
बौद्ध भिक्षुओं के आंदोलन को राष्ट्रपति राजपक्षे के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है। नवंबर 2019 में हुए चुनाव में भिक्षुओं ने उन्हें अपना पुरजोर समर्थन दिया था। दो करोड़ 20 लाख आबादी वाले श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली समुदाय बौद्ध धर्म को मानता है। इसलिए भिक्षुओं का समर्थन महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों की राय है कि देश में महंगाई और जरूरी चीजों के अभाव के कारण जनमत का एक बड़ा हिस्सा राजपक्षे परिवार से निकटता के कारण भिक्षुओं के खिलाफ होने लगा था। इसीलिए अब बौद्ध भिक्षु सरकार विरोधी रुख अपनाने को मजबूर हो गए हैं।
बेशक श्रीलंका की घटना को तीसरी दुनिया के देशों के लिए सबक के तौर पर देखा जाना चाहिए। कुछ महीने पहले पाकिस्तान में सत्ता पलटी थी, नेपाल का भी वही हश्र दिखा था, लेकिन वहां जनता ने इस तरह विद्रोह नहीं किया था और मामला राजनीतिक तौर पर ही सत्ता की अदाल बदली तक ही रहा था, लेकिन श्रीलंका की जनता ने ये संदेश तो दे ही दिया है कि अगर जनता सत्ता पर बैठा सकती है तो सत्ता से उतारने का हर तरीका भी अपना सकती है।