भारतीय महिला क्रिकेट टीम
- फोटो : BCCI
खेलों में भारतीय सेना की भूमिका
खेलों में भारतीय सेना की भूमिका भी अहम है। आजादी के बाद यदि कहीं खेलों को लेकर गंभीरता रही है तो वह भारतीय सेना में ही रही है। भारतीय सेना में अपने स्तर पर कई बड़े खिलाड़ी तैयार किए। ओलंपिक पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़, विजय कुमार, नीरज चोपड़ा ऐसे ही बड़े नाम हैं। हॉकी टीम में सेना के खिलाड़ी शामिल होते रहे हैं।
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद सेना में मेजर थे। रेलवे, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, इंडियन ऑयल जैसे सरकारी विभाग और कई निजी कंपनियां भी खिलाड़ियों को सपोर्ट कर रही हैं। कई राज्य सरकारों ने खिलाड़ियों को तैयार करने का बीड़ा उठाया है।
वैसे, क्रिकेट के बिना भारत में खेलों की कल्पना नहीं की जा सकती। अच्छा और बुरा, दोनों पक्ष क्रिकेट के साथ जुड़े हैं। क्रिकेट के आलोचकों का मत है कि क्रिकेट के कारण भारत में अन्य खेलों को सही प्रोत्साहन नहीं मिला। दुनिया के मुट्ठी भर देशों में ही खेले जाने वाले क्रिकेट में हमने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।
सरकार ने परोक्ष तो नहीं, लेकिन अपरोक्ष रूप से क्रिकेट का ज्यादा भला किया। देश में आज अन्य खेलों की अपेक्षा क्रिकेट के सर्वाधिक मैदान हैं, जबकि आजाद भारत में 5 ओलंपिक मेडल दिलाने वाली हॉकी के टर्फ मैदान 22-25 ही होंगे। कुछ ऐसी ही स्थिति अन्य खेलों को लेकर भी है।
विडंबना यह है कि भारत आज तक किसी एक खेल को राष्ट्रीय खेल तक घोषित नहीं कर पाया है। वर्ष 2020 में सरकार ने एक आर.टी.आई के जवाब में स्पष्ट किया था कि भारत का कोई आधिकारिक राष्ट्रीय खेल नहीं है।
राष्ट्रीय खेल को लेकर भ्रम की स्थिति
भारत सभी प्रचलित खेलों को बढ़ावा देता है। हद तो यह है कि राष्ट्रीय खेल को लेकर भ्रम की स्थिति जनमानस में भी है। हॉकी को अधिकांश लोग राष्ट्रीय खेल मानते हैं और उसकी दुर्दशा को लेकर सरकार को कोसते हैं। कुछ लोग कबड्डी को राष्ट्रीय खेल मानते हैं। भारतीय नेताओं की अधिक रुचि के चलते कुछ लोग अब क्रिकेट को ही राष्ट्रीय खेल मानने लगे हैं।
बड़ी आबादी के चलते भारत में खेलों को लेकर अपार संभावनाएं हैं। हालांकि, अभी सरकार ने बहुत कम ध्यान इस ओर लगाया है। भविष्य के खिलाड़ियों की पहचान आज भी थोड़ा मुश्किल टास्क है, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली में खेल प्राथमिकता में नहीं हैं।
सरकार को स्कूलों में ऐसा सिस्टम विकसित करने की अति आवश्यकता है, जिससे छोटी उम्र में प्रतिभाओं को पहचान कर उचित ट्रेनिंग की व्यवस्था की जा सके। माता-पिता को भी चाहिए कि यदि उनका बच्चा खेलों में रुचि रखता है तो उसे रोके नहीं, आगे बढ़ने दें।
सरकार ओलंपिक जैसा बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट देश में कराए, ऐसे आयोजनों से खेल का माहौल बनता है। उम्मीद यही है कि भारत में खेलों का स्वर्णिम युग जल्द आएगा और ओलंपिक मेडल टेली में हमारा तिरंगा चमकेगा।
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