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कॉर्पोरेट दुनिया और ऊंचे पदों पर महिला नेतृत्व की सफलता

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क्या कॉरपोरेट जगत् अभी तक भी महिलाओं की काबिलियत तथा उनके प्रबंधन की क्षमता पर भरोसा नहीं करता है? - फोटो : pixa
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यह जमाना बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों और व्यापारिक संस्थाओं का है। इनकी दुनिया में योग्यता व कुशलता तथा प्रवीणता की कसौटी ही लागू होती है, लेकिन कितने आश्चर्य और यहां तक कि परेशानी की बात है कि इस कॉरपोरेट जगत के प्रतिष्ठानों पर में उच्च पद अभी भी महिलाओं को नहीं दिए जा रहें हैं। यहां पर पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है।

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क्या कॉरपोरेट जगत् अभी तक भी महिलाओं की काबिलियत तथा उनके प्रबंधन की क्षमता पर भरोसा नहीं करता है? इस पर प्रश्न अवश्य किए जाने चाहिए। हालांकि यह बात सही है कि 90 के दशक से या उससे कुछ समय पहले से भी महिलाओं का कॉरपोरेट जगत में प्रवेश करना शुरू हो गया था और वह किसी भी संस्थान और प्रतिष्ठान के विभिन्न विभागों में कुशलता से कार्य कर रहीं थी और अभी भी कर रही हैं लेकिन शीर्ष पदों पर उनकी पद स्थापना में अभी भी बहुत बड़ी शून्यता मौजूद है। 

इंदिरा नुई इसका अपवाद हैं और साथ ही वह विदेशी कंपनी में भी हैं - फोटो : pixabay
इंदिरा नुई इसका अपवाद हैं और साथ ही वह विदेशी कंपनी में भी हैं, लेकिन भारतीय कॉरपोरेट जगत खाली सा ही है। बैंकिग क्षेत्र में भी कुछ खास नहीं हुआ। जहां तक कंपनियों में शीर्ष पदों का प्रश्न है तो यह बात साफतौर पर कही जा सकती है कि इसके लिए पूर्वाग्रह मौजूद हैं अभी तक भी यह विश्वास पनप नही पाया कि महिलाओं को इस क्षेत्र में शीर्ष पद सौंपे जाएं तो यह केवल कंपनी के हित में होगा बल्कि महिलाएं अपने नेतृत्व गुणों के कारण उसे और भी अधिक कामयाब कर सकती हैं।

इस ओर बहुत बार सोचा गया है और बातें भी बहुत होती रहीं हैं पर कंपनियों में महिलाओं को नेतृत्व सौंपने में दिलचस्पी नहीं दिखाई या यूं कहें कि उन पर अभी तक पूर्ण विश्वास नहीं किया। महिलाओं की तो अभी यह लड़ाई ही खत्म नही हुई है कि समाज कार्य के लिए समान वेतन उन्हें मिले। तब ऐसे में किसी कंपनी का सर्वोच्च पद उन्हें सौंपने की बात सपने जैसी लगती है।

एक कदम इस ओर और बढ़ा है कि किसी कंपनी के मैनेजिंग बोर्ड में कार्य कुशलता दिखाने वाली कर्मठ महिलाओं को जब नामित किया जाने लगा है। इस तरह से शायद कंपनी को जानने तथा समझने का यह मौका मिल सकता है कि महिलाओँ में काम समझने और उसे आगे ले जाने की कितनी कूवत है। 
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ऑफिस रोमांस - फोटो : pixabay
दरअसल, बहुत बार यह बात हो चुकी है कि यदि किसी देश की आधी आबादी को यदि आर्थिक, सामाजिक तथा उत्पादकता के क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा या उसके योगदान से इन क्षेत्रों को वंचित रखा जाएगा तो वह देश, वह समाज वास्तविक रूप से कभी प्रगति नहीं कर सकता।

यह सही है कि हमारे देश में इस तरह महिलाओं की क्षमता और कार्य कुशलता व उनके नेतृ्त्व करने की योग्यता पर पूरा भरोसा नहीं किया जा रहा है। यदि यह स्थिति बनी हुई है तो यह मानकर चलना चाहिए कि महिला-पुरुष की समानता की बात पूरी तरह से अस्तित्व में नहीं आई है।

कई बार यूं ही संदेह को हवा देने के लिए कह दिया जाता है कि महिलाओं के लिए व्यक्तिगत जीवन तथा व्यवसायिक जीवन के बीच सामंजस्य बैठाना कठिन होता है इसलिए शीर्ष पद का नेतृत्व वह शायद संभाल न पाएं। पर यह केवल एक संदेह मात्र है। चन्द्रयान की सफल लॉचिंग में महिला वैज्ञानिकों की समान भागीदारी रही है और उन्होंने समय देने में पुरुष वैज्ञानिकों के समान कोई कसर नहीं रहने दी। इतना ही नहीं उन्होंने घर की जिम्मेदारी में भी कमी नहीं रहने दी।

महिलाओं के नेतृत्व की योग्यता और कुशलता को यदि राजनीतिक क्षेत्र में स्वीकारा जाता है और उनके इस गुण की कद्र भी की जा रही है तो कोई जायज कारण नहीं दिखता कि कंपनियों के शीर्ष पदों पर आसीन होकर वह उनका नेतृत्व कुशलता से क्यों नहीं कर सकतीं। इसमें हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रहीं है?

यह दृश्य भी अब सामान्य होना चाहिए कि की कारपोरेट जगत के पायदान के सबसे शीर्ष स्थान पर महिलाएं दिखें और केवल इसी सपने के न लेती रहें कि काश! इस पद पर मैं भी होती और अधिकारों से संपन्न होकर अपनी कार्य कुशलता दिखा पाती। शायद वह समय भी आने वाला है जब महिलाओं के नेतृत्व करने के गुणों पर भरोसा कर उन्हें भी मौके दिए जाएंगे।  


 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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