इंदिरा नुई इसका अपवाद हैं और साथ ही वह विदेशी कंपनी में भी हैं
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इंदिरा नुई इसका अपवाद हैं और साथ ही वह विदेशी कंपनी में भी हैं, लेकिन भारतीय कॉरपोरेट जगत खाली सा ही है। बैंकिग क्षेत्र में भी कुछ खास नहीं हुआ। जहां तक कंपनियों में शीर्ष पदों का प्रश्न है तो यह बात साफतौर पर कही जा सकती है कि इसके लिए पूर्वाग्रह मौजूद हैं अभी तक भी यह विश्वास पनप नही पाया कि महिलाओं को इस क्षेत्र में शीर्ष पद सौंपे जाएं तो यह केवल कंपनी के हित में होगा बल्कि महिलाएं अपने नेतृत्व गुणों के कारण उसे और भी अधिक कामयाब कर सकती हैं।
इस ओर बहुत बार सोचा गया है और बातें भी बहुत होती रहीं हैं पर कंपनियों में महिलाओं को नेतृत्व सौंपने में दिलचस्पी नहीं दिखाई या यूं कहें कि उन पर अभी तक पूर्ण विश्वास नहीं किया। महिलाओं की तो अभी यह लड़ाई ही खत्म नही हुई है कि समाज कार्य के लिए समान वेतन उन्हें मिले। तब ऐसे में किसी कंपनी का सर्वोच्च पद उन्हें सौंपने की बात सपने जैसी लगती है।
एक कदम इस ओर और बढ़ा है कि किसी कंपनी के मैनेजिंग बोर्ड में कार्य कुशलता दिखाने वाली कर्मठ महिलाओं को जब नामित किया जाने लगा है। इस तरह से शायद कंपनी को जानने तथा समझने का यह मौका मिल सकता है कि महिलाओँ में काम समझने और उसे आगे ले जाने की कितनी कूवत है।
दरअसल, बहुत बार यह बात हो चुकी है कि यदि किसी देश की आधी आबादी को यदि आर्थिक, सामाजिक तथा उत्पादकता के क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा या उसके योगदान से इन क्षेत्रों को वंचित रखा जाएगा तो वह देश, वह समाज वास्तविक रूप से कभी प्रगति नहीं कर सकता।
यह सही है कि हमारे देश में इस तरह महिलाओं की क्षमता और कार्य कुशलता व उनके नेतृ्त्व करने की योग्यता पर पूरा भरोसा नहीं किया जा रहा है। यदि यह स्थिति बनी हुई है तो यह मानकर चलना चाहिए कि महिला-पुरुष की समानता की बात पूरी तरह से अस्तित्व में नहीं आई है।
कई बार यूं ही संदेह को हवा देने के लिए कह दिया जाता है कि महिलाओं के लिए व्यक्तिगत जीवन तथा व्यवसायिक जीवन के बीच सामंजस्य बैठाना कठिन होता है इसलिए शीर्ष पद का नेतृत्व वह शायद संभाल न पाएं। पर यह केवल एक संदेह मात्र है। चन्द्रयान की सफल लॉचिंग में महिला वैज्ञानिकों की समान भागीदारी रही है और उन्होंने समय देने में पुरुष वैज्ञानिकों के समान कोई कसर नहीं रहने दी। इतना ही नहीं उन्होंने घर की जिम्मेदारी में भी कमी नहीं रहने दी।
महिलाओं के नेतृत्व की योग्यता और कुशलता को यदि राजनीतिक क्षेत्र में स्वीकारा जाता है और उनके इस गुण की कद्र भी की जा रही है तो कोई जायज कारण नहीं दिखता कि कंपनियों के शीर्ष पदों पर आसीन होकर वह उनका नेतृत्व कुशलता से क्यों नहीं कर सकतीं। इसमें हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रहीं है?
यह दृश्य भी अब सामान्य होना चाहिए कि की कारपोरेट जगत के पायदान के सबसे शीर्ष स्थान पर महिलाएं दिखें और केवल इसी सपने के न लेती रहें कि काश! इस पद पर मैं भी होती और अधिकारों से संपन्न होकर अपनी कार्य कुशलता दिखा पाती। शायद वह समय भी आने वाला है जब महिलाओं के नेतृत्व करने के गुणों पर भरोसा कर उन्हें भी मौके दिए जाएंगे।
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