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शाजिया और पूनम ने दिखाया, बेटियां देश ही नहीं विदेशों में भी कम नहीं

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शाजिया ने इसका ही प्रयोग कर उनसे शालीनता से कहा कि वह ऐसी भाषा का प्रयोग न करें। - फोटो : Social Media
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यह बात अब बार-बार साबित हो रही है कि बेटियों के जलवे अब आसमान, जमीन और पानी में सब जगह दिखाई दे रहे हैं। अब वह कहां मौजूद नहीं है। अब बार-बार बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की बातें हो रही हैं तब यहीं बेटियां तो हमारी अस्मिता, सम्मान और गर्व का कारण बन रही हैं। यह अब अपने कंधों पर देश के आदर का भार उठाकर दिखा रहीं हैं, जिसे पहले पुरुषों के कंधों को ही इसके काबिल समझा जाता था।

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बेटियों का यह जलवा जब विदेश की धरती पर हुआ तो इन पर और भी गर्व हुआ। विदेशी धरती पर भारत और तिरंगे का अपमान अपने ही सामने होते देख राजनीतिक नेत्री शाजिया इल्मी और भारतीय पत्रकार पूनम जोशी इसे बर्दाश्त न कर सकीं। यह प्रदर्शनकारी पाकिस्तानी थे जो आजकल बहुत बौखलाए हैं और विदेश में भी इन्हें भारत का विरोध करना ही सूझ रहा है। वह वहां इकट्ठा होकर भारत विरोधी नारे लगा रहे थे और हमारे प्रधानमंत्री के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख शाजिया ने उनसे तुरंत अपना विरोध जताया। भारत की पहचान उसकी शिष्टता व अहिंसा में है।

शाजिया ने इसका ही प्रयोग कर उनसे शालीनता से कहा कि वह ऐसी भाषा का प्रयोग न करें। परंतु वे और उग्रता से नारे लगाने लगे और तब शाजिया ने उतने ही जोर और तेजी से ऊंची आवाज में अपने साथियों के साथ हिंदुस्तान जिंदाबाद-हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे बुलंद करने शुरू कर दिए।
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प्रदर्शनकारी यह आवाजें सुनकर सकते में आ गए। तब तक पुलिस ने आकर उन्हें तितर-बितर कर दिया। यह भारत की उस साहसी और निर्भय बेटी का रूप है जो अब अपने देश की महिलाओं के सशक्तीकरण का प्रतिनिधित्व करती है। पत्रकार पूनम जोशी ने भी अपने देश के सम्मान में ऐसा ही कुछ किया।

पत्रकार होने के नाते पूनम जोशी लंदन में भारतीय उच्चायोग में होने वाले स्वतंत्रता दिवस के आयोजन को कवर करने गई थीं। वहां पाकिस्तानी समर्थक प्रदर्शन कर रहे थे। तिरंगे का यह अपमान पूनम से देखा न गया और उन्होंने तुरंत उनके हाथ से तिरंगा छीनकर अपने हाथ में लेकर ससम्मान फहरा दिया। पूनम ने लिखा कि मुझे अंदाजा नहीं था कि मैं ट्विटर पर ट्रेंड करने लगूंगी। मैं बहुत गर्वान्वित हूं।

यह तो गर्वान्वित हैं ही हमें भी इन पर बहुत गर्व है। वास्तव में इन बेटियों ने बेटी होने का फर्ज पूरा किया है और यह आदर्श उपस्थित किया है कि बेटियां बेटों के बराबर खड़ी होकर देश के सम्मान की रक्षा कर सकती हैं। उन्हें कतई कमतर न समझा जाए। इन दोनों युवतियों ने जो कुछ किया क्या उस पर बहुत आश्चर्य होना चाहिए या उसे अपवाद माना जाए। ऐसा कतई नहीं है।
 

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स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के नेतृत्व में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर ऐसे हिस्सा लिया - फोटो : ANI
याद करिए भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम और भारत का स्वाधीनता के लिए किया गया आंदोलन। दोनों में ही महिलाओं की भागीदारी गजब की रही। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में तो उन पर्दानशीं बेगमों और महलों की रानियों ने भाग लिया जिन्होंने कभी न तो सख्ती देखी थी और न ही धूप सही थी।

स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के नेतृत्व में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर ऐसे हिस्सा लिया कि जैसे वह स्वतंत्रता की प्रतिमू्र्ति हों। इस बात को और सत्य को स्वीकार करना ही होगा कि यदि भारत की इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी न होती तो शायद स्वाधीनता का यह आंदोलन इतनी शीघ्रता से पूर्ण न हो पाता।

यहीं भारतीय महिलाओं की निर्भीकता व साहस उनकी पहचान बन चुका है, जिस स्वतंत्रता और महिला अधिकारों के  लिए पश्चिम की महिलाओं ने आंदोलन किए और वह सड़कों पर उतरीं, पुरुष विरोधी नारे लगाए उन सबको भारतीय महिलाओं ने अपने चारित्रिक गुणों के कारण बहुत ही सरलता से प्राप्त कर लिया है। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ ने इसे और हवा दी है। अब दुनिया देखेगी भारतीय बेटियों के जलवे क्या-क्या गुल खिलाते हैं।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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