वृक्ष से ही मिलती है प्राणवायु
वास्तव में हम एक वृक्ष का मूल्य केवल उसकी लकड़ी या ज्यादा से ज्यादा उसके फल और घास से आंकते हैं। जबकि उसका इससे भी कहीं अधिक परोक्ष महत्व है जो दिखाई नहीं देता है। वृक्ष वातावरण से कार्बनडाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन हवा में छोड़ते हैं। ऑक्सीजन को प्राणवायु कहा जाता है। अगर वातावरण में ऑक्सीजन ही नहीं रहेगी तो जीवन संभव नहीं है। बिना ऑक्सीजन के आदमी कुछ ही मिनटों में प्राण त्याग देता है।
इसी प्रकार वृक्ष को जीने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड की जरूरत होती है। ऑक्सीजन देने के अलावा, पेड़ पर्यावरण से विभिन्न हानिकारक गैसों को भी अवशोषित करते हैं जिससे ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव कम होता है। इसे कार्बनस्टाॅक के रूप में आंका जाता है।
देश के जंगल में कुल कार्बन स्टॉक 7,204 मिलियन टन होने का अनुमान है और 2019 के अंतिम आकलन की तुलना में देश के कार्बन स्टॉक में 79.4 मिलियन टन की वृद्धि मानी गयी है। कार्बन स्टॉक में वार्षिक वृद्धि 39.7 मिलियन टन बताया गया है। प्रकृति ने वनस्पति और जीवधारियों के लिए ये ऐसा रिश्ता तय किया है जो कि अटूट है और अगर इसे तोड़ा गया तो दोनों का ही अस्तित्व नहीं है।
आज जो कुछ हमारे पास है वह जंगल से ही मिला है
आज हम भोजन के रूप गेहूं की रोटी या चावल खाते हैं तो गेहूं और धान कभी जंगल की उपज ही रही होगी। इसी तरह रोटी और भात के साथ सब्जियों और दालों का मूल श्रोत भी जंगल ही है। जनजातियां तो आज भी भोजन के लिए वनोपज पर निर्भर हैं।
हमारे दैनिक जीवन के उपयोगी पशु जैसे भैस, गाय, घोड़ा, कुत्ता आदि इन सभी का मूल भी तो वन ही हैं। हमने तो हाथी को भी अपने मतलब के लिए पालतू बना दिया। पैसे कमाने के लिए शेर और बाघ को भी पिंजरे में बंद कर दिया था जिसे अब जाकर अदालत ने सर्कसों के पिंजरों से उन्हें आजाद किया। लेकिन वन्य जीवों और उनके अंगों की तस्करी अब भी चल रही है।
जीवधारी वनों को फैलाते भी हैं
पेड़ हमें भोजन और आश्रय भी प्रदान करते हैं। कई पेड़ों के फल पक्षियों और जानवरों के भोजन के काम आते हैं और जीव उनके बीज फैला कर वृक्ष के पुनर्जीवन में मदद करते हैं। पेड़ों की पत्तियों, जड़ों और छाल का उपयोग दवाओं को तैयार करने के लिए किया जाता है। जंगली पादप जातियों में छिपे औषधीय गुणों की सहायता न मिली होती तो संसार के अनेक क्षेत्रों में प्रलय की जैसी स्थिति होती। सर्पगन्धा, नयनतारा, गिलोय एवं रतालू वंश के जैसे अनगिनत पौधों ने मनुष्य के रोग निवारण में जो योगदान दिया वह किसी से छिपा नहीं है।
भोजन के साथ जीवन रक्षा के लिए औषधि भी देते हैं वृक्ष
पेड़ जानवरों और मनुष्यों को भी आश्रय प्रदान करते हैं। विशाल, घने वृक्षों से भरे जंगल जंगली जानवरों के आवास के रूप में काम करते हैं और समृद्ध जैव विविधता के लिए योगदान करते हैं। पेड़ों से निकाली गई लकड़ी और अन्य सामग्री का उपयोग कई चीजों को शिल्प करने के लिए किया जाता है जो एक आरामदायक जीवन के लिए आवश्यक हैं। पेड़ पर्यावरण को शांत और खुशनुमा भी बनाते हैं।
संकट में वृक्ष जान बचाने को भाग भी नहीं सकते
पादप और जीवधारी भले ही एक दूसरे के पूरक हों मगर जीवधारियों से अधिक संवेदनशील पादपों का जीवन है, इसीलिए आज बड़ी संख्या में कुछ पादप प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं, कुछ संकटापन्न हैं और कुछ बिल्कुल विलुप्ति की कगार पर हैं। वनस्पतियों या वृक्षों की समस्या यह है कि अधिकांश पौधे भूमि पर ही उगते हैं। वे वनाग्नि जैसे संकट के समय जान बचाने के लिए भाग नहीं सकते। मूक खड़े रह कर नष्ट हो जाना उनकी नियति है। वे जीवों की तरह हमलावरों से प्रतिकार नहीं कर सकते। यदि उनकी संख्या कम हो जाय तो परागण, संगति या प्रजनन के लिए वे कहीं जा कर सहायता नहीं ले सकते।
वनावरण का लक्ष्य अभी काफी दूर है भारत का
भारत में वनावरण तो बढ़ा है मगर वन नीति 1988 के अनुरूप लक्ष्य अभी बहुत दूर है। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 में कुल वन क्षेत्र कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.71 प्रतिशत है, जबकि 2019 में 21.67 प्रतिशत और 2017 में 21.54 प्रतिशत था, लेकिन वन नीति में मैदानी क्षेत्र के लिए कम से कम 33 प्रतिशत और पहाड़ी क्षेत्र के लिए 67 प्रतिशत वनावरण की आवश्यकता महसूस की गयी है।
उत्तराखण्ड जैसा पहाड़ी राज्य 45 प्रतिशत वनावरण के आसपास ठहरा हुआ है। सर्वाधिक जैव विविधता वाले पूर्वोत्तर में वनावरण घटता जा रहा है। वन रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं, पेड़ों की कटाई, विकासात्मक गतिविधियों और स्थानांतरित कृषि के कारण वनावरण नष्ट होता है।
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