एक समय था जब आदिवासियों ने नेहरु पर भरोसा किया था।
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आदिवासियों ने नेहरु पर भरोसा किया था
बिरसा मुण्डा के बाद आदिवासी समाज के मसीहा जयपाल सिंह मुण्डा ने संविधान सभा में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करते हुए 16 दिसंबर 1946 को कहा था कि, ‘‘मैं उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करता हूं जिसे पिछड़ा, अपराधी जाति एवं आदिम जाति के नाम से जाना जाता है। जंगली कहलाए जाने और आदिवासी होने के नाते हमसे संविधान सभा में पेश इन प्रस्तावों की जटिलता समझने की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन लोकतंत्र के बारे में आपको हमसे सीखने की जरूरत है।
हमारा पूरा इतिहास बताता है कि गैर-आदिवासियों ने हमारा शोषण किया है और हमारे संसाधन लूटे हैं, लेकिन फिर भी मैं पंडित नेहरु के शब्दों पर भरोसा करता हूं कि आजाद भारत में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।’’
बहरहाल, कोई माने या न माने मगर सोनभद्र काण्ड से एक बार फिर जयपाल मुण्डा की आशंकाओं को बल जरूर मिलता है।
क्या कहा था जयपाल सिंह मुण्डा आदिवासी नेता ने
जयपाल सिंह मुण्डा जैसे आदिवासी नेताओं की आशंकाओं को गंभीरता से लेते हुए संविधान निर्माताओं और उनके बाद हमारी संसद ने आदिम जनजातियों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास के लिए कई प्रावधान किए मगर उन संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद आज भी ये प्रकृति पुत्र और पुत्रियां न केवल शोषण का शिकार हो रही हैं अपितु उनके नैसर्गिक संसाधानों की लूट खसोट करने के साथ ही सोनभद्र के उम्भा गांव के जैसे भीषण नरसंहार हो रहे हैं।
खेद का विषय यह है कि हमारी सरकारें और राजनीतिक तंत्र ऐसी घटनाओं को केवल कानून व्यवस्था का मामला मानकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहा है।
आदिवासियों को कई तरह से संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है।
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आदिवासियों को संवैधानिक संरक्षण
संविधान में जनजातियों या आदिवासियों की सुरक्षा, संरक्षण और उनके विकास के लिए अनुच्छेद 244, 244 ए, 275 (1), 342, 338 (ए) और 339 जैसे प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों के साथ ही आदिवासियों के लिए संविधान में 5वीं अनुसूची बनाई गई, क्योंकि आदिवासी क्षेत्र आजादी के पहले भी स्वायत्त थे। वहां अंग्रेजों का शासन-प्रशासन नाम मात्र का था। आदिवासियों की अपनी स्वच्छन्द जीवनचर्या एवं उनके अपने विशिष्ट रीति रिवाजों के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने इन क्षेत्रों को बहिष्कृत और आंशिक बहिष्कृत की श्रेणी में रखा था।
ईस्ट इण्डिया कंपनी के बाद ब्रिटिश सरकार ने शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट ऐक्ट 1874 जैसे कानूनी प्रावधान बनाकर ऐसे क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासन की व्यवस्था की। सन् 1947 में देश के आजाद होने के बाद 1950 में संविधान लागू हुआ तो इन जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों को 5वीं और छठी अनुसूची में वर्गीकृत किया गया।
आदिवासी बाहुल्य जो क्षेत्र पूर्णरूप से अलग-थलग रखे गए थे उन्हें छठी अनुसूची में रखा गया, जिसमें पूर्वोत्तर के क्षेत्र थे, जो क्षेत्र मुख्यधारा से आंशिक रूप से अलग-थलग थे, अंग्रेजों ने वहां भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया था। ऐसे क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में डाला गया। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं।
संविधान में 5वीं अनुसूची के निर्माण के उद्देश्य में कहा गया था कि इस प्रावधान से सुरक्षा, संरक्षण और विकास होगा। इस प्रावधान का उद्देश्य आदिवासियों को सुरक्षा देना तो था ही, उनकी क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण और विकास भी किया जाना था, जिसमें उनकी बोली, भाषा, रीति-रिवाज और परंपराएं शामिल हैं।
गरीबी और अभाव में जीने को क्यो मजबूर हैं आदिवासी?
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल 121,01,93,422 आबादी में से जनजातियों की आबादी 10,42,81,034 है जो कि कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत बनता है। सोनभद्र जिले में ही अनुसूचित जातियों की आबादी 3,85,018 है।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अब तक भारत सरकार द्वारा 703 जनजातियों को अधिसूचित किया गया है। इनकी भी आदिवासी जनजातियों की भी सैकड़ों उपजातियां एवं उतनी ही बोलियां और संस्कृतियां हैं। इनमें से लगभग 75 जनजातियां आदिम जातियों में शामिल की गई हैं। इनमें उड़ीसा की 13, आन्ध्र प्रदेश की 12 तथा अण्डमान निकोबार की 5 जातियां शामिल हैं। इन आदिम जातियों में से अण्डमान निकोबार की ग्रेट अण्डमानी, सेंटिनली, जरावा, ओंगे और शेम्पेन्स ऐसी जातियां हैं जिनकी आबादी 600 से कम है।
इन्हीं में उत्तराखण्ड की राजी आदिम जाति भी शामिल है। कुछ आदिम जातियों की जनसंख्या का आंकड़ा तो 100 तक भी नहीं पहुंचत। इन सैकड़ों जनजातियों की 8.6 प्रतिशत आबादी का सरकारी सेवाओं में केवल 4 प्रतिशत ही हिस्सा है। जनजातीय मंत्रालय के एक दस्तावेज के अनुसार आदिवासी जातियों के 87 प्रतिशत घरों में ईंधन के तौर पर केवल लकड़ी, गोबर के उपले और भूसे का प्रयोग होता है। केवल 9 प्रतिशत आदिवासी एलपीजी गैस का उपयोग करते हैं।
इधर, जनजातियों की 40.5 प्रतिशत आबादी गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। इनकी साक्षरता दर अभी तक 57 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई है और इनके 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 96 प्रति हजार है जिनमें से 79 प्रतिशत की मौत एनीमिया से होती है। उत्तराखण्ड की राजी जाति में बच्चों का नामकरण 5 साल के बाद इसीलिए होता है ताकि माता पिता बच्चे के जीवित रह जाने के प्रति आश्वस्त हो सकें।
गरीबी और अभाव में जीने को क्यो मजबूर हैं आदिवासी?
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असुरक्षित है आदिवासियों की दुनिया
हमारे संविधान ने हमारी राज्य एवं केन्द्र की सरकारों को समाज के इस सबसे कमजोर और संवेदनशील तबके के संरक्षण के साथ ही सुरक्षा की भी जिम्मेदार सौंपी थी, जिसका निर्वहन हमारी सरकारें नहीं कर पायीं और इसका जीता जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले का उम्भा गांव का नरसंहार है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 1992 से लेकर 2001 तक देशभर में अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार के 47,225 अपराधिक मामले दर्ज हुए। लेकिन इन मामलों में आदिवासियों को 30 प्रतिशत से कम मामलों में ही न्याय मिला है और बाकी में आरोपी दोष मुक्त हो गए।
ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2016 में जनजातियों पर अत्याचार और उत्पीड़न के 9,096 मामले दर्ज थे। इनमें 2528 मामले जांच के लिए पिछले पेंडिंग थे और 6,568 मामले उसी वर्ष दर्ज हुए। उसके बाद 1,195 मामले राजस्थान और 402 मामले छत्तीसगढ़ में दर्ज हुए थे। उस वर्ष गैर आदिवासियों द्वारा 145 आदिवासियों की हत्याएं हुईं जिनमें 41 मध्य प्रदेश, 19 महाराष्ट्र एवं 17 हत्याएं गुजरात में हुई थीं।
एनसीआरबी के रिकॉर्ड के अनुसार 2016 में आदिवासियों की 144 हत्या के प्रयास के मामले भी दर्ज हुए थे। इसी प्रकार उस वर्ष आदिवासी महिलाओं के खिलाफ 840 मामले दर्ज हुए जिनमें सर्वाधिक 399 मध्य प्रदेश, 88 छत्तीसगढ़ एवं 112 मामले महाराष्ट्र में दर्ज हुए थे। उसी वर्ष देश में आदिवासी महिलाओं पर 298 वारदातें यौन हिंसा की और 166 अपहरण की हुईं।
इन मामलों में भी मध्य प्रदेश और गुजरात सबसे आगे थे। उस साल आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार की 975 और बलवे की 236 वारदातें दर्ज हुईं। यही नहीं आदिवासियों के घर जलाने की भी उस वर्ष 15 वारदातें हुईं थी।
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