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सोशल मीडियाः यूजर्स के साथ-साथ कंपनियों को भी अपनी लक्ष्मण रेखा के लिए तैयार होना पड़ेगा

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सरकार ने सोशल मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिए गाइडलाइन जारी की - फोटो : अमर उजाला
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मैं एक ऐसे व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ा हूं, जिसके सदस्य बेहद चुनिंदा और सभी बहुत पढ़े-लिखे। समझदार व जिम्मेदार भी। संगत में सीखने को बहुत कुछ। फिर भी लंबे अंतराल पर यदा-कदा उस व्हाट्सएप ग्रुप पर भी कोई फॉरवर्ड पोस्ट डाल ही देता है। उस पोस्ट को नजरअंदाज कर या उससे किनारा कर खुद की टी शर्ट खराब होने से सदस्य बचते रहते हैं। सभी सदस्य संजीदे हैं, सो प्रतिक्रिया देकर तूल नहीं देते।  

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हालांकि, इस व्हाट्सएप ग्रुप को छोड़ दें तो सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफार्म (फेसबुक-व्हाट्सएप ग्रुप) की  घंटी खतरे की तरह बजती है। अधिकांश पोस्ट से मन आहत होता है। यही डर सताता है कि जो पोस्ट इस  समय हमारी मोबाइल की स्क्रीन पर है, क्या इन्हीं पोस्ट की पहुंच हमारे बच्चों तक तो नहीं। ऐसे पोस्ट में धार्मिक उन्माद, सत्ता-विपक्ष और न जाने उकसाने वाले ऐसे शब्द इस्तेमाल होते, जो परेशान करते हैं।

क्या सचमुच  सोशल मीडिया इतना असामाजिक होता जा रहा है कि वहां एजेंडा चलाने वालों की भीड़ बढ़ती चली जा रही है। ऐसे में यूजर्स से लेकर सोशल मीडिया कंपनियों तक की अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है क्या? जाहिर है,  लक्ष्मण रेखा जरुरी है।  सोशल मीडिया को लेकर इस समय दो सुर्खियां हैं। एक देश से, एक सात समंदर पार ऑस्ट्रेलिया से।
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सरकार ने सोशल मीडिया को जवाबदेह बनाने के लिए गाइडलाइन जारी की। गाइडलाइन जारी करते हुए सरकार की ओर से साफ किया गया कि यूजर्स को असहमति का अधिकार है और कंपनियों को कारोबार का। लेकिन लक्ष्मण रेखा जरूरी है। प्रिंट मीडिया की निगरानी के लिए प्रेस परिषद तो टीवी-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ब्रॉडकास्टर।  हां, सोशल मीडिया ही अब तक छुट्टा है। इस छुट्टेपन का हश्र सामने है। इस बड़े प्लेटफार्म पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जो परोसा जा रहा है, उनमें से ज्यादातर चिंताजनक। यानी टु मच डेमोक्रेसी।

मुमकिन है कि सोशल मीडिया के लिए खींची जा रही इस लक्ष्मण रेखा को भी दो झूंड अपने-अपने चश्मे से देखे, लेकिन आत्मसंयम के साथ-साथ इस तरह के नकेल की जरूरत तो अरसे से महसूस की जा रही थी। ऑस्ट्रेलिया ने फेसबुक पर नकेल डाल दी। न्यूज कंटेंट और पेमेंट को लेकर कानून बना दिया। ऑस्ट्रेलिया के इस कानून पर  देश के साथ दुनिया की निगाहें गई हैं। अब न्यूज पेपर एसोसिएशन ने भारत में भी यह मांग उठाई है। इस पर  सरकार की नजर भी है।

इसी तरह, व्हाट्सएप नई नीति को लेकर चर्चा में है। व्हाट्सएप भी अपने यूजर्स की  निजी जानकारियों से कमाई बढ़ाना चाह रहा है। सोशल मीडिया हमारी जिंदगी में इस कदर रच- बस गया है कि अब हमें ट्वीटर-व्हाट्सएप के विकल्प कू, सिगनल पर नजर है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर चाहें कंपनियां  जितनी बदल जाएं लेकिन उनका रंग-ढंग तो फिलहाल बदलता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में यूजर्स के साथ-साथ कंपनियों को भी खुद की लक्ष्मण रेखा के लिए तैयार होना ही पड़ेगा।  

इस सप्ताह की कुछ पोस्ट और घटनाएं सोशल मीडिया के दोहरे चेहरे को दर्शाने के लिए काफी हैं। गीतकार संतोष आनंद का इंडियन आइडल वाला वीडियो सोशल मीडिया पर खूब तैरा। इसे शेयर करने वालों ने उनके योगदान को याद किया, वहीं दूसरे झूंड ने संतोष आनंद के योगदान को भुला कर ‘दान’ को उजागर किया। ‘भीख’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए। ‘योगदान’ और ‘दान’ के द्वंद में संतोष आनंद जैसी शख्सियत के ‘मान-सम्मान’ पर सोशल मीडिया में कीचड़ उछला।

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इन नतीजों पर सोशल मीडिया की टीका-टिप्पणी का ‘दोहरा’ चेहरा सामने है...

सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock
सोशल मीडिया पर अपने बारे में छिड़ी बहस से खुद गीतकार संतोष आनंद इतने आहत हुए कि उनकी प्रतिक्रिया आई-सोशल मीडिया पर किसी को बड़ा बनाने की और किसी को छोटा बनाने की मुहिम चलती रहती है। मैं दिल से निकलता हूं और दिल तक पहुंचता हूं। अभी महज 24 घंटे के भीतर दो राज्यों के निकाय चुनाव के नतीजे आए। पंजाब के निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर हार और गुजरात के निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर जीत।

इन नतीजों पर सोशल मीडिया की टीका-टिप्पणी का ‘दोहरा’ चेहरा सामने है। अहमदाबाद के क्रिकेट स्टेडियम मोटेरा का नामकरण मोदी के नाम और एमएसपी बनाम पेट्रोलियम मूल्य पर अद्भुत ज्ञान। सोशल मीडिया पर एक झूंड पंजाब में भाजपा की बंपर हार को किसान आंदोलन की सफलता से जोड़कर परोसता रहा, तो दूसरा झूंड गुजरात निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर जीत को नए कृषि कानूनों की सफलता से जोड़कर परोसता रहा।

एक झूंड मोटेरा स्टेडियम से मोदी के नाम जोड़े जाने पर सरकार को कोसता रहा, तो दूसरा झूंड गांधी परिवार के नाम के स्टेडियम जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम, इंदिरा गांधी स्टेडियम गिनाता रहा। सोशल मीडिया पर पेट्रोल की कीमतों को एमएसपी से जोड़कर ज्ञान परोसा जाना अलग चेहरा।  सोशल मीडिया पर आखिर यह नौबत क्यों आई। दरअसल, हमारी जिंदगी में एकरसता आती जा रही है।

सुबह दफ्तर या कारोबार के लिए भागमभाग। जो टीवी आप देखते, वही मैं, वहीं कोई और। जो सामान आप मॉल्स, ऑनलाइन अमेजन-फ्लिपकार्ट से खरीदते हैं, वही मैं, वही कोई और। जिस मसाले का जायका आप लेते, वही  मैं, वहीं कोई और। कश्मीर से कन्याकुमारी तक एकरुपता। पहले यदि घर में मौसी-बुआ आती थीं और वह  कटहल की सब्जी अच्छा बनाती, तो घर में कटहल की सब्जी उन्हीं के हाथ से बनवाई जाती थी।

अब तो कटहल की सब्जी मौसी बनाए या बुआ या पत्नी, उसमें पड़ेगा तो ही वही मसाला (एमडीएच-कैच)। ऐसे में अलग स्वाद की गुंजाइश कहां। कमोबेश सोशल मीडिया का भी यही हाल हो चला है। पोस्ट डालने वाला झूंड भी मौसी-बुआ की तरह चाहकर अलग स्वाद की सब्जी नहीं पका सकता क्योंकि मसाला तो वही होता- सरकार  विरोधी, सरकार पक्ष, धार्मिक उन्माद वाला। उस पर भी फॉरवर्ड पोस्ट की भरमार। सोशल मीडिया में भरोसे और  उन्माद का अंतर है।

भरोसा खीचेंगे, उतना बढ़ेगा, उन्माद खीचेंगे, उतना टूटेगा। आज सोच भी तिरंगा या  इंद्रधनुषी के बजाय भगवा, लाल, हरे में बंटता जा रहा है। सोशल मीडिया भले सामाजिक मीडिया कहलाता हो लेकिन सोच अकेला। यही अकेले की सोच अकेलेपन के कुएं में धकेलता है। अकेलेपन से उबरने के लिए फिर वही सोशल मीडिया का आसरा-सहारा। अब तो जापान में अकेलेपन से जूझने के लिए मंत्रालय तक बन गया  है।  

यहां यह बता देना जरूरी है कि फेसबुक के अकेले भारत में ही 41 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप के 53 करोड़,  इंस्टाग्राम के 21 करोड़, ट्वीटर के पौन दो करोड़ और ओटीटी प्लेटफार्म के करीब 45 करोड़ यूजर्स हैं। सोशल मीडिया पर यदि ‘कटुता’ है तो ओटीटी पर ‘तांडव’। इस ‘कटुता’ और ‘तांडव’ से बचना है तो हमें भी अपने  बच्चों के लिए अच्छा घर (सोशल मीडिया प्लेटफार्म) बनाना ही होगा क्योंकि सोशल मीडिया अब हमारी जिंदगी  है। ये जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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