सोशल मीडिया पर अपने बारे में छिड़ी बहस से खुद गीतकार संतोष आनंद इतने आहत हुए कि उनकी प्रतिक्रिया आई-सोशल मीडिया पर किसी को बड़ा बनाने की और किसी को छोटा बनाने की मुहिम चलती रहती है। मैं दिल से निकलता हूं और दिल तक पहुंचता हूं। अभी महज 24 घंटे के भीतर दो राज्यों के निकाय चुनाव के नतीजे आए। पंजाब के निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर हार और गुजरात के निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर जीत।
इन नतीजों पर सोशल मीडिया की टीका-टिप्पणी का ‘दोहरा’ चेहरा सामने है। अहमदाबाद के क्रिकेट स्टेडियम मोटेरा का नामकरण मोदी के नाम और एमएसपी बनाम पेट्रोलियम मूल्य पर अद्भुत ज्ञान। सोशल मीडिया पर एक झूंड पंजाब में भाजपा की बंपर हार को किसान आंदोलन की सफलता से जोड़कर परोसता रहा, तो दूसरा झूंड गुजरात निकाय चुनाव में भाजपा की बंपर जीत को नए कृषि कानूनों की सफलता से जोड़कर परोसता रहा।
एक झूंड मोटेरा स्टेडियम से मोदी के नाम जोड़े जाने पर सरकार को कोसता रहा, तो दूसरा झूंड गांधी परिवार के नाम के स्टेडियम जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम, इंदिरा गांधी स्टेडियम गिनाता रहा। सोशल मीडिया पर पेट्रोल की कीमतों को एमएसपी से जोड़कर ज्ञान परोसा जाना अलग चेहरा। सोशल मीडिया पर आखिर यह नौबत क्यों आई। दरअसल, हमारी जिंदगी में एकरसता आती जा रही है।
सुबह दफ्तर या कारोबार के लिए भागमभाग। जो टीवी आप देखते, वही मैं, वहीं कोई और। जो सामान आप मॉल्स, ऑनलाइन अमेजन-फ्लिपकार्ट से खरीदते हैं, वही मैं, वही कोई और। जिस मसाले का जायका आप लेते, वही मैं, वहीं कोई और। कश्मीर से कन्याकुमारी तक एकरुपता। पहले यदि घर में मौसी-बुआ आती थीं और वह कटहल की सब्जी अच्छा बनाती, तो घर में कटहल की सब्जी उन्हीं के हाथ से बनवाई जाती थी।
अब तो कटहल की सब्जी मौसी बनाए या बुआ या पत्नी, उसमें पड़ेगा तो ही वही मसाला (एमडीएच-कैच)। ऐसे में अलग स्वाद की गुंजाइश कहां। कमोबेश सोशल मीडिया का भी यही हाल हो चला है। पोस्ट डालने वाला झूंड भी मौसी-बुआ की तरह चाहकर अलग स्वाद की सब्जी नहीं पका सकता क्योंकि मसाला तो वही होता- सरकार विरोधी, सरकार पक्ष, धार्मिक उन्माद वाला। उस पर भी फॉरवर्ड पोस्ट की भरमार। सोशल मीडिया में भरोसे और उन्माद का अंतर है।
भरोसा खीचेंगे, उतना बढ़ेगा, उन्माद खीचेंगे, उतना टूटेगा। आज सोच भी तिरंगा या इंद्रधनुषी के बजाय भगवा, लाल, हरे में बंटता जा रहा है। सोशल मीडिया भले सामाजिक मीडिया कहलाता हो लेकिन सोच अकेला। यही अकेले की सोच अकेलेपन के कुएं में धकेलता है। अकेलेपन से उबरने के लिए फिर वही सोशल मीडिया का आसरा-सहारा। अब तो जापान में अकेलेपन से जूझने के लिए मंत्रालय तक बन गया है।
यहां यह बता देना जरूरी है कि फेसबुक के अकेले भारत में ही 41 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप के 53 करोड़, इंस्टाग्राम के 21 करोड़, ट्वीटर के पौन दो करोड़ और ओटीटी प्लेटफार्म के करीब 45 करोड़ यूजर्स हैं। सोशल मीडिया पर यदि ‘कटुता’ है तो ओटीटी पर ‘तांडव’। इस ‘कटुता’ और ‘तांडव’ से बचना है तो हमें भी अपने बच्चों के लिए अच्छा घर (सोशल मीडिया प्लेटफार्म) बनाना ही होगा क्योंकि सोशल मीडिया अब हमारी जिंदगी है। ये जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है।
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