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यादों में श्याम बेनेगल: समानांतर सिनेमा की नई धारा शुरू करने वाला प्रयोगधर्मी निर्देशक

सार

कलात्मक सिनेमा को पहचान दिलाने में श्याम बेनेगल की खास भूमिका है। जब सिनेमा की यह धारा सूखने लगी तो वे मेनस्ट्रीम सिनेमा की ओर मुड़ गए। कुछ दिन विराम लिया, टीवी केलिए काम किया, वहां झंडे गाड़े।
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श्याम बेनेगल के निधन से भारतीय सिनेमा में कभी न भरा जा सकने वाला शून्य पैदा हुआ। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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14 दिसंबर 1934 में हैदराबाद में जन्में प्रयोगधर्मी सिने-निर्देशक 23 दिसंबर 2024 को गुजर गए। उन्होंने सदैव सामाजिक दायित्व में आम आदमी की भूमिका और उसके हस्तक्षेप के कथानक पर अपनी फिल्में बनाईं। प्रारंभ उन्होंने कॉपी राइटर, एड एजेंसियों में काम करते हुए किया और बाद में 24 फिल्में, 45 डॉक्यूमेंट्री और 15 एड फिल्म बनाईं। हालांकि, फोटोग्राफी उन्हें विरासत में मिली थी, उनके पिता श्रीधर बी. बेनेगल स्टिल फोटोग्राफी करते थे और श्याम भी बच्चों के फोटो खींचा करते थे। शिक्षण दायित्व भी उन्होंने निभाया, पुणे के फ़िल्म एंड टेलिविजन इंस्ट्यूट ऑफ इंडिया में पढ़ाया।

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वे अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म ‘अंकुर’ के अंतिम दृश्य में प्रयोग करते हैं, एक छोटा बच्चा गुस्से और बेबसी में एक पत्थर उठा कर क्रूर-दुष्ट जमींदार की खिड़की पर फ़ेंकता है। कांच टूटता है और बेनेगल की पक्षधरता मूर्तिमान हो जाती है।
 

श्याम बेनेगल ने लगातार प्रयोग किए, कभी नए कलाकारों को लिया, कभी फ़्लैशबैक-फ़्लैशफ़ॉर्वर्ड का तकनीक प्रयोग, कभी छोटी-छोटी पूंजी को सहकारी रूप दे उन्हें निर्माता बनाया (‘मंथन’), कभी बिना बैकग्राउंड म्युजिक की फ़िल्म बनाई, फ़िल्म के भीतर फ़िल्म बनाई (‘भूमिका’), और कभी एक व्यक्ति से चार भिन्न-भिन्न कथानक एक साथ प्रस्तुत करवाए (‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’)।

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आज भी दूरदर्शन के प्रसारण ‘भारत एक खोज’ को लोग याद करते हैं। दो साल की ‘होमी भाभा फेलोशिप’ के दौरान बच्चों के लिए तथा टीवी के लिए कई काम किए। फिल्म एवं टीवी के चेयरमैन रहे। राष्ट्रीय समन्वय समिति के सदस्य रहे। उन्हें दर्शकों का भरपूर प्यार और सम्मान मिला। सरकार ने सम्मानित किया। 1976 में पद्मश्री, 1991 में पद्म भूषण, 2005 में दादा साहब फ़ालके सम्मान प्राप्त हुआ। और 8 बार राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार उनकी झोली में आए, अपने-आप में एक रिकॉर्ड!

श्याम बेनेगल सत्यजित राय के प्रभाव को स्वीकारते हैं, लिखते हैं, मेरे जैसे फ़िल्म बनाने की महत्वाकांक्षा रखने वाले के लिए, ‘पथेर पांचाली’ ने संभावनाओं की एक नई दुनिया खोल दी। श्याम बेनेगल ने 1982 में डॉक्यूमेंट्री ‘सत्यजित राय’ बनाई। इस डॉक्यूमेंट्री का कैमरा गोविंद निहलाणी ने संभाला। बेनेगल राय को आदर्श के सिंहासन पर नहीं बैठाते हैं, यह डॉक्यूमेंट्री एक फ़िल्मकार की नजर से दूसरे फ़िल्मकार को देखना है।

वृतचित्र बनने के समय राय अपने प्रथम हृदयाघात से उबर कर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे, साथ ही ‘घरे-बाइरे’ एवं ‘सद्गति’ शूटिंग का मार्ग निर्देशन कर रहे थे। मुख्य रूप से वे राय की कार्यशैली को चित्रित करना चाहते थे, उन्होंने राय को काम करते हुए फ़िल्माया। डॉक्यूमेंट्री में ‘महानगर’ के अंतिम हिस्से की शूटिंग की क्लिपिंग्स का उपयोग किया। वे राय के विषय में फ़िल्म बना रहे थे, दूसरों की राय में सत्यजित के विषय में नहीं, अत: दूसरों के विचार इसमें नहीं रखे। सत्यजित राय को बोलने का अवसर दिया है। इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट आज किताब के रूप में प्रकाशित है। फ़िल्म डिविजन के सहयोग से बनी इस डॉक्यूमेंट्री को 1985 की सर्वोत्तम बॉयोग्राफ़िकल फ़िल्म का पुरस्कार मिला। श्याम बेनेगल ने नेहरू पर भी डॉक्यूमेंट्री बनाई। ‘यात्रा’ उनकी एक अन्य लोकप्रिय डॉक्यूमेंट्री है।
 

समानांतर सिनेमा का अंग होने के बावजूद श्याम बेनेगल की फ़िल्में दर्शकों के बीच खूब लोकप्रिय रहीं, बॉक्स-ऑफ़िस पर सफ़ल रहीं। ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ कला-फ़िल्म होते हुए भी सराही गईं। अमरीश पुरी, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, सईद जाफ़री, के. के. रैना, साधु मेहर, रजित कपूर, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी जैसी प्रतिभाओं को पहचाना, उन्हें उभारा।


कलात्मक सिनेमा को पहचान दिलाने में श्याम बेनेगल की खास भूमिका है। जब सिनेमा की यह धारा सूखने लगी तो वे मेनस्ट्रीम सिनेमा की ओर मुड़ गए। कुछ दिन विराम लिया, टीवी केलिए काम किया, वहां झंडे गाड़े।

सामान्य चेहरे को विशिष्ट तरीके से फ़िल्माने वाले श्याम बेनेगल ने ‘चरनदास चोर’, ‘कलयुग’, ‘आरोहण’, ‘मंडी’, ‘त्रिकाल’, ‘अंतरनाद’, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘मम्मो’, ‘जुबेदा’, ‘मुजीब – द मेकिंग ऑफ़ ए नेशन’ (अंतिम फ़िल्म) आदि फ़िल्में बनाईं।

समाज की बुराइयों पर अंगुली धरने वाले, जमींदारी प्रथा, जाति प्रथा, स्त्री-पुरुष असमानता पर फ़िल्म बनाने वाले निर्देशक की अधिकाँश फ़िल्में सरकार की सहायता से बनीं (‘हरी-भरी: फ़र्टिलिटी’, ‘वेलडन अब्बा’), कई फ़िल्में उन्होंने स्वयं ‘सहयाद्री फ़िल्म्स’ के बैनर तले प्रड्यूस कीं। हाल में उनकी फ़िल्म ‘मंथन’ को फ़िल्म हेरीटेज फ़ाउंडेशन ने रिस्टोर किया है।

स्त्री के प्रति श्याम बेनेगल के मन में कितना सम्मान है, वे उसे किस नजरिए से देखते हैं, यह जानने केलिए उनकी फ़िल्म ‘भूमिका’, ‘ज़ुबेदा’, अंकुर’, ‘मंथन’, ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’ देखनी चाहिए। बायोपिक फ़िल्म ‘भूमिका’ मराठी अभिनेत्री हंसा वाडेकर की जीवनी है। इसमें स्मिता पाटिल ने एक ऐसी स्त्री की भूमिका निबाही है, जो बिना हल्ला-गुल्ला किए हुए दमन-शोषण का प्रतिरोध करती और ‘अग्नि परीक्षा’ से गुजर कर अपने मान-सम्मान के साथ खड़ी होती है।

यह स्त्री – उषा/उर्वशी दलवी – घर-परिवार, पति, सामंती व्यवस्था के बरबक्स तन कर खड़ी होती है। वही करती है, जो उसके मन में आता है। वास्तविक संदेश देती ‘मंथन’ की आत्मनिर्भर-स्वाभिमानिनी नायिका बिन्दु (स्मिता पाटिल), ‘ज़ुबेदा’ की ज़ुबेदा कुछ ऐसी ही नायिकाएँ बेनेगल की फ़िल्मों से निकली हैं।

खालिद मोहम्मद के लेखन पर श्याम बेनेगल ने नारी प्रधान त्रयी – ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’ एवं ‘ज़ुबेदा’ बनाई। ‘ज़ुबेदा’ (2001) फ़िल्म का उपशीर्षक है, ‘द स्टोरी ऑफ़ ए प्रिंसेस’। मासूम ज़ुबेदा (करीश्मा कपूर) को परदे पर साकार करती फ़िल्म दिखाती है, कैसे एक स्त्री को पुरुष सत्ता नचाती है। खूबसूरत ज़ुबेदा आंतरिक संघर्ष से जूझती है और अंतत: अपना जीवन समाप्त करने का मजबूत निर्णय लेती है। श्याम बेनेगल की स्त्रियाँ खूब मजबूत हैं, निर्णय लेने में सक्षम।

‘सूरज का सातवां घोड़ा’ धर्मवीर भारती की कहानी पर आधारित है। यह चार कहानियों का एक चक्र है, जिसे केंद्रीय पात्र (रजित कपूर) सुना रहा है एवं चारों चक्र में वह स्वयं नायक है, हर कहानी में अपने प्रति अलग नजरिया रखता है। एक में बालक, एक में किशोर, एक में वयस्क के रूप में खुद को देखता है। आप अचानक पाते हैं, सारी घटनाएं एक साथ चल रही हैं।

फिल्म में यह दिखाना सरल न था, मगर श्याम बेनेगल यह कर दिखाते हैं। उनकी अंतिम फ़िल्म ‘मुजीब’ (2003) बांग्लादेश के संस्थापक-राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान के जीवन पर आधारित है। इस बायोपिक ने खूब ख्याति पाई है।

जब वे जमशेदपुर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में आए थे, आज भी उन्हें देखने की स्मृति है। सिनेमा से सामाजिक मुद्दों पर सकारात्मक हस्तक्षेप करने वाले श्याम बेनेगल को भावभीनी श्रद्धांजलि!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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