महाराष्ट्र की राजनीति में दिग्गज नेता शरद पवार के इस्तीफे और तीन दिन बाद उसे वापस लेने के प्रहसन के बाद किसी ने मराठी में कटाक्ष करते हुए पवार को भारतीय राजनीति का ‘नटसम्राट’ कहा। खास बात यह थी कि इस तीन दिनी प्रहसन की पटकथा भी शरद पवार ने ही लिखी थी और वो ही इस एपीसोड के निर्देशक, हीरो भी थे। ऐसा हीरो जिसने पटकथा के विलेन को बिना वार के ही रिंग से बाहर कर दिया।
इस पटकथा का आरंभ भी पवार ने किया था और अंत भी उन्होंने किया। यह अलग बात है कि यह अंत उनके महत्वाकांक्षी भतीजे अजित पवार के लिए ‘शोकांतिका’ की तरह रहा। एक और अहम बात यह रही कि पवार ने भारतीय राजनीति को कुछ नए मुहावरे दिए, जो लंबे समय तक चलेंगे।
शरद पवार, उनकी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस और उनकी विचारधारा क्या है? इन सवालों का एक ही जवाब है अवसरवादी राष्ट्रवाद। पवार और उनकी पार्टी की कभी किसी से दुश्मनी नहीं रही और दोस्ती उन्होंने अपने लाभों के हिसाब से की। वो कब कहां, किस पाले में, किन तर्को के आधार पर चले जाएंगे या हट जाएंगे, यह केवल पवार ही जानते हैं। वर्तमान में उन्हें भाजपा से दूरी बनाए रखने और विपक्षी खेमे में बने रहने में ज्यादा लाभ दिख रहा है। बल्कि यह कहें कि भाजपा जैसी सहयोगियों को ‘खा जाने वाली’ पार्टी से वो अपने दल को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहते हैं। यही उन्होंने किया भी।
इस्तीफे की घोषणा और राजनीतिक भूचाल
शरद पवार आज शायद देश के उन सबसे बुजुर्ग नेताओं में से हैं, जो सियासत में 63 साल से न सिर्फ सक्रिय हैं, बल्कि अपना महत्व बनाए हुए हैं। खुद को दिग्गज राजनेता यशंवत राव चह्वाण का शिष्य मानने वाले पवार राजनीति के धुरंधर और पूर्वानुमान लगा लेने वाले खिलाड़ी हैं। छह दशकों की सक्रिय राजनीति और सियासत के कई उतार-चढ़ाव देख चुकने के बाद आत्मकथा तो बनती ही है। लेकिन अपनी आत्म कथा ‘लोक माझे सांगाती’ ( लोग मेरे साथी) के विमोचन अवसर को भी उन्होंने राजनीतिक विस्फोट का प्लेटफार्म बनाया।
पवार ने राकांपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से इस्तीफे की घोषणा करके राजनीति में भूचाल ला दिया। इसके पहले उन्होंने मुहावरेदार अंदाज में कहा था कि ‘अब ‘रोटी पलटने’ का वक्त आ गया है। समय पर रोटी न पलटी जाए तो जल जाने का खतरा रहता है।‘ तब लोग इस मुहावरे के निहितार्थ भांपने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन पवार के इस्तीफे ने साफ कर दिया कि उन्होंने तुरूप का इक्का चल दिया है।
पवार की इस अप्रत्याशित घोषणा के बाद उनकी पार्टी में मानो हाहाकार मच गया। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में मानों चाटुकारिता की होड़-सी लग गई। पवार का इस्तीफा मानो पार्टीजनों के जीवन-मरण का प्रश्न बन गया। सभी यह दिखाने में लगे थे जैसे पवार कभी रिटायर हो ही नहीं सकते। इसमें लाचारी का भाव भी था।
यह दृश्य देखकर 2004 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेसनीत यूपीए की जीत के बाद यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद स्वीकारने से इंकार करने पर जिस तरह कांग्रेसियों ने प्रलाप किया और उन्हें मनाने के लिए क्या नहीं किया, उसकी याद आ गई। वो पीएम न बनी तो कयामत आ जाएगी। लेकिन सोनिया गांधी और शरद पवार के बीच चारित्रिक फर्क है।
सोनिया कार्यकर्ताओं के रोने पीटने से पिघलने की बजाए अपने फैसले पर आखिर तक अड़ी रहीं जबकि पवार के इस्तीफे का नाटक उस हेलीकाॅप्टर शाॅट की तरह था, जिसमें बल्लेबाज को यकीन रहता है कि गेंद बाउंड्रीपार जानी ही है। वो गई भी। तीन दिन तक ‘पुनर्विचार’ बाद पवार ने यह कहकर इस्तीफा विवशभाव से वापस ले लिया कि क्या करूं, कार्यकर्ताओं की भावनाओं का अनादर नहीं कर सकता।
इस ‘अंत’ का अंदाजा हर उस व्यक्ति को था, जो पवार की राजनीति को बारीकी से जानता- समझता है। सवाल सिर्फ इतना है कि जब पवार के नेतृत्व को उनकी पार्टी में कोई चुनौती नहीं थी तो इस्तीफे के प्रहसन के मंचन की जरूरत क्या थी? अमूमन किसी भी पार्टी में शीर्ष नेताओं के इस्तीफे अथवा रिटायरमेंट की एक प्रक्रिया होती है।
यह काम सुविचारित और भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखकर किया जाता है। उसे पार्टी के कर्णधारों का समर्थन होता है। मसलन भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी की जगह नरेन्द्र मोदी को प्रोजेक्ट करने फैसला हुआ तो छुटपुट विरोध को छोड़ उस पर व्यापक सहमति थी।