शकील बदायूंनी: न केवल गीत लिखे बल्कि हिन्दी फ़िल्मों को कुछ अनमोल भजन भी दिए।
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अधिकतर लोग फ़िल्मी गीतों को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते हैं। मेरा मानना है अधिकांश फ़िल्मी गीत साहित्य की ऊँचाई को स्पर्श करते हैं। खासकर कुछ साल पहले तक के फ़िल्मी गीत। गीत साहित्य की एक बहुत प्रभावशाली विधा है। वे दर्शक तथा दृश्य के बीच पुल का काम करते हैं। इनकी क्षमता बहुत मजबूत होती है उसका एक शब्द श्रोता के मानस पटल पर पूरा दृश्य साकार कर देता है।
दरअसल, गीत आप पढ़ रहे हैं तो यह व्यक्तिगत क्रिया होती है, इसका प्रभाव सीमित, व्यक्ति केंद्रित होता है, यही गीत ध्वनि रूप में प्रसारित हो तो उसका प्रसार-प्रभाव असीम होता है। अत: एक फ़िल्मी गीत लाखों-करोड़ों दिल की धड़कन बन जाता है। तमाम श्रोता उसे गुनगुना कर उससे सादृश्य अनुभव प्रतीत करते हैं। इसीलिए अच्छे-सार्थक, लयात्मक, सुरीले फ़िल्मी गीत समय की सीमा को लाँघ कर अमरता की चौखट पर पहुंचते हैं। वे साहित्य में समाहित हो उसे समृद्ध करते हैं।
शकील बदायूंनी ने ना केवल उर्दू साहित्य जगत में नाम कमाया बल्कि हिन्दी फ़िल्मों को कई लोकप्रिय गीत दिए हैं।
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फ़िल्मी गीत कभी अकेले नहीं रचे जाते हैं। ये गीतकार, संगीतकार, फ़िल्म निर्देशक, कैमरमैन, अभिनेता, रिकॉर्डिस्ट, गायक सबके सम्मिलन से श्रोता-दर्शक तक पहुँचते हैं और अक्सर उसके दिल पर छा जाते हैं। फ़िल्मी गीत का मतलब है शब्द विधान को दृश्य विधान में रूपांतरण।
एक ऐसे गीतकार की बात करने जा रही हूं, जिसने फ़िल्म संसार को कई यादगार गीत दिए, जिन्हें बिलाशक साहित्य का दर्जा दिया जा सकता है। ये हैं शकील बदायूंनी की। उन्होंने उर्दू साहित्य जगत में नाम कमाया। साथ ही, हिन्दी फ़िल्मों को कई लोकप्रिय गीत दिए हैं।
शकील के लिखे इस फ़िल्म के सारे गीत (इस फ़िल्म में 12-13 गीत हैं) किसी-न-किसी राग पर आधारित हैं।
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उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले ने इस्मत चुगताई और जीलानी बानो जैसे अफ़साना निगार हमें दिए तो दानी बदायूंनी, बेखुद बदायूंनी, अदा जाफ़री जैसे शायरों को भी पैदा किया। यहीं के सूफ़ी निजामुद्दीन औलिया भी हैं। इसी बदायूं जिले में 3 अगस्त 1916 को मोहम्मद जमाल अहमद कादरी के घर शकील का जन्म हुआ। घर में किसी का शेर-ओ-शायरी से दूर का नाता न था। हां, एक दूर के रिश्तेदार मजहबी शायरी करते थे।
दरअसल, जैसा कि उन दिनों रिवाज था, बच्चे शकील को घर पर ही उर्दू, अरबी, फ़ारसी तथा हिन्दी की तालीम दी गई। बाद में वह 1936 में पढ़ने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए। और यहीं शकील ने शेर-ओ-शायरी शुरू की और मुशायरों में शिरकत करने लगे। 1940 में सलमा से शादी हो गई और बीए करने के बाद सप्लाई ऑफ़िसर का काम करने दिल्ली आ गए। शायरी जारी रही और मुशायरों की बदौलत देश में नाम रोशन होने लगा।
शकील बदायूँनी ने नौशाद के अलावा कई अन्य संगीतकारों की धुनों पर भी गीत लिखे।
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इसके बाद शकील का बंबई सफ़र शुरू हुआ। बंबई में वह फ़िल्मी दुनिया से जुड़े और उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों को एक-से-एक यादगार गीत दिए, जिन्हें आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं। उन्होंने न केवल गीत लिखे हिन्दी फ़िल्मों को कुछ अमूल्य भजन भी दिए। भला कौन भूल सकता है ‘बैजू बावरा’ फ़िल्म का भजन ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज...’।
शकील के लिखे इस फ़िल्म के सारे गीत (इस फ़िल्म में 12-13 गीत हैं) किसी-न-किसी राग पर आधारित हैं। जैसे यही भजन लीजिए, यह राग मालकौंस में बँधा हुआ है, जिसे मुहम्मद रफ़ी ने अपने स्वर से अमर कर दिया है। इसी फ़िल्म का एक और भजन राग पुरबिया धनश्री में है, बोल हैं, ‘तोरी जय जय करतार’।
फ़िल्म बैजू बावरा एक संगीतमय फ़िल्म है, क्योंकि यह बैजू बावरा तथा तानसेन जैसे संगीतकारों के जीवन पर आधारित है। ऐतिहासिक फ़िल्म न होते हुए भी यह ऐतिहासिक फ़िल्म का आस्वाद देती है।
इस फ़िल्म का सारा संगीत नौशाद ने तैयार किया है। गाने एक-से-एक हैं, चाहे ‘दूर कोई गाए धुन ये सुनाए,तेरे बिन छलिया रे बाजे न मुरलिया रे, नींद नहीं आए, बिरहा सताए, तेरे बिन छलिया रे’ हो अथवा रफ़ी-लता का गाया ‘तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा’ या फ़िर रफ़ी की ही आवाज में ‘ओ दुनिया के रखवाले’ हो।
शकील बदायूंनी और नौशाद की जोड़ी ने फ़िल्मी दुनिया को ढेर सारे उम्दा गीत दिए। दोस्ती की शुरुआत मजेदार तरीके से हुई। शकील अपनी नौकरी छोड़ कर बंबई फ़िल्मी दुनिया में किस्मत आजमाने पहुँचे। जब वह नौशाद से मिले तो नौशाद ने उन्हें अपने काव्य की कुशलता एक लाइन में बयान करने को कहा।
शकील क्यों चुप रहते उन्होंने कहा-
‘हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे।’और उन्होंने फ़िल्मी गीतों के चाहने वालों गीतों के तमाम तोहफ़े दिए। असल में यह जमाना देश में राष्ट्रीयता की लहर का था, सामाजिक, राजनैतिक गीत लिखे जा रहे थे। लहर के साथ बहना आसान होता है, मगर कुछ लोग अपनी अलग लहर बनाते हैं। शकील ने दर्द और रोमांस की अपनी अलग लहर बनाई और इस लहर में आज भी श्रोता बहता है, आनंद उठाता है।
फिल्म ‘बैजू बावरा’ के निर्देशक विनय भट्ट इस फ़िल्म के गीत कवि प्रदीप से लिखवाना चाहते थे। नौशाद ने विनय भट्ट से कहा एक बार शकील के गीत देख लें। रवि सोच रहे होंगे भला शायर कैसे उनकी गीत के भजन लिखेगा? मगर जब उन्होंने शकील को जाना तो वह उनके प्रशंसक हो गए और इस फ़िल्म के सारे गीत शकील की झोली से निकले। इसके बाद जो हुआ, उसे इंग्लिश में कहते हैं, ‘रेस्ट इज हिस्ट्री’। भारत भूषण तथा मीना कुमारी की हिट जोड़ी की 1953 की इस फ़िल्म के कुछ और गीत देखिए और उनकी संगत में खो जाइए: ‘दूर कोई गाए’, ‘मोहे भूल गए सांवरिया’, ‘बचपन की मोहब्बत को।’
पचास और साठ के दशक में नौशाद और शकील दोनों ने इसके अलावा ‘दीदार’, ‘मदर इंडिया’, ‘मुग़ल-ए-आजम’, ‘दुलारी’, ‘शबाब’, ‘गंगा जमुना’ तथा‘मेरे महबूब’ जैसी फिल्मों में साथ-साथ काम किया। वैसे फ़िल्म के लिए उनका पहला गाना था, ‘अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेकरार का, आँखों में रंग भर...’ ‘दर्द’ फ़िल्म के इस दर्द भरे नगमे को गाया टुनटुन ने, जिनका असली नाम उमा देवी था, जो गायिका भी थीं। इसे भी नौशाद ने संगीत से संवारा था और आज भी यह गीत कर्णप्रिय है। उस समय तो इसने धूम मचा दी थी।
शकील बदायूँनी ने नौशाद के अलावा कई अन्य संगीतकारों की धुनों पर भी गीत लिखे। रवि, जिनका पूरा नाम रवि शर्मा था, के साथ उन्होंने ‘चौदहवीं का चांद’, ‘घराना’, ‘घूँघट’, ‘गृहस्थी’, ‘नर्तकी’, ‘फ़ूल और पत्थर’ तथा ‘दो बदन’ के गीत लिखे।
रफ़ी के स्वर में गाया शीर्षक गीत, ‘चौदहवीं का चांद हो’ और उस पर किया गया पिक्चराइजेशन! अगर आपने फ़िल्म देखी है तो कभी यह दृश्य नजरों से नहीं हट सकेगा और न ही गीत के बोल आप कभी भुला सकते हैं।
इसके लिए शकील को सर्वोत्तम गीतकार का फ़िल्म फ़ेयर अवॉर्ड मिला था। चाहे हास्य गीत, ‘मेरा यार बना है दूल्हा’, या फ़िर उदास गमजदा गीत, ‘मिली खाक में मुहब्बत’ हो, इस फ़िल्म के सारे गीत रवि-शकील की जोड़ी के हैं।फिल्म ‘घराना’ का गीत ‘हुश्नवाले तेरा जवाब नहीं’ के लिए शकील और रवि को बेस्ट गीतकार और बेस्ट संगीतकार का फिल्मफेयर एवार्ड मिला था। उन्हें ‘बीस साल बाद’ फ़िल्म के गाने ‘कहीं दीप जले कहीं’ के लिए भी फ़िल्मफ़ेयर का सर्वोत्तम गीतकार का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
हेमंत कुमार के साथ शकील की सबसे बड़ी सफ़ल फ़िल्म रही ‘साहिब बीवी और गुलाम’ जिसके ‘न जाओ सैंया छुड़ा के बइयाँ’, ‘भंवरा बड़ा नादान’ आज भी गुनगुनाए जाते हैं। एक सूत्र के अनुसार शकील ने अपने फ़िल्मी जीवन में करीब 89 फिल्मों के लिए गीत लिखे। शकील बदायूंनी ने मात्र 53 साल की उम्र पाई। आप प्यार करें या नफ़रत, हिन्दी फ़िल्मों की कल्पना गीतों के बिना नहीं की जा सकती है और यदि आप केवल शकील के लिखे गीत देखें तो उन्हें साहित्य में स्थान देने से गुरेज नहीं कर सकते हैं।