हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों से मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं।
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मासम बच्चियों के साथ अन्याय पर क्यों मौन है समाज?
हाल ही में देश के अलग-अलग हिस्सों से मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं सामने आई हैं। कई बच्चियां सीधे मार दी गईं तो कई हवस की शिकार हुईं। दरिंदे बढ़ रहे हैं और उन्हें सिवाए शरीर के कुछ नज़र नहीं आ रहा। ऐसे लोगों को सिर्फ यह कहकर छोड़ देना की वह दरिंदे हैं, मानवता के नाम पर कलंक हैं, हैवान हैं, शैतान हैं और उन्हें जल्द से जल्द सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। यह हमारे कर्तव्यों की इति श्री नहीं है।
दरअसल, सोशल मीडिया पर जाकर अपनी इस तरह की टिप्पणी दर्ज करा देने भर से ही हम अपना पक्ष साफ नहीं कर सकते। लेकिन होता यही है कि सिर्फ सजा की गुहार लगाने से ऐसे दरिंदों को सजा नहीं मिलेगी। हमें ही हिम्मत दिखनी होगी और भगत सिंह के कदमों पर चलना होगा। वह यदि वास्तव में कुछ देखना चाहते हैं और मानवता के प्रति नाम मात्र की भी संवेदना रखते हैं तो सबसे पहले यह देखें कि बच्ची, बच्ची होती है हिन्दू की या मुसलमान की है से फर्क नहीं पड़ना चाहिए। वह इंसान की बच्ची है या थी इस बात से फर्क पड़ना चाहिए।
इस तरह की घटनाएं जब भी हमारे सामने आती हैं तब हम में से कुछ धर्म के ठेकेदार सबसे पहले खबर में मसाला ढूंढ ने निकल पड़ते हैं कि पीड़ित बच्ची हिन्दू थी या मुसमान, निचली जाति की थी या आदिवासी। यही नहीं यह सारी घटनाएं जब ही हमारे सामने आती हैं जब उसमें क्रूरता की पराकाष्ठा हो,या दर्शायी गई हो। जैसे निर्भया से लेकर हाल ही में यूपी के अलीगढ़ में मासूम की हत्या की खबरें सामने आईं।
ऐसे नजाने कितने किस्से कितने जुल्म है जिनके विषय में यदि विस्तार से बात करने निकलें तो शायद शब्द कम पड़ जाएंगे, लेकिन हादसे खत्म न होंगे। चाहे हत्या के मामले में प्रद्युमान ह्त्याकांड हो या पुलवामा हत्याकांड हमारे हजारों जवान शहीद हो गए और लोग उनमें वर्दी ढूंढ रहे थे की कौन से जवान थे क्या उन्हें जवानों का दर्जा हंसिल था?
क्या कागज़ पर भी उनकी गिनती जवानों में होती है? क्या उनके शहीद होने पर उन्हें पेंशन वगैरह मिलती है?
अरे मैं कहती हूं क्या फर्क पड़ता है कि वह आर्मी से थे या नेवी से बीएसफ के थे या पुलिस वाले थे या किसी और सेना के थे। थे तो आखिर हमारे ही देश के जवान ना? जो अपना परिवार छोड़कर हमारे लिए हमारे देश, हमारे शहर, हमारे नगर कि सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
दरअसल, हम किसी का दुख बांट सकते हैं परंतु उस दुख को महसूस करने के लिए जब तक हम स्वयं उस दुख से नहीं गुजरते हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि उस व्यक्ति विशेष या उसके परिवार पर क्या बीत रही होती है। यह सब संवेदनहीनता नहीं है तो और क्या है।
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