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शंघाई सहयोग संगठन: चुनौतियों का सामना कर पाएगा भारत?

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शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का बिश्केक शिखर सम्मेलन 2019 - फोटो : ANI
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 जून को किरगिज़ गणराज्य की राजधानी बिश्केक में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में हिस्सा लिया।यह संगठन भारत के लिए एक नया मंच है। इस संगठन की शुरुआत 2001 में चीन, रूस, कज़ाकस्तान किर्गीज़ गणराज्य ताजीकिस्तान और उज़्बेकिस्तान ने की थी। 2017 में भारत और पाकिस्तान को सदस्यता देकर इस संगठन का विस्तार किया गया।

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क्या उद्देश्य हैं इस संगठन के?  
आर्थिक और सामरिक तौर पर महत्त्व रखनेवाले मध्य एशिया और यूरेशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश भारत पिछले कुछ समय से कर रहा है। खासकर सामरिक क्षेत्र में भारत के सामने दो चुनौतियां हैं। एक है आतंकवाद और दूसरा है चीन की विस्तारवादी नीतियां। दोनों का असर भारत की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ता है। 

21 और 22 मई को बिश्केक में हुई शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों की विदेश मंत्रियों की बैठक में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और बहुध्रुवीय संगठन और व्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए कदम उठाने पर सभी सदस्यों ने सहमति जताई। शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए  विभिन्न मंचों में से एक है जो भारत को इस क्षेत्र से जोड़ता है। 
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दिसंबर 2018 में भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह का संचालन शुरू किया। चाबहार बंदरगाह भारत को ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के देशों से जोड़ता है। इस बंदरगाह से अब भारत पाकिस्तान को दरकिनार कर सीधे मध्य एशिया तक पहुंच सकता है। इसके अलावा भारत ने भारत-मध्य एशिया संवाद की शुरूआत की है।

भारत अश्गाबात समझौता और अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा इन दोनों में शामिल है। बढ़ते संघर्षों को टालने के लिए और सभी के हितों की रक्षा हो इसके लिए भारत बहुध्रुवीय व्यवस्था और नियम आधारित व्यवस्था पर ज़ोर देता आ रहा है। ये दोनों मुद्दे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन भारत के सामने कुछ चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का समाधान किए बिना भारत की शंघाई सहयोग संगठन में भूमिका सीमित रह सकती है।
 

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शंघाई सहयोग संगठन (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
भारत के लिए क्या होंगी चुनौतियां? 
शंघाई सहयोग संगठन में भारत के लिए दो प्रमुख चुनौतियां हैं। एक है चीन और पाकिस्तान की एक साथ उपस्थिति। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा समस्या है। भारत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों से आतंकवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है। भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के मुद्दे पर एक होने की भी अपील करता रहा है। चीन पाकिस्तान का सबसे करीबी दोस्त है। हालांकि 1 मई 2019 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करना भारत के लिए एक बड़ी सफलता है।

यह इसीलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दस साल तक चीन इस प्रस्ताव का विरोध करता रहा था। लेकिन चीन के इस कदम से पाकिस्तान के प्रति उसके रुख़ में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा सकता। कालेधन पर नज़र रखने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स एफएटीएफ ने पाकिस्तान को आतंकियों को वित्तीय सहायता देने की वजह से ग्रे लिस्ट में डाल दिया है।

एफएटी एफ की 16 से 21 जून तक अमेरिका के ऑर्लैंडो में एक बैठक होने वाली है। इस बैठक में पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डालने के बारे में फैसला लिया जा सकता है। मसूद अज़हर पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का समर्थन करना चीन की तरफ से पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट से बचाने की कोशिश के तौर पर देखना चाहिए। जुलाई से चीन एफएटीएफ की अध्यक्षता करेगा जो भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक चुनौती खड़ी कर सकता है।

भारत के लिए दूसरी चुनौती है उसके अमेरिका के साथ रिश्ते। शंघाई सहयोग संगठन को अमेरिका विरोधी संगठन के तौर पर देखा जाता है। चीन और रूस की बढ़ती नज़दीकियां अमेरिका को इस क्षेत्र से बाहर रखने की कोशिश माना जा रहा है। मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने में अमेरिका की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। लेकिन इसके बदले में भारत को ईरान से कच्चे तेल की आयात बंद करनी पड़ी थी। हालांकि भारत का कहना है इससे चाबहार प्रकल्प पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन कच्चे तेल की आयात बंद करने से ईरान के साथ रिश्तों में थोड़ी अनिश्चितता ज़रूर आई है जिसका असर भारत के इस क्षेत्र में विस्तार करने पर पड़ सकता है।

इसी तरह भारत के रूस से एस 400 मिसाइल सिस्टिम खरीदने पर भी अमेरिका ने आपत्ति जताई है। रूस से एस 400 न खरीदने के बदले में अमेरिका ने अपनी मिसाइल सिस्टिमए ड्रोन और एफ 35 फाइटर जेट खरीदने का प्रस्ताव भारत के सामने रखा है। लेकिन भारत रूस से मिसाइल सिस्टिम खरीदने के अपने रुख़ पर कायम है।

शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए मध्य एशिया और यूरेशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी ज़रिया हो सकता है। लेकिन भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करती है की क्या भारत अमेरिका और चीन के साथ अपने रिश्तों में संतुलन रख सकता है, क्या अमेरिका के साथ मज़बूत आर्थिक और सामरिक रिश्ते रखने के साथ ही क्या भारत मध्य एशिया और यूरेशिया में अपनी भागीदारी बढ़ा सकता है यह देखना अभी बाकी है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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