1891 में राजद्रोह का पहला मामला अखबारनवीस जोगेंद्र बोस पर दर्ज हुआ था। उसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले बाल गंगाधर तिलक से लेकर अनेक सेनानियों ने मुकदमे झेले।
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आंकड़ों की जुबानी
हालांकि, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 2015 से 2020 के बीच राजद्रोह के 356 मामले दर्ज हुए और 548 गिरफ्तारियां हुईं। इन पांच-छह वर्षों में भले इतनी बड़ी संख्या में राजद्रोह के मामले दर्ज हुए लेकिन केवल 7 मामलों ही 12 दोषियों को सजा हो पाई। औसतन हर साल एक मामला और दो दोषी।
इन आंकड़ों में हैरानी यह भी है कि जिन 548 की गिरफ्तारी हुई है, उनमें 18 से 30 साल आयु वर्ग के आधे से अधिक यानी 53 फीसदी हैं। जाहिर है, जाने-अनजाने पोस्ट फॉरवर्ड कर या अन्य बचकाना हरकत से उकसावे का माध्यम बन गए। 35 फीसदी तो ऐसे भी ही जिनकी आयु 30 से 45 साल की है।
सौ साल बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में
1860 के इस कानून के बेजा इस्तेमाल का मामला सौ साल बाद पहली बार 1962 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। केदारनाथ बनाम बिहार राज्य मामले में 20 जनवरी 1962 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला मील का पत्थर साबित हुआ। तब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को संविधान सम्मत बताया लेकिन माना कि शब्दों-भाषणों को तभी राजद्रोह माना जा सकता, जब भीड़ को उकसाया गया हो और उससे भीड़ ने हिंसा की हो। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकों को बोलने-लिखने का अधिकार है।
जाहिर है, राजद्रोह के दर्ज मामलों में तेजी ने बहस का मंच सजा दिया कि इसका इस्तेमाल कितना बेजा हो रहा और कितना वाजिब। ऐसे में कानून-व्यवस्था राज्य का मामला भी बनता है। ताजा सुनवाई के दौरान भी केंद्र ने एक नई गाइडलाइन की ओर इशारा किया है जिसमें निचले स्तर पर एसपी को जिम्मेदारी की वकालत की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भले केंद्र सरकार ने पहले इस कानून को पूरी तरह जायज ठहराया
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बिहार नजीर भी, रिकॉर्ड भी
जो बिहार केदारनाथ मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नजीर बना, गणतंत्र की जननी उसी बिहार की धरती का सच यह भी है कि वहां राजद्रोह के सर्वाधिक 168 मामले हैं। बिहार में नीतीश कुमार के रब हैं तो भाजपा के राम। ऐसे में धार्मिक चश्मे से भी कार्यवाही को आंका नहीं जा सकता।
मिश्रित गठबंधन वाले राज्य का कड़वा सच है कि वहां राजद्रोह के मामले। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर यदि गौर फरमाएं तो जहां बिहार में सर्वाधिक मामले हैं, वहीं असम में 2018 से 20 के बीच सर्वाधिक 56 गिरफ्तारी। यह उस असम का सच है, जहां से अब अफस्पा जैसे कानून पूरी तरह खत्म करने की कोशिशें परवान चढ़ने वाली है। विकास और शांति की मुख्य धारा से असम पूरी तरह जुड़ने को तैयार है। जिस असम में शांति और विकास की बयार बहने लगी है, उसी असम में राजद्रोह के मामले और गिरफ्तारी भी।
पिछले दो साल की अवधि में गिरफ्तारी के नाम पर कर्नाटक दूसरे पायदान पर 24, तो नगालैंड में यह संख्या 18 है। राजद्रोह कानून के बेजा इस्तेमाल को लेकर यूपी पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन यहां यह संख्या महज 17 है,जो बिहार, असम, कर्नाटक, नागालैंड से कम है। इसी तरह आंध्र प्रदेश में 15, मध्य प्रदेश में 4 और छत्तीसगढ़ में 3 गिरफ्तारी हैं। ये आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि भाजपा, कांग्रेस या अन्य दल की सरकार वाले राज्यों में भी राजद्रोह के मामले और गिरफ्तारियां हैं।
बदलाव की बयार
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भले केंद्र सरकार ने पहले इस कानून को पूरी तरह जायज ठहराया। ना-नुकुर के बाद पुनर्विचार की बात की। अब नए सिरे से नई राह की ओर यह मामला बढ़ चला है। पुराने मामलों में राहत के लिए अदालतों का रुख करने और नए मामलों पर रोक से सुप्रीम फैसले ने फौरी राहत भी दे दी है।
अब जुलाई के तीसरे हफ्ते में सुनवाई होगी। जाहिर है, तब तक केंद्र सरकार ठोस मसौदा तैयार कर चुकी होगी। करीब डेढ़ सौ साल पुराने अंग्रेजों के इस कानून में अब अमृत महोत्सव की बेला में बदलाव की जो आस जगी है, उससे अमृत की बूंदें तो नजर आ ही रही है जो समाज में जहर को रोके।
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