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जरूरी प्रयास: प्रकृति और पर्यावरण शिक्षा आवश्यक, ताकि हम अपने अस्तित्व को समझें

सार

प्रकृति और पर्यावरण शिक्षा कोई भी, किसी भी उम्र में, औपचारिक या अनौपचारिक रूप से और किसी भी माध्यम से प्राप्त कर सकता है। जरूरत है तो केवल एक चीज की, वह है थोड़ी सी उत्सुकता और थोड़ी सी अवलोकन करने की युक्ति।
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बर्ड वाचिंग सेशन में स्कूली छात्र - फोटो : Dr Priyamvada Bagaria
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विस्तार
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आप चाहे भौतिक या रसायन विज्ञान में रुचि रखते हों, इतिहास में या फिर फैशन डिजाइनिंग में, या दूर अंतरिक्ष से ही क्यों न जुड़ी हो आपकी रुचि, प्रकृति और पर्यावरण ऐसे सन्दर्भ हैं जो आपको आकर्षित जरूर करते होंगे। लहलहाते हरे खेत, गगन चूमते पहाड़, समन्दर में पिघलता सूरज, पंछियों का चहकना और पुष्पों से गंधाये उपवन, ये हम सभी को अपने रोजमर्रा की जिन्दगी के जद्दोजहद से जूझते हुए, कुछ सुकून के पल देते हैं।

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लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि प्रकृति के जिन अवयवों को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, उनके प्रति थोड़ी सी संवेदनशीलता रखने पर, हम एक बेहतर जीवन जी सकते हैं और प्रकृति के नियमों को बेहतर समझ सकते हैं।  
 

ख़ास बात यह है कि प्रकृति और पर्यावरण शिक्षा कोई भी, किसी भी उम्र में, औपचारिक रूप से या अनौपचारिक रूप से और किसी भी माध्यम से प्राप्त कर सकता है। जरूरत है तो केवल एक चीज की, वह है थोड़ी सी उत्सुकता और थोड़ी सी अवलोकन करने की युक्ति। अक्सर हमारे घर के बड़े बुजुर्गों की बातों में हमने पाया है कि उनके मुहावरों और लोकोक्तियों में प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के कई सन्दर्भ पाए जाते हैं। जैसे कि खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे, आसमान से गिरे खजूर पर अटके, ऊंट के मुंह में जीरा, या ऊंट का पहाड़ के नीचे आना।  

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पंडित विष्णु शर्मा द्वारा लिखी गई पंचतंत्र की कहानियां तो हम सब ने बचपन में पढ़ी हैं। यह कहानियां एक बेहतरीन उदाहरण हैं कि हमारे पूर्वजों ने कितनी बारीकी से आस-पास की प्रकृति को समझा था और प्रकृति के नियमों से सीख लेकर मानव जीवन को बेहतर करने का प्रयास किया था।


प्रकृति की समझ को विकसित करें

यदि आप प्रकृति की और अपनी समझ को विकसित करना चाहते हैं, तो यह बेदह आसान है। भले हम घने आबादी वाले व्यस्त शहरों में क्यों न रहते हों, हमारे आस-पास कुछ पेड़ तो अवश्य मिल जाते हैं। क्यों ने पहल की जाए की हमें अपने आस-पास के पेड़ों के नाम पता हों। नीम, गुलमोहर, सेमल, अमलतास, पीपल, बरगद, बेर, जामुन, अर्जुन, अशोक आदि कुछ ऐसे पेड़ हैं, जो शहरों में भी आसानी से दिख जाते हैं। यदि ध्यान दें, तो उम्रदार लोगों को अक्सर पाएंगे कि किसी पता ठिकाना को समझाते वक़्त, वे अक्सर पेड़ों के स्मारक बताते हैं। जैसे कि, आम के पेड़ से पास वाली मंदिर से दाएं ओर, या इमली के पेड़ के पास वाले पनवारी से दो कदम आगे।

जरा सोचिए, यदि हम फिर से पेड़ों की स्मारकों की भाषा का इस्तेमाल करें, तो कितना आसान होगा पेड़ों के नाम याद रखना। और केवल नाम नहीं, यदि हम अपनी बोल-चाल की भाषा में पेड़ों को शामिल करें, तो स्वतः ही हम उन पेड़ों के फलने, फूलने और पत्ते झरने के समय और प्रक्रिया पर भी ध्यान देने लगेंगे। इस एक छोटे से अभ्यास से हम प्रकृति के साथ एक अनमोल रिश्ता कायम कर पाएंगे। हमारे मन में सुकून और संवेदनशीलता की प्रगति होगी, तथा समाज में पर्यावरण के संरक्षण का महत्व भी समझ पाएंगे। 

पेड़ों पर हमारा ध्यान आकर्षित हो, इसके बाद यह स्वाभाविक है कि हम उन पेड़ों पर आने वाले पंछियों को नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। और आज के इंटरनेट, सोशल मीडिया व तरह-तरह के एंड्राइड एप्प्स के जमाने में, पेड़ों, पंछियों या कोई भी वन्यजीव के बारे में जानना कोई मुश्किल बात नहीं है।

फेसबुक पर तो आप दिन में एक मर्तबा अपनी प्रोफाइल व नोटिफिकेशन देखते ही होंगे। उसी फेसबुक में, 'बर्ड्स ऑफ़ इंडिया', 'ट्रीज ऑफ़ इंडिया', 'बटरफ्लाईज ऑफ़ इंडिया', 'स्नेक्स ऑफ़ इंडिया', आदि कई ग्रुप पेजेज हैं जिनमे प्रकृति प्रेमी व जानकारों से आप जुड़ सकते हैं।  इन ग्रुप्स के सदस्य अक्सर पेड़ों, पंछियों और वन्यजीवों के तस्वीर, उनके नाम और पाए जाने वाले भौगोलिक स्थितियों की जानकारी साझा करते हैं।

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मैंग्रोव की स्टिल्ट जड़ों का अवलोकन करते छात्र - फोटो : Dr Priyamvada Bagaria

पेड़ या पंछियों के बारे में जानने की कोशिश

इन ग्रुप्स पर, आप अपने आस-पास के पेड़ या पंछी के तस्वीर प्रेषित कर, जानकारों की मदद से उनकी विषय में जान सकते हैं और अपने ज्ञान और रुचि में वृद्धि कर सकते हैं।  इसके अलावा, कई एंड्राइड एप्प हैं जिनमें केवल तस्वीर अपलोड करने पर आप पेड़ों पंछियों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रणाली में, 'गूगल लेंस, भी अत्यंत आसान और उपयुक्त तरीका है अपनी प्राकृतिक जानकारी को बढ़ाने का। किसी भी फूल, पौधे या जीव की छवि को अपलोड करने पर, उससे जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध हो जाती है।    

उपर्युक्त विधियों को अपनाने के बाद, यदि आप अपनी रुचि को एक कदम और आगे लेकर जाना चाहते हों, तो कई तरह के प्राकृतिक शिक्षा के ट्रेनिंग और वर्कशॉप भी आयोजित किए जाते हैं, जिनसे जुड़कर आप अपनी प्राकृतिक जानकारी में इजाफ़ा कर सकते हैं। उदहारण के तौर पर, मुंबई स्थित 'बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी', 'सैंक्चुअरी एशिया फाउंडेशन', 'स्प्राउट्स एनवायरनमेंट ट्रस्ट', अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन 'वर्ल्डवाइड फण्ड फॉर नेचर', मैसूर स्थित 'नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन', दिल्ली स्थित 'सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन', तथा कई स्वतंत्र फ्रीलांसर, प्राकृतिक शिक्षा प्रदान करने में अपना सहयोग देते हैं।

अपने अपने शहर में इन शिक्षा प्रणालियों से जुड़कर, आप प्राकृतिक ज्ञान का लाभ ले सकते हैं।  इन दिनों स्कूलों में भी प्राकृतिक और पर्यावरण शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाता है।  

भले यह औपचारिक रूप से बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा न हो, किन्तु विद्यालयों में पाठकों के लिए अतिरिक्त पाठ्यक्रम में प्राकृतिक और पर्यावरण शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम अवश्य निहित होते हैं।  यदि आपके बच्चों के स्कूल में इस तरह के अतिरिक्त पाठ्यक्रम हैं, तो आप अपने बच्चों को अवश्य प्रोत्साहित करें, और यदि न हो तो, स्कूल प्रबंधन से अनुरोध कर प्रकृति की शिक्षा अवश्य शामिल करवाएं।

अगली छुट्टियों में, बच्चों को मॉल ये सिनेमा की जगह, नजदीकी अभ्यारण्य दिखाएं और सामान्य प्राकृतिक जानकरी की ओर उत्सुकता बढ़ाएं। प्राकृतिक शिक्षा प्राप्त समाज और प्राकृतिक जगरूकता रखने वाला समाज, एक बेहतर कल की ओर बढ़ने की अधिक सम्भावना रखेगा।     


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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