सत्यजीत रे आज जीवित होते तो जन्म के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। लेकिन वे अगर होते तो हम उन्हें इस तरह याद नहीं करते। हम हिन्दुस्तानी तो किसी का मूल्यांकन करने के लिए उसके मर जाने का इंतज़ार करते हैं।
ज़िंदा रहते उसे मान देने का संस्कार हम शायद भूल चुके हैं। अपवाद छोड़ दीजिए। फिर देखिए कि आज कितने अख़बारों और चैनलों ने सत्यजित रे को याद किया है। हमने उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिया, लेकिन क्या वे इस सम्मान के लिए इस संसार में थे?
दूसरी तरफ देखिए उन्हें विशेष ऑस्कर अवॉर्ड मिलता है। जीते जी मिलता है। ऑस्कर की जूरी उनके जीवित रहते देती है। वे उन दिनों कलकत्ते में बीमार थे और अवॉर्ड लेने के लिए जाने की हालत में नहीं थे। नतीज़तन जूरी अपने संविधान में फ़ेरबदल करती है और सम्मान उन्हें घर आकर दिया जाता है।
सम्मान की सूचना पर उन्होंने कहा- "यह मेरे लिए अप्रत्याशित है। मैं बहुत खुश हूंं। बहुत खुश"। जब एक तरह से दुनिया भर के फ़िल्मकार उनकी पूजा करने लगे थे और परदेसी सम्मानों से उनका घर भर गया तो 1985 में उन्हें दादा साहब फाल्के सम्मान दिया गया। जितने सम्मान उन्हें परदेस में मिले, वे चमत्कृत करने वाले हैं।
लंदन, ऑक्सफ़ोर्ड, कोलकाता और दिल्ली समेत एक दर्ज़न से अधिक यूनिवर्सिटी उन्हें डीलिट् देती हैं। स्टार ऑफ़ युगोस्लाविया मिलता है। फ्रांस का लीजेंड द ऑनर मिलता है। बर्लिन,कान और वेनिस फ़िल्म समारोहों में उन्हें ख़ासतौर पर सम्मानित किया जाता है।
संसार के सर्वश्रेष्ठ दस फ़िल्मकारों में उन्हें गिना जाता है और हिन्दुस्तान में उन पर एक पीएचडी ढंग से नहीं होती। भारत में कितने विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहांं सत्यजीत रे का सिनेमा पाठ्यक्रमों में शामिल है?
कोरोना काल से ठीक पहले मैं कोलकाता गया था। अंतराष्ट्रीय विज्ञान फ़िल्म महोत्सव में। एक अतिथि के तौर पर। यह महोत्सव वहांं के सत्यजीत रे फ़िल्म संस्थान में हुआ था। वहांं पहुंचने के बाद मुझे क्या महसूस हुआ- शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मैंने अपने भीतर सत्यजीत रे को धड़कता हुआ पाया। संस्थान के कण कण में रे के दर्शन हो रहे थे। उनकी पहली फ़िल्म पाथेर पांचाली मेरी पहली बांग्ला फ़िल्म थी और उनकी अंतिम फ़िल्म घरे बायरे मेरी आख़िरी बांग्ला फ़िल्म थी। उसके बाद मैंने कोई बांग्ला फ़िल्म नहीं देखी।
कम लोग ही यह जानते होंगे कि कोलकाता में 1948 में फ़िल्म सोसायटी की शुरुआत करने वाले सत्यजित रे पहले फ़िल्मकार थे। उसके बाद देश भर में श्रेष्ठ सिनेमा को प्रोत्साहित करने के लिए सिनेमा- आंदोलन शुरू हुआ था।
इंदौर में भी हम लोग फ़िल्म सोसायटी संचालित करते थे और संभवतः1984 में उनकी आख़िरी फ़िल्म घरे बाइरे जारी हुई थी। उसी साल यह फ़िल्म सोसायटी के सदस्यों को दिखाई गई थी। उन दिनों श्रीराम ताम्रकार, महेशजोशी और वीरेनमुंशी क्लब के संयोजकों में होते थे। ताम्रकार जी और वीरेन मुंशी तो नहीं रहे,लेकिन घरे बाई रे का एक एक फ्रेम छत्तीस बरस बाद भी आंंखों में बसा है। यही सत्यजित रे का जादू है।
पाथेर पांचाली क्या थी? सेल्युलाइड पर रची एक कविता। लाइट एन्ड शेड का विलक्षण समन्वय। रविशंकर का सम्मोहक संगीत। पर कथा झिंझोड़ने वाली थी। सिद्धांतों और आदर्शों के कारण ज़िंदगी की लड़ाई हारते एक ग़रीब परिवार की कहानी थी। जीवन के कठोर यथार्थ का अत्यंत भावुक और मार्मिक चित्रण इस तरह से पहले कभी नही हुआ था।
इस फ़िल्म का पहला प्रदर्शन भारत में नहीं न्यूयॉर्क में हुआ था। 75 साल पहले हुए इस शो को लगातार दो बार देखा गया। सारे लोग फटी फटी आंंखों से फ़िल्म देख रहे थे। भारत में तो पहले सप्ताह में ही पाथेर पांचाली सिनेमाघरों से उतर गई थी। जब विदेशों में इस फ़िल्म ने धूम मचाई और एक के बाद एक देशों में झंडे गाड़े तो हिन्दुस्तान के लोगों ने कहना शुरू कर दिया - वाह ! क्या फ़िल्म है।
इस फ़िल्म को जब विदेशों में छह अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल गए तो हमारे यहांं राष्ट्रीय सम्मान मिला। पाथेर पांचाली के बाद तो सत्यजित रे ने छत्तीस फ़िल्मों का एक ख़ज़ाना हमें तोहफ़े में दिया है। अपराजितो (1956 ),पारस पत्थर (1958) ,जलसाघर (1958) ,अपूर संसार (1959) ,देवी (1960) ,महानगर (1963) ,चारुलता (1964) ,सोनार केला (1974) ,पीकू (1980) और गणशत्रु (1989) उनके इसी ख़ज़ाने के नायाब मोती हैं।
हिंदी में शतरंज के खिलाड़ी 1977 और सदगति 1981 सत्यजीत रे की अनमोल कलाकृतियांं हैं। विश्व स्तर पर उन्हें मान मिला है। सत्यजीत रे का फ़िल्म संसार विश्व सिनेमा के लिए उनका कालजयी उपहार है। उनकी एक-एक फ़िल्म अपने आप में एक अलौकिक रचना है जो दर्शक को एक अलग लोक में ले जाती है। आने वाली पीढ़ियांं तो शायद इस पर यक़ीन ही न करें कि हिन्दुस्तान में एक ऐसा कोहिनूर फिल्मकार पैदा हुआ था।
कलेजे में एक फांंस के साथ सलाम ! सत्यजित रे।
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