दरअसल, अमेरिका और यूरोप के तमाम देश कोरोना का चीनी दंश सहज ही नहीं भूल जाएंंगे। इस संक्रामक महामारी ने उन्हें आर्थिक नज़रिए से दशकों पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया है। वे इसके लिए सीधे तौर पर सिर्फ़ चीन को ज़िम्मेदार मानते हैं, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फुफकारते हैं कि चीन को सबक़ सिखाया जाएगा तो उसमें उनकी कोरी गीदड़ भभकी नहीं दिखाई देती।
संयुक्त राज्य अमेरिका इस महामारी में अब तक साठ हज़ार से अधिक नागरिक खो चुका है। यह महाशक्ति जब तक बीमारी पर नियंत्रण पाएगी, तब तक आशंका है कि आंंकड़ा एक लाख पार कर जाएगा। इसके बाद यूरोप के चार देशों की संख्या भयावह है। इटली के लगभग 28,000 लोग दुनिया छोड़ गए, स्पेन में क़रीब 25,000 और फ्रांस के 24,000 निवासी काल के शिकार बन गए।
ब्रिटेन में यह संख्या 22,000 के आसपास है। चिकित्सकों को लगता है कि कोरोना पर काबू पाते-पाते इतनी ही मौतें इन देशों में और हो जाएंंगीं। इसके बाद रुस और जर्मनी जैसे अनेक यूरोपीय देशों में मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। यानी तीन से चार लाख लोग काल कवलित हो जाएंंगे।
इतनी मौतें तो कभी जंग में भी नहीं हुईं। अमेरिका ही नहीं, कमोबेश सभी यूरोपीय देशों के कोरोना के मामले में चीन के साथ बेहद कड़वे अनुभव हैं। चीन ने उनसे इस संकटकाल में धूर्त और कपटी कारोबारी की तरह व्यवहार किया है।
यक्ष प्रश्न यह है कि अपनी गोरी चमड़ी को विशिष्ट देवीय वरदान मानने वाले ये मुल्क़ क्या चीन को यूंं ही भूल जाएंंगे? रुस को छोड़ दें तो अधिकतर देश अमेरिका के पिछलग्गू ही माने जाते हैं और इस बार अमेरिकी ग़ुस्सा सातवें आसमान पर है। कोरोना को क़ब्ज़े में करने के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी प्राथमिकता राष्ट्रपति चुनाव हैं।
ट्रंप दोबारा चुने जाते हैं तो चीन के प्रति उनका रवैया क्रूर और प्रतिशोध से भरा ही होगा। अमेरिकी मतदाताओं के बीच इतनी बड़ी संख्या में मौतें भी मुद्दा बन गया है। यदि कोई दूसरा राष्ट्रपति चुना जाता है तो उसके लिए भी अवाम का आक्रोश शांत करना बड़ी प्राथमिकता होगी। बताने की ज़रूरत नहीं कि अमेरिकी अपने एक नागरिक की निर्दोष मौत को बड़ी गंभीरता से लेते हैं। इसके बाद यूरोप के कम से कम आधा दर्ज़न ताक़तवर देश चीन के ख़िलाफ़ एक मोर्चे पर डट सकते हैं।
सवाल यह है कि क्या चीन अब अलग-थलग पड़ जाएगा और उसके बुरे दिन आने वाले हैं। यक़ीनन चीन की चुनौतियांं कई गुना बढ़ जाएंंगीं। पश्चिम और यूरोप के संयुक्त विरोध का सामना उसके लिए आसान नहीं है। तुर्की और ईरान जैसे देश उसके प्रति सहानुभूति रख सकते हैं ,मगर वे अपनी ही मुश्किलों से जूझ रहे हैं। रूस भी एक सीमा तक ही चीन का साथ दे सकता है। तटस्थ रहना शायद उसकी प्राथमिकता होगी।ऑस्ट्रेलिया पहले ही चीन के खुलकर विरोध में आ चुका है।
अफ़्रीक़ी देशों से सहायता मिलने का सवाल ही नहीं उठता। एशिया में जापान से वह उम्मीद नहीं कर सकता। पाकिस्तान और अन्य छोटे देश भी कितनी मदद कर पाएंंगे- कहना कठिन है। भारत का साथ देने का तो सवाल ही नहीं उठता। अलबत्ता किसी पंच या मध्यस्थ की कोई भूमिका वह सुरक्षित कर सकता है।
लब्बोलुआब यह कि चीन के लिए यह बरस कांंटों भरी राह पर चलने का है। वह अकेला भी मुक़ाबला करने में सक्षम है।लेकिन उसे तब ख़ुद को एक लंबे -बेहद लंबे आपातकाल का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।