विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित सारनाथ
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सातवीं शताब्दी ईस्वी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए चीनी यात्री हुएनसांग ने भी सारनाथ के विषय में विस्तृत विवरण दिया। उसके अनुसार सारनाथ में महात्मा बुद्ध की धातु से निर्मित एक विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस प्रतिमा में महात्मा बुद्ध को धर्म चक्र को घुमाते हुए दिखाया गया है। उसने यहां विशाल विहार होने का विवरण दिया साथ ही यह भी उल्लेख किया की सारनाथ में 1500 से अधिक बौद्ध भिक्षु निवास करते हैं। ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमण से सारनाथ भी अछूता नहीं रहा। ऐसा प्रतीत होता है की यहां स्थित विहार व स्तूपों को नुकसान पहुंचाया गया। परन्तु 1026 ईस्वी में स्थिरपाल व वसंतपाल नामक दो भाईयों ने धर्मराजिका स्तूप को हुए नुकसान के बाद वहां पुनर्निर्माण कार्य करवाया।
बारहवीं शताब्दी सारनाथ के वैभव की अंतिम शताब्दी रही । इस काल में गढ़वाल शासक गोविन्द चंद्र की पत्नी कुमारदेवी ने यहां एक विशाल विहार की स्थापना करवाई जिसे धर्मचक्र जिन विहार कहा गया । बारहवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में हुए इस्लामिक आक्रमणों के बोझ तले सारनाथ का यह पवित्र स्थल इतिहास में खो गया । काल के चक्र में खो चुके इस एतिहासिक पुरास्थल को पुनर्स्थापित किया भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग व स्वतंत्र पुराविदों ने । कभी कर्नल मेंकेंजी तो कभी ऐलेकजेंडर कनिंघम, समय-समय पर विभाग द्वारा यहां पुरातात्विक उत्खनन संपादित किए गए । इन उत्खननों के फलस्वरूप कई मनौती स्तूप, विहार, बौद्ध- शैव प्रतिमाएँ आदि पुरावशेष प्रकाश में आए।
इन सभी पुरावशेषों को सारनाथ स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। सारनाथ के स्मारकों को भारत सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकार किया। विश्व धरोहरों की संभावित सूची में तो सारनाथ सन् 1998 से था। 28 वर्षों की दीर्घकालीन प्रतीक्षा के पश्चात अंततः संपूर्ण विश्व को शांति का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध से संबंधित इस पवित्र व एतिहासिक पुरास्थल को विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित करना स्वागत योग्य है ।