आखिरकार 75 वर्षों के बाद ही सही नवनिर्मित संसद भवन के लोकार्पण के दिन देश एक ऐतिहासिक गौरवशाली परंपरा की पुनरावृति का साक्षी बनने जा रहा है, जिसे आजादी की पूर्व संध्या पर अंग्रेजों द्वारा भारत को सत्ता हस्तांतरण के स्मरणीय क्षण की स्मारिका के रूप में अपनाया गया था। यह रस्म भारत के होने वाले प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल माउंटबेटन द्वारा एक राजदंड रूपी सेंगोल को सौंप कर पूर्ण की गई थी।
ऐसी ही अनेकों धरोहरें जिन्हे हजारों वर्षों तक समाज द्वारा सींचा और विकसित किया गया भारत के प्राचीनतम शौर्यवीर और सहिष्णु विशाल इतिहास की जीवंत कथा वाचक है, साथ ही भारत के स्वर्णिम वैश्विक सांस्कृतिक पहचान को भी परिभाषित करती रही हैं।
विरासत में मिली रीति-रिवाज और परंपराएं भले ही आज के परिवेश में व्यावहारिक ना हों परंतु निश्चित रूप से इनके पीछे का संदेश एक अटल सत्य की तरह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि हजारों वर्ष पूर्व था। बल्कि सही मायने आज के भौतिकवादी युग में, देशवासियों के लिए एक प्रेरणा के अनन्य स्रोत के रूप में इससे अच्छा विकल्प क्या हो सकता है? जिसमें स्वपूर्वजों के शुभाशीष भी समावेशित हो और साथ ही भावी पीढ़ियों को भी एक दिशा मिलती रहे।
तो नियत यही है कि आज देश की संसद भले ही संविधान से चले परंतु अध्यक्ष के आसन के समीप स्थापित यह राजदंड रूपी सेंगोल लोकतंत्र के मूलभूत उद्देश्य एवं मूल भावना को निरंतर जनप्रतिनिधियों को स्मरण कराती रहेगी।
फिर इन्हे मात्र संग्रहालय में ही धूल चाटने के लिए रखना आम नागरिकों को गौरवशाली इतिहास से वंचित रखने के समान ही है क्योंकि यह अनूठी संस्कृति भंडार की विशाल धरोहर भारत की गौरवान्वित इतिहास का वो हिस्सा हैं जिन्होंने अपने देश को एक स्वर्णिम वैश्विक सांस्कृतिक पहचान दी है।
परंतु कहीं ना कहीं आज यह परंपराएं और इतिहास लुप्त होने की कगार पर हैं जिसका कारण है पीढ़ी दर पीढ़ी तेजी से बदलती मानसिकता- जो आज विरासत में मिले हुए इन धरोहरों को न ही सम्मान दे पा रही है और न ही समय। आज भौतिकवाद के इस युग में वर्षों से सहेजी गईं, ये प्रथाएं युवा पीढ़ियों के लिए निरर्थक सी प्रतीत होती जा रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान के मूल कर्तव्य के अनुच्छेद 51 एवं संस्कृति की इस समृद्ध विरासत को महत्व देना और उसको संरक्षित करना प्रत्येक नागरिक के कर्तव्य के रूप में इंगित कर दिया था।
वास्तव में पुरखों से मिली ये धरोहरे और दायित्व-बोध भी विरासत का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना की धन-संपदा। ऊपर से दशकों से देश में चली आ रही विरोध की राजनीति के इस युग में इन धरोहरों को लगातार सांप्रदायिक चश्मे से ही देखा गया। जिस कारण एक धर्म को न्यायोचित सम्मान देना. अन्यथा ही दूसरे धर्म के अपमान और दुष्प्रचार को जन्म देता रहा है। विडम्बना यह कि इसी झूठे धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत के प्राचीन आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व के ये हजारों प्रतिबिम्ब धूमिल होते ही चले गए।
लोकतंत्र में एक जिम्मेदार विपक्ष का स्थान बहुत महत्वपूर्ण होता है और फिर ऐसा भी नहीं है कि वर्तमान परिवेश में वास्तविक एवं यथार्थ मुद्दों का कोई अभाव हो। शायद इसी दिशा में गत वर्षो में कांग्रेस द्वारा सत्ताधारी पक्ष की खामियां ढूंढने के लिए समिति का भी गठन किया गया था। तो क्या यह मान लिया जाए कि यथार्त मुद्दों का अभाव से ग्रसित विपक्ष ओच्छी राजनीती के लिए मजबूर हो गया है?
आज देश के वर्तमान परिवेश में तुच्छ दोषारोपण की राजनीति से आम जनता भी शर्मसार है और कितनी ही बार वैश्विक पटल पर भी स्वदेशी माखौल की स्थिति संभालनी मुश्किल हो जाती है। जिम्मेदार बौद्धिक वर्ग चिंतन करे कि आज के विचित्र राजनैतिक परिवेश में बहन जी के हाथी स्मारकों से तो किसी को गुरेज नहीं है परन्तु जीवन जीने के मूल्यों का संदेश देने वाली पूर्वजों के ये धरोहरे कब तक उपेक्षा की शिकार बनती रहेगी ?
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