राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना (प्रिएंबल) को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
लेकिन, संविधान में सबसे बड़ा संशोधन आपातकाल के दौरान तब किया गया, जब पूरा विपक्ष जेलों में बंद था। संसद में बगैर चर्चा के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन, जिसे लघु संविधान भी कहा जाता है, से संविधान के मूल स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया। 42वें संशोधन में मौलिक अधिकारों में कटौती की गई थी। प्रिएंबल में सोशलिस्ट, सेक्युलर तथा यूनिटी एवं इंटीग्रिटी शब्द को जोड़ा गया।
इस संशोधन में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कई प्रतिबंध लगाए गए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा शक्तियां सीमित कर दी गईं। मूल अधिकारों की रक्षा को कमजोर किया गया था। लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल से बढ़कर छह साल कर दिया गया।
जब वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई तो उसने वर्ष 1978 में संविधान में 44वां संशोधन कर 42वें संशोधन को काफी हद तक पलट दिया। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा को फिर मजबूत किया गया। लोकसभा का कार्यकाल पांच साल किया गया। सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा शक्ति बहाल की गई, यानी कांग्रेस ने बिना चर्चा के संविधान में जो संशोधन किया था, उसमें संसद के माध्यम से सुधार किया गया।
आपातकाल की घोषणा पर नियम बनाए गए, जिनमें कहा गया कि राष्ट्रपति तभी राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकता है, जब कैबिनेट की लिखित सलाह हो। संसद को आपातकाल की समीक्षा करने और उसे छह महीने के भीतर दोबारा मंजूरी देने की शक्ति दी गई। पर, आश्चर्यजनक यह है कि प्रिएंबल में जोड़े नए शब्दों को ज्यो की त्यो छोड़ दिया गया।
आज तक तिथि तक संविधान में 106 बार संशोधन हो चुका है, जिसमें कांग्रेस नीत सरकारों ने 55 साल में 77 संशोधन और भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकारों ने 16 साल में 22 संशोधन किए हैं।
वैसे, आपातकाल लागू करने और उस दौरान किए बदलावों पर कांग्रेस सदैव खुली चर्चा से बचती रही है, लेकिन इनदिनों उसने नया राग अलापा है, आपातकाल बनाम अघोषित आपातकाल का, ताकि मूल चर्चा से बचा जा सके। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बयानों से स्पष्ट हो रहा है कि वो 50 वर्ष पुराने आपातकाल की चर्चा को अप्रासंगिक मान रहे हैं। वो चर्चा को वर्तमान सरकार के इर्द-गिर्द रखना चाहते हैं। इसी लाइन पर इंडी गठबंधन के अन्य सहयोगी भी चल रहे हैं, जबकि उनमें कई ऐसे हैं, जो आपातकाल के दौरान जेल गए थे।
हालांकि, प्रिएंबल में जोड़े सोशलिस्ट और सेक्युलर शब्द का मुद्दा पहले भी उठ चुका है और यह बहस चलती आ रही है कि मूल संविधान में जो प्रिएंबल है, उसे ही स्वीकार किया जाए। यह समय का आवश्यकता है कि संसद में एक बार पुनः इस विषय पर चर्चा हो। अगले महीने जुलाई में संसद का मानसून सत्र प्रस्तावित है। बेहतर तो यही हो कि पक्ष-विपक्ष मिलकर इस संदर्भ में संसद में स्वस्थ चर्चा करे।
जनता से भी सुझाव मांगे जा सकते हैं। संविधान निर्माताओं ने जिस मूल संविधान की प्रस्तावना को स्वीकार किया था, उसे आखिर संविधान बनने का बाद बदलना क्यों पड़ा? इस सवाल का जवाब तो ढूंढा ही जाना चाहिए।
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