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ईरान-इस्राइल संघर्ष और भारत पर असर: आखिर क्यों बढ़ रही है असम के पारंपरिक चाय व्यापार के लिए मुश्किलेंं

सार

इंडियन टी एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (आईटीईए) के अध्यक्ष अंशुमान कनोडिया का कहना है कि मौजूदा संघर्ष ने चाय निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। पहले नीलामी में खरीदी गई चाय की खेप तो रवाना हो चुकी है। लेकिन अब मध्य-पूर्व की स्थिति को ध्यान में रखते हुए खरीदारों ने अपने हाथ खींच लिए हैं। फिलहाल उद्योग हालात की निगरानी कर रहा है।

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ईरान-इस्राइल संघर्ष ने बढ़ाई असम की पारंपरिक चाय की मुश्किलें - फोटो : PTI
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विस्तार
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ईरान-इस्राइल संघर्ष ने पहले से ही विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे असम चाय उद्योग की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। राज्य में पैदा होने वाली 85 मिलियन किलो ऑर्थोडॉक्स यानी पारंपरिक चाय का करीब 30 फीसदी हिस्सा ईरान को निर्यात किया जाता है। लेकिन फिलहाल वहां निर्यात लायक स्थिति नहीं है। वह ऑर्थोडॉक्स चाय का सबसे बड़ा बाजार है। इसलिए संघर्ष शुरू होने के बाद इस किस्म की चाय की बिक्री बंद हो गई है। इससे चाय उत्पादक कंपनियां अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।

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असम सालाना 700 मिलियन किलोग्राम से अधिक चाय का उत्पादन करता है, जिसमें से 140 मिलियन किलोग्राम का निर्यात किया जाता है। लेकिन अब चाय उत्पादकों के साथ ही निर्यातकों को भी कारोबार पर प्रतिकूल असर का अंदेशा है।

इंडियन टी एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (आईटीईए) के अध्यक्ष अंशुमान कनोडिया का कहना है कि मौजूदा संघर्ष ने चाय निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। पहले नीलामी में खरीदी गई चाय की खेप तो रवाना हो चुकी है। लेकिन अब मध्य-पूर्व की स्थिति को ध्यान में रखते हुए खरीदारों ने अपने हाथ खींच लिए हैं। फिलहाल उद्योग हालात की निगरानी कर रहा है।
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इंडियन टी एसोसिएशन के अध्यक्ष हेमंत बांगुर कहते हैं कि ऑर्थोडॉक्स चाय के निर्यातक फिलहाल 'इंतजार करो और देखो' की नीति पर चल रहे हैं। मौजूदा हालात में यह तय नहीं है कि ईरान को चाय की अगली खेप कब भेजी जा सकेगी।

टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया (टीएआई) ने भी यही अंदेशा जताया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष संदीप सिंघानिया का कहना है कि तनाव कम नहीं होने तक परिस्थिति में सुधार संभव नहीं है। ईरान असम की परंपरागत चाय का सबसे बड़ा आयातक है। वहां मांग घटने की स्थिति में चाय उद्योग को झटका लगना स्वाभाविक है।

चाय उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक परंपरागत रूप से ईरान भारतीय चाय के शीर्ष बाजारों में से एक रहा है। आमतौर पर ईरान को सालाना करीब तीन करोड़ किलोग्राम चाय का निर्यात किया जाता है। वर्ष 2022 में ईरान को 2।22 करोड़ किलो चाय का निर्यात किया गया था। लेकिन 2023 में विभिन्न वजहों से इसमें गिरावट दर्ज की गई थी। अगले साल यानी 2024 में इसमें तेजी आई।

असम का चाय उद्योग पहले से ही जलवायु परिवर्तन के असर और आर्थिक दिक्कतों समेत कई समस्याओं से जूझ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ा है तो दूसरी ओर वर्षा अनियमित हुई है। इसका असर उत्पादन के साथ ही गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।

चाय उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि चाय बागानों की संचालन लागत तो जस की तस है। लेकिन कीमतों में गिरावट के कारण बागानों को चलाना प्रबंधन के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। इसी वजह से बीते एक साल से मजदूरों का वेतन बढ़ाना भी संभव नहीं हो सका है। मांग के मुकाबले आपूर्ति ज्यादा होने के कारण चाय की कीमतें गिर रही हैं।

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ईरान-इस्राइल संघर्ष शुरू होने के बाद से ही असम में ऑर्थोडॉक्स चाय की बिक्री ठप हो गई है - फोटो : Adobe stock
चाय उद्योग से जुड़े एक कारोबारी का कहना है कि फिलहाल हम नीलामी में पारंपरिक चाय की खरीद में सावधानी बरत रहे हैं। इसकी वजह यह है कि ईरान में हालात सामान्य होने में समय लग सकता है। इसके अलावा आयातकों से भुगतान में भी देरी हो सकती है।

एक प्रमुख निर्यातक के मुताबिक, ईरान-इस्राइल संघर्ष शुरू होने के बाद से ही असम में ऑर्थोडॉक्स चाय की बिक्री ठप हो गई है। इससे निर्यातकों में चिंता बढ़ रही है। कई लोगो ने पहले ही निर्यात के लिए भारी मात्रा में यह चाय खरीद ली थी। कुछ लोगों ने चाय की खेप भी रवाना कर दी थी। अब भुगतान का संकट भी सामने है।

चाय उद्योग से जुड़े संगठनों ने कहा है कि अगर ईरान को निर्यात बंद हो गया तो कई चाय बागानों और हजारों मजदूरों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। लेकिन मुश्किल यह है कि इस समस्या का समाधान उनके हाथों में नहीं है।

एक चाय बागान में प्रबंधक रहे सुशांत कुमार महंत कहते हैं कि ईरान की स्थिति ने असम के चाय उद्योग की चिंता जरूर बढ़ा दी है। लेकिन इस मामले में सरकार या चाय उद्योग इंतजार करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।

मौसम विज्ञानी देवनाथ बेजबरुआ कहते हैं कि 30-40 साल पहले तक बारिश का जो पैटर्न था वह अब काफी बदल गया है। अब थोड़ी-थोड़ी देर के लिए बारिश होती है और यह हर जगह समान नहीं होती। नतीजतन कई बार एक ही इलाके में अलग-अलग मात्रा में बारिश रिकॉर्ड की गई है। इसका असर चाय की गुणवत्ता और उत्पादन पर साफ नजर आ रहा है।

विभिन्न शोध रिपोर्ट से पहले ही यह साबित हो चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में मशहूर असम और दार्जिलिंग चाय का जायका बिगड़ने लगा है। चाय विशेषज्ञ कौशिक भट्टाचार्य बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव होता है। इसका सीधा असर चाय की खेती के लिए जरूरी बारिश की मात्रा पर पड़ता है। तापमान में वृद्धि के कारण मिट्टी के वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज होती है।

स्थिर तापमान और नियमित बारिश का पैटर्न गड़बड़ाने की स्थिति में चाय की क्वालिटी और उसके उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
कुछ साल पहले असम के चाय बागानों में हुए एक सर्वेक्षण में 77 फीसदी बागान प्रबंधकों और 97 फीसदी लघु चाय उत्पादकों ने माना था कि प्रतिकूल मौसम चाय की खेती के लिए एक गंभीर खतरे के तौर पर सामने आया था। लंबे समय तक बढ़ते तापमान या फिर बेमौसम आने वाली बाढ़ ने असम की चाय का जायका बिगाड़ दिया है।

असम के जोरहाट स्थित टी रिसर्च एसोसिएशन ने चाय की खेती पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल असर से निपटने के लिए संबंधित इलाकों में ठोस कदम उठाने की सिफारिश की है। इसके तहत जल संसाधनों के प्रबंधन के साथ ही कीटनाशकों के इस्तेमाल पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। चाय बागानों को पानी के प्रबंधन के जरिए ऐसी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए जिससे चाय के पौधों को पूरे साल जरूरत के हिसाब से पानी मिलता रहे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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