मरावती की निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने भी हनुमान चालीसा के सार्वजनिक पाठ का आयोजन किया।
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चयन और विकल्प की सियासत
कांग्रेस शासित राजस्थान के करौली में वर्ष प्रतिपदा की शोभा यात्रा पर कांग्रेसी पार्षद मतलूब हसन के नेतृत्व हुए पथराव पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। जब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पत्थरबाजों के समर्थन में बयानबाजी करते पाए गए, तब भी कोई नहीं चौंका। पश्चिम बंगाल में रामनवमी की शोभायात्रा हुए हमले पर वहां के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मूक सहमति पर हर कोई सहज रहा । झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार पत्थरबाजों को संरक्षण दे तो हर किसी को यह घटनाक्रम सामान्य नजर आता है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बांग्लादेशियों और रोहिंग्या का विरोध करेंगे तो दांतों तले उंगलियां दबा सकते हैं। उनकी नीति और नीयत मुस्लिम वोट बैंक के लिए तुष्टीकरण समर्थक है।
इधर इसीलिए जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हनुमान जन्मोत्सव की सुबह गुजरात में 108 फुट की प्रतिमा का लोकार्पण कर रहे थे तब उसी सुबह कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बांग अनपेक्षित नहीं थी, ना ही किसी को सोनिया गांधी के सुर में सुर मिला कर हुए विपक्षी स्यापे पर ही कोई चकित हुआ। किंतु लोग तब निश्चित तौर पर आश्चर्यचकित रह गए बाला साहब की आत्मा को पीड़ा पहुंचाने का कृत्य करते हुए हिंदू मतावलंबियों की आराध्य हनुमान चालीसा का वाचन राजद्रोह बन गया।
महाराष्ट्र का बवाल और देशभर में सवाल?
बीते पखवाड़े ही महाराष्ट्र में मस्जिदों पर लाउडस्पीकर से होने वाली अजान के विरुद्ध आवाज बुलंद हुई। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने लाउडस्पीकर की अजान से ध्वनि प्रदूषण का विरोध किया और साथ ही चेतावनी दी कि यदि मस्जिदों से लाउडस्पीकर नहीं उतरे तो मनसे उनके सामने लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ करेगी।
राज ठाकरे के समर्थकों ने दूसरे दिन कुछ मनसे के दफ्तरों पर लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। घाटकोपर पश्चिम में मनसे कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया, जो पुलिस अक्टूबर 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश आरसी लाहोटी के ध्वनि प्रदूषण पर दिए गए आदेश के 16 वर्षों बाद भी किसी कान फाडू अजान पर कोई मामला दर्ज नहीं कर सकी, उसे पहले ही दिन हनुमान चालीसा के पाठ पर कानून का ज्ञान प्रकट हो गया।
मनसे के अलावा भी कुछ लोग सक्रिय हुए। भाजपा नेता मोहित कंबोज ने मंदिरों के लिए लाउडस्पीकर मुफ्त में बांटने का एलान किया। हालांकि कांबोज ने शर्त रखी कि मंदिर प्रबंधक को लाउडस्पीकर लगाते समय ध्वनि प्रदूषण के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मानकों का पालन करना होगा फिर भी सत्ताधारी शिवसेना ने मोहित कंबोज की ओर आंखें तरेरी। अमरावती की निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने भी हनुमान चालीसा के सार्वजनिक पाठ का आयोजन किया।
ज्ञात हो कि नवनीत राणा का शिवसेना से पहले से ही 36 का आंकड़ा रहा है। शिवसेना के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद सावंत पर वह संसद के परिसर में धमकाने का आरोप लगा चुकी हैं। शिवसेना ने नवनीत राणा के इस कदम को अपने लिए चुनौती माना। दोनों तरफ से बयानबाजियों का दौर चला। फिर नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पैतृक निवास 'मातोश्री ' के बाहर आकर हनुमान चालीसा पर चालीसा पढ़ने की चुनौती दे डाली । फिर क्या था शिवसेना के नियंता बौखला गए ।
राज ठाकरे ने बीते पखवाड़े भर में जिस तरह से हिंदुत्ववादी तेवर दिखाए उससे पहले ही शिवसेना अपने लिए खतरा महसूस कर रही है। मुंबई में आसन्न खतरे से निपटने का जब वे मार्ग खोज ही रहे थे तभी विदर्भ से भी उन्हें चुनौती मिलने लगी। पहले शिवसैनिक 'मातोश्री' के बाहर जुटाए गए। सनद रहे कि बीते दो दशकों में जब भी शिव सैनिकों को जुटने का आदेश दिया गया है तो कभी उद्धव ठाकरे के आदेश के बिना शिव सैनिक जमा नहीं हुए ।
राज्य सरकार और शिवसेना
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शिवसेना पक्ष प्रमुख होने के नाते आदेश दिया तो कुछ सैकड़ो शिवसैनिक पहले 'मातोश्री' के बाहर जमा हुए और फिर एक टुकड़ी खार पश्चिम के नवनीत राणा के निवास के लिए रवाना हो गई। नवनीत राणा के घर को पुलिस ने पहले से ही घेर रखा था। कुछ देर बाद आदित्य ठाकरे के मौसेरे भाई वरुण सरदेसाई भी वहां शिव सैनिकों का नेतृत्व करने पहुंचे।
दरअसल, इशारा साफ था कि ठाकरे परिवार हनुमान चालीसा की चुनौती पर बेहद बौखलाया हुआ है। दोपहर 2:30 बजे नवनीत राणा ने एलान कर दिया कि वह 'मातोश्री ' के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने नहीं जाएंगी, क्योंकि वह जिस उद्देश्य से चुनौती दे रही थीं वह उद्देश्य सिद्ध हो चुका है। राणा दंपती ने प्रधानमंत्री जी की यात्रा को देखते हुए भी शांति व्यवस्था के पक्ष में अपना निर्णय स्थगित किया।
यह सारा विवाद राज ठाकरे के लाउडस्पीकर से अजान देने के विरोध से प्रारंभ हुआ, फिर इसमें मोहित कंबोज और नवनीत राणा उतरीं ।
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इस बीच शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता संजय राऊत ,नवनीत राणा को 20 फुट जमीन के नीचे गाड़ने की धमकी दे चुके थे। नवनीत राणा के घर के बाहर लगातार गालियों भरे नारे लगाए जा रहे थे । घर पर बोतलें फेंकी गई। दरवाजा तोड़कर घुसने की कोशिश हुई। इसी तरह के अभद्र नारे शिवसैनिक 'मातोश्री' के बाहर भी लगा रहे थे। इसकी पूर्व संध्या पर 'मातोश्री' के निकट एक झुंड ने भाजपा नेता मोहित कंबोज की मॉब लिंचिंग करने के इरादे से प्राणघातक हमला किया था।
शिव सैनिकों की नजर में मंदिरों के लाउडस्पीकर बांटना कांबोज का गंभीर अपराध था। इसके अलावा शिवसेना से कांबोज की दुश्मनी का कोई ज्ञात कारण नहीं है। उसी शाम एंटॉप हिल में भाजपा विधायक तमिल सेल्वन की सभा पर हमला हुआ। तमिल सेल्वन मुंबई महानगरपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की 'पोल खोल' सभा कर रहे थे। कुछ देर बाद ही गिरगांव में भाजपा विधायक अमित साटम की 'पोल खोल' सभा पर भी शिव सैनिकों ने हमला किया।
शिवसैनिक पूरी मुंबई में जब नंगा नाच कर रहे थे तब मुंबई पुलिस उनको कवर दे रही थी। किसी निर्दोष को बचाने की बजाय हिंसक भीड़ को पुलिस का वरद हस्त हासिल था। हमले के मामले में 24 घंटे बाद भी तमिल सेल्वन अमित साटम या मोहित कंबोज का एफ आई आर नहीं दर्ज हुआ।
जब विपक्ष के नेता नेता देवेंद्र फडणवीस आक्रामक हुए तब जाकर औपचारिक एफआईआर दर्ज हुई। बांद्रा पूर्व और पश्चिम में बिना अनुमति के शिवसैनिक सैकड़ों की संख्या में जमा हुए। उन्होंने हिंसक नारे लगाए फिर भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। उल्टे वरुण सरदेसाई की एक शिकायत पर सांसद नवनीत राणा और विधायक रवि राणापुर पुलिस गिरफ्तार कर ले गई। इतना ही नहीं उन पर राजद्रोह का मामला दायर कर दिया। नवनीत राणा और रवि राणा ने हनुमान चालीसा पढ़ने की चुनौती देने के अलावा और कुछ नहीं किया। फिर भी उनका अपराध राजद्रोह का माना जाता है ।
यह सारा विवाद राज ठाकरे के लाउडस्पीकर से अजान देने के विरोध से प्रारंभ हुआ, फिर इसमें मोहित कंबोज और नवनीत राणा उतरीं । क्या लाउडस्पीकर से अजान का मुद्दा पहली बार उठाया गया है? शरद पवार या सोनिया गांधी की पार्टी अगर अजान विरोधी बयान पर बमके तो बात समझ में आती है। पर हिंदू हृदय सम्राट की पार्टी, पुत्र और पौत्र यदि इस मुद्दे पर सेकुलरिज्म के सन्निपात के शिकार हों तो क्या कहा जाए?
बाला साहेब ठाकरे और अतीत
दरअसल, सबसे पहले शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे ने ही 8 अक्टूबर 1994 में शिवाजी पार्क से लाउडस्पीकर से अजान का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कोलकाता हाईकोर्ट एक फैसले का हवाला देकर तत्कालीन शरद पवार सरकार को मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर उतारने की चेतावनी दी थी। उस भाषण में उन्होंने सड़क पर नमाज के विरोध में सड़क पर महाआरती की भी बात रखी थी।
फरवरी 1993 में दादर में ऐसी महाआरती शिवसेना ने आयोजित की थी। उस महाआरती में मनोहर जोशी, राज ठाकरे के साथ स्वयं उद्धव ठाकरे मौजूद थे, तब लाउडस्पीकर से अजान और सड़क पर नमाज के मुद्दे पर बाला साहब ठाकरे के साथ-साथ राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे भी शरद पवार का खुलकर विरोध करते थे। 'सामना' में तब शरद पवार को सूर्याजी पिसाल कहा गया था। ज्ञात हो कि सूर्याजी पिसाल छत्रपति शिवाजी से गद्दारी करने वाला व्यक्ति था।
28 साल पहले सड़क पर नमाज, लाउडस्पीकर से अजान और मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण यदि शरद पवार को सूर्याजी पिसाल कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी, तो आज जिनकी आस्था हनुमान चालीसा सुनने से आहत हो रही है, उनकी भी उपाधि तय होनी चाहिए। हिंदू मान्यताएं और जीवन पद्धति अनगिनत दमन और उत्पीड़नोँ से न खत्म नहीं हुई ना होंगी। जब-जब इन मान्यताओं के संरक्षक के रूप में जो भी सामने आया उसे जनता ने हृदय से अगाध श्रद्धा का पात्र बनाया और जो जो इन मान्यताओं के अवरोध बने और विध्वंसकों की ढाल बने जनता ने उन्हें भी उसी तत्परता से विसर्जित भी किया।
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