ये बात सितंबर 2000 की है। चैनल नाइन (मेट्रो गोल्ड) शुरू हो रहा था। होटल रीजेंट (जिसे अब ताज लैंड्स एंड के नाम से जाना जाता है) में उन्होंने लॉन्च पार्टी रखी थी। दो धारावाहिकों के लेखकों के तौर पर मुझे भी न्यौता आया (जी हां, ये उन दिनों की बात है जब लेखकों को भी बुलौवा आता था)।
वहां उन्होंने एक बड़ा सा स्क्रीन बनाया था जिस पर आने वाले धारावाहिकों के प्रोमो एक के बाद एक लगातार चल रहे थे। मैं एक कोने में बैठ गया और अपने दोनों शोज के प्रोमो देखने लगा, जब भी प्रोमो में मेरा नाम आता, मेरे चेहरे पर एक दमक अपने आप आ जाती (जी हां, ये उन दिनों की बात है जब लेखकों का नाम भी प्रोमो में रखा जाता था)।
और जब वे आईं तो..
पूरी तरह से एकाग्र और अपने ख्यालों में डूबा, मैं भूल ही गया कि मैं कहां हूं और फिर एक महिला आईं और मेरे बगल में बैठ गईं। बड़े ही दुलार और प्यार से उन्होंने पूछा, ‘क्या देख रहे हैं?’ मैं पलटा और ये देख कर विस्मित सा हो गया था कि जो मेरी बगल में आकर बैठी थीं, वह सुरेखा सीकरी थीं। एक बेहद चुस्त लाल जैकेट और पैंट पहने, वह मुझे देख मुस्कुरा रही थीं। मुझे तो अपनी आंखों पर यक़ीन ही नहीं हुआ।
उन्होंने सवाल दोहराया, ‘क्या हुआ? वहां क्या देख रहे हैं ऐसे? क्या ख़ास है?’
मैंने बताया उन्हें, ‘अपने शोज के प्रोमो देख रहूं। अपना नाम देख रहा हूं।’ उन्होंने आंखें मटकाई और पूछा, ‘अच्छा, तो आप राइटर हैं? बहुत ख़ूब। क्या नाम है आपका?’ ‘ज़मा...ज़मा हबीब’, मेरे मुंह से निकला। उनकी आंखों में चमक सी दिखी मुझे। उन्होंने अपनी बाहों से मेरी गर्दन के चारों तरफ घेरा बनाया और दबी सी ज़ुबान में बोलीं, ‘ज़मा हबीब...मतलब ज़माने के दोस्त...ज़माने के प्यारे...माशाअल्लाह! कहां के हैं?’
मैं थोड़ा सा असहज महसूस कर रहा था। मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि वे मेरे गले का घेरा अपनी बाहों से बना लेंगी। मैंने सकुचाते हुए जवाब दिया, ‘बेसिकली तो बिहार से हूं, पढ़ाई कढ़ाई कोलकाता में हुई, ग्रैजुएशन मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से किया है।’
अब तो वह मेरे ऊपर पूरी ही झुक गईं, ‘एएमयू से पढ़े हैं? वहां मेरी बहन हैं...मैं भी एएमयू से पढ़ी हूं...आपको पता है मेरा नाम ज़ुलेखा है।’ अब मैं वो क्या कहते हैं उसे, पूरी तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था और साथ ही बहुत ही बेचैनी भी महसूस कर रहा था। मुझे लगा कि उन्होंने चढ़ा रखी है। और, इसके पहले कि मैं होश संभाल पाता, वह बोलीं, ‘चलिए डांस करते हैं।’ मैं तो हिल गया। उनकी तरफ हैरानी भरी नज़रों से देखने लगा। सुरेखा जी मुस्कुराईं और फिर बोलीं, ‘चलिए भाई...राइटर्स को भी डांस करना चाहिए।’
और फिर वे मुझे अपने साथ ले गईं
एक तरह से वह मुझे घसीटते हुए डांस फ्लोर पर ले गईं और मुझे अपने साथ नचाया भी। मैं ठीक से सोच नहीं पा रहा था। खुद पर शर्म सी आ रही थी तो जैसे ही मौका मिला मैं डांस फ्लोर से सरक गया। दूर जाकर एक कोने में बैठा ही था और कोशिश कर रहा था कि अभी अभी जो मेरे साथ हुआ है, उसको समझ सकूं। सांसें अपनी नॉर्मल स्पीड पर आई ही थीं, मैंने देखा कि वह खड़ी हैं ठीक मेरे सामने। यूं लगा जैसे हलक में कुछ अटक गया है।
वह मुस्कुराईं और बोलीं, ‘क्या तुम्हें कुछ अटपटा लग रहा है। ओके, चलो बातें करते हैं। अलीगढ़ बतियाते हैं।’ मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था और हम बातें करते रहे। और, तब मुझे उनमें अपनेपन का पहला एहसास हुआ। जैसे-जैसे वह बातें करती गईं, उनके कला के बारे में ज्ञान को जानकर मेरी आंखें फैलती चली गईं। उन्होंने अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताया। घर, पढ़ाई लिखाई, वगैरह वगैरह..!