आज के समय में बड़े घोटालों, दंगे या संवेदनशील मामलों की जांच में जब सामान्य पुलिस पर भरोसा नहीं रह जाता, तो एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया जाता है। यह एक विशेष टीम होती है जो गंभीर अपराधों की निष्पक्ष और तेज जांच के लिए बनाई जाती है।
जब से अयोध्या में श्री राम मंदिर के चंदे में हुए घोटाले का मामला सामने आया है तब से ‘एसआईटी’ शब्द काफ़ी चर्चा में आने लगा है। यदि आम नागरिक इसे समझना चाहे तो इसे सरल शब्दों में ऐसे समझें: जैसे कोई बड़ा खेल बिगड़ जाए तो खिलाड़ियों की जगह विशेष कोच और रेफरी बुलाए जाते हैं, वैसे ही SIT से यही उम्मीद की जाती है कि सामान्य जांच एजेंसियों के अलावा निष्पक्षता और पारदर्शी तरीके से काम करती है।
‘एसआईटी’ (SIT) का पूरा नाम ‘स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम’ यानी कि विशेष जांच टीम होता है। भारत में इसे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालय, केंद्र सरकार या राज्य सरकार गठित कर सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य उन मामलों की जांच करना है जहां सामान्य पुलिस बल अपर्याप्त साबित होता है। जैसे कि राजनीतिक प्रभाव, बड़े घोटाले, सांप्रदायिक दंगे या जटिल वित्तीय अपराध वाले मामलों की जांच।
कानून के अनुसार एसआईटी गठित करने के लिए एक प्राथमिक रिपोर्ट या एफआईआर का होना सबसे ज़रूरी है। CrPC (अब BNSS) की धारा 154 के अनुसार, जब भी किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की सूचना मिलती है तो पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी ही पड़ती है।
बिना एफआईआर के एसआईटी नहीं बनाई जा सकती। अगर पुलिस एफआईआर नहीं लिखती तो पीड़ित उच्च अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है। कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि एफआईआर के बिना जांच शुरू नहीं हो सकती।
संविधान और कानून के तहत एसआईटी को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाती है कि यह आपराधिक मामले से जुड़े गवाहों से पूछताछ कर सकती है। सबूत इकट्ठा कर सकती है, छापे मार सकती है। जरूरत पड़ने पर फॉरेंसिक जांच, डिजिटल साक्ष्य और विशेषज्ञों की मदद भी ले सकती है। जांच पूरी होने पर रिपोर्ट अदालत को सौंपती है, जिसके आधार पर मुकदमा आगे चलता है। गौरतलब है कि एसआईटी की रिपोर्ट कोर्ट में एक अहम सबूत मानी जाती है, लेकिन अंतिम निर्णय कोर्ट का ही होता है।
अब बात करें कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी और सरकार द्वारा गठित एसआईटी के अंतर की तो सरकार द्वारा गठित एसआईटी को कोई भी राज्य सरकार या केंद्र की सरकार बना सकती है। परंतु इसमें राजनीतिक प्रभाव का खतरा ज्यादा होता है। टीम के सदस्य सरकारी अधिकारी होते हैं, इसलिए निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
वहीं कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी को सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट आदेश देता है। यह एसआईटी ज्यादा निष्पक्ष और स्वतंत्र मानी जाती है क्योंकि यह कोर्ट की निगरानी रहती है। कोर्ट एसआईटी के काम की समय-समय पर समीक्षा कर सकता है और आगे के निर्देश दे सकता है। उल्लेखनीय है कि कोर्ट वाली एसआईटी पर लोगों का भरोसा ज्यादा होता है क्योंकि यह सरकार से ऊपर न्यायपालिका की छत्रछाया में काम करती है।
भारत के इतिहास में कई एसआईटी बनी जिसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में गुजरात में हुए दंगों के कई मामलों में एसआईटी गठित की। सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन के नेतृत्व वाली इस टीम ने कुछ मामलों में दोषियों को सजा अवश्य दिलाई। लेकिन कुछ मामलों में विवाद भी रहा।
2G स्पेक्ट्रम घोटाला में भी सीबीआई जांच के अलावा विशेष अदालत बनी। जिसकी एसआईटी जैसी टीमों की तरह भूमिका रही, लेकिन अंत में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। यानी एसआईटी हो या सीबीआई, इनको मजबूत सबूत इकट्ठा करने पड़ते हैं, वरना मामला कमजोर पड़ जाता है।
एसआईटी को सफलता तब मिली जब टीम स्वतंत्र रही और सबूत मजबूत थे। असफलता तब हुई जब राजनीतिक दबाव, सबूतों की कमी या देरी ने जांच प्रभावित की।
हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर (श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट) के चढ़ावे के घोटाले के चलते एसआईटी पर फिर से चर्चा हो रही है। कुछ याचिकाओं में कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी की मांग की गई, जिसमें फॉरेंसिक और वित्तीय जांच की बात थी। परंतु राज्य सरकार ने आननफानन में एक एसआईटी गठित की और उसके बाद एफआईआर दर्ज हुई।
इस मामले में जल्दबाजी में बिना एफआईआर दर्ज किए एसआईटी के गठन पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में इसे विशेष ‘जांच’ टीम के बजाय विशेष ‘पूछताछ’ टीम कहा जा रहा है। इसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि एसआईटी बनने के बाद एफआईआर दर्ज हुई और गिरफ्तारियां भी हुई।
यह मामला एक मजबूत और कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी की जरूरत को रेखांकित करता है क्योंकि एक बड़े धार्मिक ट्रस्ट के चंदे में अनियमितताओं के आरोप हैं।
यदि यहां कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी द्वारा स्वतंत्र जांच हो तो से भक्तों का विश्वास बना रहेगा। हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री यह विश्वास दिलाया है कि इस मामले में कोई भी अपराधी कितना भी बड़ा क्यों न हो दूध का दूध और पानी का पानी हो कर ही रहेगा।
गौरतलब है कि आम नागरिक को एसआईटी से उम्मीद होती है कि बड़े लोग या प्रभावशाली अपराधी बच न जाएं। हालांकि, एसआईटी का दुरुपयोग न हो, इसके लिए कोर्ट की निगरानी जरूरी है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एसआईटी जैसी संस्थाएं न्याय व्यवस्था को मजबूत करती हैं।
राम मंदिर चंदा चोरी विवाद हो या कोई अन्य मामला, एसआईटी का सही इस्तेमाल जनता के हित में होना चाहिए। हमें चाहिए कि ऐसी टीमों पर भरोसा रखें लेकिन सतर्क भी रहें। न्याय तभी सार्थक है जब वह तेज, निष्पक्ष और आम आदमी तक पहुंचे।
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