समय रैना के वीडियोज पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं-
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इनके तकरीबन हर एपिसोड पर कई लाख व्यू भी आते हैं। जब अलाहाबादिया ने एक बेसिर-पैर का अश्लील सवाल पूछा था तो कायदे से रैना को एडिटिंग में उसे हटा देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। निश्चित ही उन्हें यह ‘बिकाऊ माल’ लगा और उन्होंने इसे जाने दिया। रैना जैसे यूट्यूबर सेल्फ रिस्पांसबिल्टी को नहीं मानते और उन्हें लगता है कि कोई भी ‘बकवास’ बिक सकती है तो उसे मार्केट में बेच देना चाहिए। उन्हें यह भी पता है कि विवाद होने पर मुफ्त में उनकी ब्रांडिंग होगी। बाकी कानूनी पचड़ तो निपट ही जाएंगे। वैसे भी ऐसे मामलों को भारतीय न्याय व्यवस्था बहुत गंभीरता से नहीं लेती है। कई बार तो महज माफी मांगने से भी काम चल जाता है।
बात नैतिकता की-
सोशल मीडिया के आने के बाद से भारतीय समाज बदला है और उसमें तेजी से खुलापन आया है। रील्स के रूप में सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री भरी पड़ी है। चूंकि रील्स बनाने वाले इनमें से ज्यादातर लोगों की न तो कोई पहचान होती है और न उनसे नैतिकता की उम्मीद ही की जाती है। यह मामला इसलिए तूल पकड़ गया, क्योंकि अलाहाबादिया जाने-पहचाने यूट्यूबर हैं। रणवीर अलाहाबादिया को 2024 में पीएम नरेंद्र मोदी के हाथों नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड्स में ‘डिसरप्टर ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार मिला था। उस दौरान उन्होंने कई मंत्रियों और राजनेताओं के पॉडकास्ट किए थे। इससे उन्हें काफी शोहरत मिली थी।
पहले भी रहा है विवादों से नाता
समय रैना का शो ‘इंडियाज गॉट लैटेंट’ पहले भी विवादों में रह चुका है। एक शो में कंटस्टेंट ने कहा था कि अरुणाचल के लोग डॉग मीट खाते हैं। इस मामले की भी शिकायत पुलिस से की गई थी। यहां अहम बात यह है कि इस पूरे मामले में अलाहाबादिया को दोषी माना जा रहा है, लेकिन शो को हॉस्ट समय रैना की भी जिम्मेदारी बनती है कि इस तरह का कंटेंट को वह रोक सकते थे।
कुछ सवाल अब भी हैं-
देश के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) सभी नागरिकों को अपने विचार व्यक्त करने का समान अधिकार देता है। यह अधिकार बोलने के साथ ही लिखने या छापने और दृश्य प्रस्तुतीकरण के लिए दिया गया है। अहम यह भी है कि इससे भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, अदालत की अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए उकसाना, या संसद की संप्रभुता और अखंडता के हितों का नुकसान न होता हो। यह बात तो हुई अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी की। यह नियम सभी के लिए समान हैं, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता भी है? इसी बात पर कुछ लोग सोशल मीडिया पर सवाल भी उठा रहे हैं।
उनका कहना है कि जब कोई कॉमेडियन कुछ कह देता है तो उसे कानून के दायरे में लाया जाता है, लेकिन देश के तमाम राजनेता कुछ भी बोलते रहते हैं जो न सिर्फ समाज के लिए बल्कि देश के लिए भी घातक हो सकता है। ऐसे लोगों पर कभी भी कार्रवाई नहीं होती है और न इस तरह से हाय-तौबा मचती है। कुछ ने तो संसद में अश्लील भाषा बोले जाने का भी जिक्र किया है। उन्होंने इलाहाबादिया के मामले को बेजा सेंसरशिप कहां है।
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