अर्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है, जिसका आधा अंग पुरुष का और आधा अंग नारी का होता है। स्पष्ट ही, यह कल्पना शिव और शक्ति के बीच पूर्ण समन्वय दिखाने को निकाली गई होगी, किंतु इसकी सारी व्याप्तियां वहीं तक नहीं रुकतीं। अर्धनारीश्वर की कल्पना में कुछ इस बात का भी संकेत है कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात नरों में नारियों के गुण आएं, तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होती, बल्कि उनकी पूर्णता में वृद्धि होती ही होती है। किंतु पुरुष और स्त्री में अर्धनारीश्वर का यह रूप आज कहीं भी देखने में नहीं आता।
संसार में सर्वत्र पुरुष पुरुष है और स्त्री स्त्री। नारी समझती है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्टा लगेगा। इसी प्रकार पुरुष भी स्त्रियोचित गुणों को अपनाकर समाज में स्त्रैण कहलाने से घबराता है। स्त्री और पुरुष के गुणों के बीच एक प्रकार का विभाजन हो गया है तथा विभाजन की रेखा को लांघने में नर और नारी, दोनों को भय लगता है। किंतु लगता है कि गुणों का बंटवारा करते समय पुरुष ने नारी से उसकी राय नहीं पूछी, अपने मन से उसने जहां चाहा, नारी को बिठा दिया। स्वयं तो वह वृक्ष बन बैठा और नारी को लता बना दिया। स्वयं तो वह वृंत बन गया और नारी को उसने कली मान लिया।
यदि आदिमानव और आदिमानवी आज मौजूद होते, तो ऐसी कल्पना से सबसे अधिक आश्चर्य उन्हें ही होता। हम तो साथ-साथ जन्मे थे तथा धूप और चांदनी में, वर्षा और आतप में साथ ही घूमते भी थे; बल्कि आहार-संचय को भी हम साथ ही निकलते थे और अगर कोई जानवर हम पर टूट पड़ता, तो हम एक साथ उसका सामना भी करते थे। नारी की पराधीनता तब आरंभ हुई, जब मानव जाति ने कृषि का आविष्कार किया, जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहां से जिंदगी दो टुकड़ों में बंट गई। नर और मादा पशुओं में भी थे और पक्षियों में भी। किंतु पशुओं और पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक परवशता नहीं लादी। लेकिन मनुष्य की मादा पर यह पराधीनता आप से आप लद गई। और इस पराधीनता ने नर-नारी से वह सहज दृष्टि भी छीन ली, जिससे नर पक्षी अपनी मादा को या मादा अपने नर को देखती है।
नारी और नर एक ही द्रव्य की ढली दो प्रतिमाएं हैं। आरंभ में दोनों बहुत कुछ समान थे। आज भी प्रत्येक नारी में कहीं न कहीं कोई एक प्रच्छन्न नर और प्रत्येक नर में कहीं न कहीं एक क्षीण नारी छिपी हुई है। किंतु सदियों से नारी अपने भीतर के नर को और नर अपने भीतर की नारी को बेतरह दबाता आ रहा है। परिणाम यह है कि आज सारा जमाना ही मर्दाना मर्द और औरताना औरत का हो उठा है। नर-नारी के प्रचलित संबंधों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव संसार के इतिहास पर पड़ रहा है और जब तक यह संबंध नहीं सुधरते, शांति के मार्ग की सारी बाधाएं दूर नहीं होंगी। नारी केवल नर को रिझाने अथवा उसे प्रेरणा देने के लिए नहीं बनी है, बल्कि जीवन यज्ञ में उसका भी अपना हिस्सा है और वह हिस्सा घर तक ही सीमित नहीं, बाहर भी है। जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है। नर और नारी, दोनों के जीवनोद्देश्य एक हैं।
सूत्र- पूर्णता का आभास करें
गांधी जी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में नारीत्व की भी साधना की थी। अर्धनारीश्वर केवल इसी बात का प्रतीक नहीं है कि नारी और नर जब तक अलग हैं, तब तक दोनों अधूरे हैं, बल्कि इस बात का भी कि पुरुष में नारीत्व की ज्योति जगे और प्रत्येक नारी में भी पौरुष का स्पष्ट आभास हो। प्रत्येक नर को एक हद तक नारी व प्रत्येक नारी को एक हद तक नर बनाना भी जरूरी है।