ढोल गंवार सूद्र पशु नारी चौपाई का विरोध नया नहीं
संसार के श्रेष्ठ महाकाव्यों में से एक ’’रामचरित मानस’’ की विवादित चौपाई-
’प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
इसका विवाद नया नहीं है। एक बार मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री के तौर पर संसद में ये चौपाई किसी संदर्भ में सुनाई थी और उस पर भारी विवाद भी हुआ था। लेकिन मोरारजी ने माफी नहीं मांगी थी। कुंठित वामपंथी संगठन भी इस चौपाई पर अपना विरोध प्रकट करते रहे हैं। कुछ समय से रामचरित मानस पर दोबारा विवाद सिर उठा रहा है।
पहले बिहार के मंत्री चंद्रशेखर ने इस पर विवादित बयान दिया था। उसके बाद कर्नाटक में एक रिटायर्ड प्रोफेसर ने रामचरितमानस पर विवादित बयान दिया, और अब समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य विवादित बयान के लिए चर्चा में हैं।
ताड़न का मतलब शिक्षा भी माना गया
हालांकि इस चौपाई की व्याख्या इस तरह भी की जाती है:- प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी (दंड दिया), किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं। इस चौपाई के पीछे तुलसीदास जी का अभ्रिपाय जो भी हो, मगर आज के संदर्भ में यह अप्रासंगिक भी है और अनावश्यक विवादकारी भी है।
लोकतंत्र में समाज के किसी भी वर्ग को इस तरह लक्षित हेय दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यहां तक कि पशुओं को भी नहीं। इस चौपाई के समर्थक रामचरित मानस की उस चौपाई का उदाहरण देते हैं जिसमें कहा गया है कि ’’धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपद काल परखिए चारी।।’’ मतलब यह कि तुलसीदास के मन में स्त्रियों के लिए बहुत सम्मान था, प्राणिजगत के लिए प्रेम था।
उस समय के समाज का दर्पण है यह महाकाव्य
कोई भी साहित्य तत्कालीन समाज का दर्पण होता है। समाज के रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार तत्कालीन साहित्य के दर्पण में प्रतिबिम्बित होते हैं। रामायण कालीन या तुलसीदास जी ने जब सम्बत् 1631 में इस महाकाव्य की रचना शुरू की होगी तो उस समय के समाज का प्रतिबिम्ब इसमें आना स्वाभाविक ही है। लेकिन परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय चक्र के साथ ही समाज और उसी रीति-नीति और आचार व्यवहार बदलते रहते हैं।
उस काल में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था इसलिए राजा की भक्ति ही ईश्वर की भक्ति मानी जाती थी। राजाज्ञा ईश्वर की आज्ञा मानी जाती थी, लेकिन सदियों के अंतराल में आज समय के साथ ही समाज बहुत बदल गया। लोकतंत्र के युग में राजा भी प्रजा हो गए और प्रजा, राजा हो गए। आज रामराज्य का संकल्प तो लिया जाता है मगर लोकतंत्र के इस युग में वैसा रामराज चल भी नहीं सकता। तब परिवारवाद और वंशवाद चलता था, सामन्तवाद भी था।
अब तो वंशवाद और परिवारवाद की आलोचना करने वालों में रामभक्त पार्टी भाजपा सबसे आगे है। आज पिता के कहने पर कोई 14 वर्ष बनवास नहीं कर सकता। इसी तरह ढोल-शूद्र और पशु नारी...वाली चौपाई की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है, लेकिन देश तो संविधान से चलता है और संविधान तो समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व मानवीय गरिमा की गारंटी देता है, इसलिए स्वामी प्रसाद जी का एक निर्जीव पुस्तक पर लालपीला होना राजनीति का एक हिस्सा ही हो सकता है।
श्रेष्ठतम् साहित्य है रामचरितमानस
‘‘राम चरित मानस’’ केवल एक भक्ति कथा नहीं बल्कि अवधी की श्रेष्ठतम भक्ति काव्य और संसार श्रेष्ठ महाकाव्यों में से एक है। इसके मुख्य छन्द चौपाई और दोहा हैं, बीच-बीच में कुछ अन्य प्रकार के भी छन्दों का प्रयोग हुआ है। भारतीय साहित्य-शास्त्र में महाकाव्य के जितने लक्षण दिए गए हैं, वे उसमें पूर्ण रूप से पाए जाते हैं।
रामचरितमानस को तुलसीदास ने सात काण्डों में विभक्त किया है। इन सात काण्डों के नाम हैं - बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड) और उत्तरकाण्ड। छन्दों की संख्या के अनुसार बालकाण्ड और किष्किन्धाकाण्ड क्रमशः सबसे बड़े और छोटे काण्ड हैं। इस महाकाव्य में 27 श्लोक, 4608 चौपाई, 1074 दोहे, 207 सोरठा और 86 छन्द हैं।
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