जब तक सृष्टि तब तक राम की दृष्टि
- फोटो : istock
भगवान श्री राम अपने गुणों की वजह से ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। उन्होंने दया, सत्य, सदाचार, मर्यादा, करुणा और धर्म का पालन किया। भगवान राम ने समाज के लोगों के सामने सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया था। इसी कारण से उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।भगवान श्रीराम की महानता अथाह है। उनके अद्वितीय शौर्य एवं पराक्रम से उन्होने यज्ञरक्षा कर ऋषियों को भयहीन किया , उनका अनुपम बल ही खर, दूषण आदि का काल बना, वे ही शील के मूर्त स्वरूप है। धनुष भंग करने का सामर्थ्य होनेपर भी वा सभा मे शांति से बैठे थे और गुरुआज्ञा मिलने पर ही गए, पितृभक्ति ऐसी की पिता का वचन कभी मिथ्या न होने दिए भले स्वयं कष्ट सहे, त्याग ऐसा कि जब कुछ ही समय मे राजतिलक होना था तब भी वल्कल पहनकर वनगमन करने मे संकोच नहीं किया, ज्ञान वेद शास्त्रादि अनेकों ग्रंथों का,मातृभूमि के प्रति प्रेम इतना कि अपनी जन्मभूमि अयोध्या नगरी के बारे मे कभी बुरे शब्द सुनना तक नहीं सहा, धर्म परायण ऐसे जो साधुओं का दुःख सुनकर बोल उठे
“निशिचर हीन करहु महि, भुज उठाए पन कीन्ह।”
अनुजों से स्नेह ऐसा कि युगो तक उनके उदाहरण दिए जाते हैं, सीता माता से ऐसा प्रेम किया आज भी कई लोग संबोधन के रूप मे सीताराम ही बोलते हैं, सत्यवादी ऐसे कि ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’ आज प्रेरणा वाक्य है,शबरी को स्वयं नवधा भक्ति का उपदेश देकर सामाजिक सौहार्द के प्रतीक बने, सुग्रीव की कठिन समय मे सहायता कर सच्चे मित्र होने का अर्थ समझाया, घोषणा करके समाज मे नारियों के सम्मान की शिक्षा दी-
“अनुज बधू भगिनि सुत नारी,
सुन सठ कन्या सम ए चारि।
इन्हे कुदृष्टि बिलोकि जेई,
ताहि बधे कछु पाप न होई॥”
राम अपने भक्तों के सामर्थ्य से भली भांति परिचित हैं तभी वह हनुमान को ही मुद्रिका देते हैं, भगवान राम की उदारता ऐसी है कि जो सम्पत्ति रावण को दस शीशों के दान के बाद मिली वो सम्पत्ति वो विभीषण को तो उसके आगमन के साथ दे देते है। यह परमपुनीत भगवान का बड़प्पन ही है जो पापियों को भी सुधरने का अवसर देते, रावण के पास भी उन्होने शांतिदूत अंगद को भेजा थे। मातृभक्ति ऐसी की कभी मन मे भी कैकयी माता के प्रति द्वेष भाव न रखा और वापस आ कर सर्वश्रेष्ठ शासक बन कर दिखाए जिनका उदाहरण लोग कई युगो बाद आज भी देते हैं-
“दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥”
भगवान राम के कई मित्र हुए। हर वर्ग के व्यक्तियों के साथ भगवान राम ने समभाव के साथ मित्रता की भूमिका निभाई। सभी संबंधों को भगवान श्री राम ने हृदय से निभाया। चाहे वो निषादराज या विभीषण और केवट हो या सुग्रीव। इसके अलावा भगवान श्री राम में बड़े दयालु हुए। उन्होंने अपनी दयालुता की वजह से मानव, पक्षी और दानव सभी के कल्याण की बात की। रामायण में भगवान श्री राम के चरित्र का जिक्र किया गया है, जो उन्हें धर्म के प्रति समर्पित इंसान के तौर पर प्रस्तुत करता है।
भगवान् श्री राम ने माता पिता की आज्ञा का पालन किया,परन्तु अवसर आने पर जेष्ठों को भी उपदेश किया है, उन्होंने अपने माता-पिता से यह भी कहा कि वनवास के दौरान दुखी न हों। जिस कैकेयी के कारण राम जी को चौदह वर्ष वनवास हुआ, उस कैकेयी माता को वनवास से आने पर पहले की भांति ही प्रेम किया। आज भी आदर्श बंधु प्रेम को राम-लक्ष्मण की उपमा देते हैं। श्रीराम एक पत्नीव्रत थेl सीता का त्याग करने के उपरांत श्रीराम विरक्ति से रहे । आगे यज्ञ के लिए पत्नी की आवश्यकता होने पर भी दूसरा विवाह न कर, उन्होंने सीताजी की प्रतिकृति स्वयं के पास बिठाई। राम ने सुग्रीव, विभीषण आदि के संकट काल के समय उनकी सहायता की।
आदर्श राजा के रूप में वर्णन है कि भगवान श्री रामने वनवास से लौटने के बाद राज्याभिषेक के बाद अपना सारा राज्य श्री गुरु वसिष्ठ के चरणों में अर्पित कर दिया; क्योंकि उनका मत था कि 'समुद्र से घिरी इस पृथ्वी पर राज्य का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही प्राप्त होता है'। प्रजा द्वारा जब सीताजी के विषय में संशय व्यक्त किया तो उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख का विचार न कर, राजधर्म के रूप में अपनी धर्मपत्नी का त्याग किया ।
इस विषय में कालिदास ने वर्णन किया है-
"कौलिनभीतेन गृहन्निरस्ता न तेन वैदेहसुता मनस्तः"।
अर्थात लोकापवाद के भय से श्री राम ने सीता को घर से बाहर निकाला, मन से नहीं। आदर्श शत्रु के रूप में जब रावण के भाई विभीषण ने उसकी मृत्यु के बाद दाह संस्कार करने से इनकार कर दिया, तो राम ने उससे कहा, “मृत्यु के साथ शत्रुता समाप्त होती है। यदि आप रावण का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे, तो मैं करूंगा। वह मेरा भी भाई है"।
भगवान श्री राम ने धर्म की सभी मर्यादाओं का पालन किया; इसलिए उन्हें ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ कहा गया है। भगवान श्रीराम ने प्रजा को भी धर्म सिखाया। उनकी सीख आचरण में लाने से मनुष्य की वृत्ति सत्त्वप्रधान हो गई व इसलिए समष्टि पुण्य निर्माण हुए। अतः प्रकृति का वातावरण मानव जीवन के लिए सुखद हो गया।
जब तक सृष्टि तब तक राम की दृष्टि
- फोटो : अमर उजाला
भारत के संविधान की मूल प्रति मे दीनदयाल भगवान के चित्र हैं। गांधी जी भी भगवान श्रीराम से ही प्रेरणा पाते थे और भारत मे रामराज्य चाहते थे। स्वामी रामानंद जैसे महान समाज सुधारक संत ने भी समाजिक पतन को रोकने के लिए रामनाम की महिमा का ही प्रयोग किया था। भगवान राम से प्रेरणा पाकर लोग समाज सेवा में अत्यधिक योगदान करते है। आज भी भगवान राम की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है । हिंदू जनमानस के लिए भगवान राम की प्रासंगिकता उतनी ही ही जितनी सागर में जल की, वनों में वृक्ष की अथवा ज्ञानी पुरुषों में विनम्रता की होती है। राम सबके लिए इस भारतवर्ष के पवित्र भूमि के हर कण में व्याप्त है। राम के बिना इस भारतवर्ष की कोई कल्पना नहीं की जा सकती। एक बार श्री राम का नाम-मात्र ही उनके भक्तों के संपूर्ण दुखों का हरण करने वाला है।
भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही, पूर्ण ब्रह्म के अवतार भी हैं। महामानव और आदर्श मानव के रूप में वह सद्प्रेरणा के अजस्र स्रोत हैं। भगवान भारतीय धर्म-संस्कृति के अनिवार्य और अपरिहार्य अंग हैं! इसीलिए ईश्वर के विभिन्न नामों में साधना की दृष्टि से रामनाम का महत्त्व सर्वोपरि है। आज के पंकिल कुहासे को नष्ट करने के लिए भगवान श्री राम जैसे चन्दन चर्चित चरित्र में अवगाहन की महती आवश्यकता मानवता को है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम समस्त भारतीय साधना और ज्ञान-परम्परा के वागद्वार हैं, जिनका दृढ़चरित्र लोक-मर्यादा के कठोर अंकुश से अनुशासित है और जो जन-जन के मन को ‘रस विशेष’ से आप्लावित कर सकता है, जो संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी हैl
भगवान श्री राम का जनमोत्स्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। उनके जन्मोत्सव को संपूर्ण भारतवर्ष में राम नवमी के रूप में मनाई जाती है। हिंदू पंचांग की गणना के मुताबिक इस वर्ष राम नवमी का पर्व 17 अप्रैल 2024, बुधवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष का राम नवमी विशेष हैl 500 साल के बाद 17 अप्रैल को ऐसी रामनवमी आएगी जब भगवान श्री राम का जनमोत्स्व अयोध्या के नव निर्मित दिव्य एवं भव्य मंदिर में मनाया जाएगाl इसी वर्ष 22 जनवरी को राम लला की उस भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई हैl भगवान श्री राम आ गए हैंl आज आवश्यकता है जन-जन में श्री राम चरित्र की ओर अपने को ले जाएं इस बार की राम नवमी पूरे भारतवर्ष में अयोध्यामयी भाव से मनाने की तैयारी कर रहा है।
----------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।