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रक्षाबंधन 2020: स्वदेशी राखी की मांग ने दिया त्योहार को नया रूप, चीन से मुक्ति की ओर पहला कदम

सार

पारंपरिक राखियों में जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्लास्टिक और धातु के अलावा पेंट का भी इस्तेमाल होता है, वहीं गाय के गोबर से बनी राखियां पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। दरअसल ऐसी राखियों को आसानी से मिट्टी में दबाया जा सकता है, जिससे जमीन को नुकसान पहुंचने के बजाए मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है।
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भाई द्वारा बहन की रक्षा का वचन देने के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले त्योहार रक्षाबंधन के मायने वर्तमान युग में बदल गए हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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भाई द्वारा बहन की रक्षा का वचन देने के प्रतीक के रूप में मनाए जाने वाले त्योहार रक्षाबंधन के मायने वर्तमान युग में बदल गए हैं। बदले जमाने के साथ भाई-बहन के अटूट प्यार के इस पर्व पर आधुनिकता का रंग चढ़ चुका है, लेकिन साथ ही प्रकृति मित्र राखियां भी लोगों द्वारा पसंद की जाने लगी हैं।

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इस वर्ष देशवासियों द्वारा चीन की आर्थिक कमर तोड़ने का जो संकल्प लिया गया है, उसके चलते स्वदेशी राखियों की मांग कई गुना बढ़ गई है। माना जा रहा है कि रक्षाबंधन पर ही चीनी राखियों के बहिष्कार से चीन को 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की चपत लगेगी।


दरअसल, राखी निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा माल चीन से आयात किया जाता रहा है लेकिन चीन के साथ तनातनी के दौर में चाइनीज सामान के प्रति विरोध के कारण स्वदेशी राखियों की मांग काफी बढ़ी है।
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हालांकि कोरोना महामारी का असर इस पर्व पर भी देखा जा रहा है, लेकिन स्वदेशी राखियों की डिमांड बढ़ने का सकारात्मक पहलू यह रहा है कि लॉकडाउन के दौरान नौकरी गंवा चुके या काम-धंधे ठप्प होने से बेरोजगार हुए लोगों को कुछ रोजगार मिला।

महिलाओं तथा बच्चों का आकर्षण साधारण राखियों के बजाए नए डिजाइनों वाली स्वदेशी डिजाइनर और हाइटैक राखियों की ओर देखा गया है। हाईटेक राखियों में गैजेट राखियां, 3-डी और एलईडी तथा म्यूजिकल राखियां शामिल हैं जबकि बच्चों के लिए घड़ी और छोटे-छोटे सुंदर खिलौने लगी राखियां भी बाजार में उपलब्ध हैं। पूरी तरह से स्वदेशी स्टोन की रंग-बिरंगी आकर्षक हाईटेक स्वदेशी राखियों की डिमांड भी काफी रही है।

रक्षाबंधन पर्व के बदलते स्वरूप का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि अब प्रकृति मित्र राखियों की मांग भी बढ़ने लगी है।

छत्तीसगढ़ के धमतरी में गोबर तथा बांस का इस्तेमाल कर बनाई गई खूबसूरत राखियों को देश के दूरदराज के हिस्सों में भी राखी विक्रेताओं द्वारा काफी पसंद किया गया है।

इनके लिए बांस को बहुत पतली परत में काटकर उसे राखी का रूप दिया जाता है और खूबसूरत प्राकृतिक चटख रंगों से रंगा जाता है। इन पर गाय के गोबर को सुखाकर मनचाहे डिजाइन बनाकर उस पर लंबे समय तक खराब नहीं होने वाले विभिन्न सब्जियों के बीजों से सजावट की जाती है।

राखी का पर्व बीतते ही अगले साल के लिए नए डिजाइन तैयार करने की चिंता शुरू हो जाती है...

रक्षाबंधन पर अब बाजार में हर वर्ष सैंकड़ों तरह की नई राखियां आती हैं- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

पर्व के समापन के बाद जब ये राखियां हाथ से उतरती हैं तो ये पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि गोबर मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है और सब्जियों के बीजों का अंकुरण हो जाता है। इस तरह की राखियों में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से ऐसे रंगों से भी पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुंचती।

आधुनिकता के इस दौर में राखी बाजार में पिछले साल से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से ऐसी ही अनूठी और सराहनीय पहल देखने को मिल रही है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के बिजनौर में नगीना स्थित श्रीकृष्ण गौशाला में पहली बार देशी नस्ल की लाल सिंधी गाय के गोबर से राखियों का निर्माण शुरू किया गया था, जिन्हें बहुत पसंद किया गया।

ये राखियां बनाने के लिए गोबर को राखी का आकार देकर सुखाया जाता है, फिर उसे सजाकर उसके साथ सूत का धागा बांधा जाता है। अजमेर जिले के केकड़ी कस्बे में भी ऐसे ही अभियान की शुरूआत की गई थी, जिसके तहत गौवंश को बचाने के लिए राखी तथा भगवान की मूर्तियों सहित गाय के गोबर से अब कई तरह की वस्तुएं बनाई जाती हैं।

दरअसल पारंपरिक राखियों में जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्लास्टिक और धातु के अलावा पेंट का भी इस्तेमाल होता है, वहीं गाय के गोबर से बनी राखियां पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। दरअसल ऐसी राखियों को आसानी से मिट्टी में दबाया जा सकता है, जिससे जमीन को नुकसान पहुंचने के बजाए मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है।

रक्षाबंधन पर अब बाजार में हर वर्ष सैंकड़ों तरह की नई राखियां आती हैं। लोगों में नए-नए डिजाइनों वाली महंगी राखियों के प्रति दीवानगी इतनी बढ़ गई है कि अब राखी बनाने वाले बड़े-बड़े निर्माता तो बाकायदा राखियों के नए-नए डिजाइन तैयार कराने के लिए डिजाइनरों की सेवाएं लेने लगे हैं।

राखी का पर्व बीतते ही अगले साल के लिए नए डिजाइन तैयार करने की चिंता शुरू हो जाती है क्योंकि राखियों के सैंकड़ों आकर्षक डिजाइनों के बावजूद ग्राहक हर बार ‘मोर डिजाइन्स’ की डिमांड करते हैं। यही कारण है कि एक साल बनाए गए राखी के नए डिजाइन अगले साल ‘आउटडेटेड’ हो जाते हैं।

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फैंसी हाईटेक राखियों के इस दौर में हर कोई अब राखियों के नए डिजाइनों की तलाश में रहता है...

फैंसी राखियों में जो डिजाइन एक साल बिकते हैं, वे अगले साल नहीं बिकते जबकि राखी के जिन डिजाइनों में प्राचीन कलात्मकता का प्रयोग किया जाता है- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
फैंसी राखियों में जो डिजाइन एक साल बिकते हैं, वे अगले साल नहीं बिकते जबकि राखी के जिन डिजाइनों में प्राचीन कलात्मकता का प्रयोग किया जाता है, ऐसी राखियां महंगी होने के बावजूद ज्यादा बिकती हैं।

प्रकृति मित्र और परंपरागत राखियों के अलावा बाजार अब इलैक्ट्रॉनिक राखियों तथा हैरी पॉटर, फेंगसुई, स्पाइरडरमैन, मोगली, मिक्की माउस, बाल गणेश, छोटा भीम, बेनटेन, डोरीमॉन, वीडियो गेम, कम्प्यूटर, स्मार्टफोन इत्यादि तरह-तरह के डिजाइनों वाली आकर्षक राखियों से भरे नजर आते हैं।

कई वर्षों से राखियां बेच रहे दुकानदार राजेश कुमार का कहना है कि फैंसी हाईटेक राखियों के इस दौर में हर कोई अब राखियों के नए डिजाइनों की तलाश में रहता है। वह बताते हैं कि एक समय था, जब रेशम के साधारण धागे ही अधिक मात्रा में बिकते थे किंतु अब राखियों के डिजाइनों में भी इलैक्ट्रॉनिक राखियों की मांग ज्यादा रहती है।

हालांकि लौंग, इलायची व सुपारी वाली कलात्मक राखियां अब भी पसंद की जाती हैं। वह बताते हैं कि ग्रामीण महिलाओं का झुकाव अब भी पारंपरिक राखियों की ओर देखने को मिल रहा है, लेकिन बड़े लोगों की पसंद अब फैंसी राखियों को छोड़कर सोने-चांदी की राखियों पर टिकी है। चांदी की जंजीरनुमा राखियां तो अब आम हो चली हैं।

एक दुकान पर राखी खरीद रही पूनम शर्मा को परंपरागत गोल राखियों के बजाए नए डिजाइनों वाली इलैक्ट्रॉनिक राखियां ज्यादा पसंद आई जबकि उन्होंने बच्चों के लिए मिक्की माउस, स्पाइडरमैन, मोगली इत्यादि डिजाइनों की राखियां पसंद की। बहरहाल, स्वदेशी राखियों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण और धीरे-धीरे प्रकृति मित्र राखियों के बढ़ते चलन से रोजगार और पर्यावरण की दृष्टि से रक्षाबंधन पर्व की एक सुखद भावी तस्वीर नजरों के सामने उभरती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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