रक्षाबंधन पर अब बाजार में हर वर्ष सैंकड़ों तरह की नई राखियां आती हैं- फाइल फोटो
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पर्व के समापन के बाद जब ये राखियां हाथ से उतरती हैं तो ये पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि गोबर मिट्टी में मिलकर खाद बन जाता है और सब्जियों के बीजों का अंकुरण हो जाता है। इस तरह की राखियों में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से ऐसे रंगों से भी पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुंचती।
आधुनिकता के इस दौर में राखी बाजार में पिछले साल से पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से ऐसी ही अनूठी और सराहनीय पहल देखने को मिल रही है।
पिछले साल उत्तर प्रदेश के बिजनौर में नगीना स्थित श्रीकृष्ण गौशाला में पहली बार देशी नस्ल की लाल सिंधी गाय के गोबर से राखियों का निर्माण शुरू किया गया था, जिन्हें बहुत पसंद किया गया।
ये राखियां बनाने के लिए गोबर को राखी का आकार देकर सुखाया जाता है, फिर उसे सजाकर उसके साथ सूत का धागा बांधा जाता है। अजमेर जिले के केकड़ी कस्बे में भी ऐसे ही अभियान की शुरूआत की गई थी, जिसके तहत गौवंश को बचाने के लिए राखी तथा भगवान की मूर्तियों सहित गाय के गोबर से अब कई तरह की वस्तुएं बनाई जाती हैं।
दरअसल पारंपरिक राखियों में जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्लास्टिक और धातु के अलावा पेंट का भी इस्तेमाल होता है, वहीं गाय के गोबर से बनी राखियां पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। दरअसल ऐसी राखियों को आसानी से मिट्टी में दबाया जा सकता है, जिससे जमीन को नुकसान पहुंचने के बजाए मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है।
रक्षाबंधन पर अब बाजार में हर वर्ष सैंकड़ों तरह की नई राखियां आती हैं। लोगों में नए-नए डिजाइनों वाली महंगी राखियों के प्रति दीवानगी इतनी बढ़ गई है कि अब राखी बनाने वाले बड़े-बड़े निर्माता तो बाकायदा राखियों के नए-नए डिजाइन तैयार कराने के लिए डिजाइनरों की सेवाएं लेने लगे हैं।
राखी का पर्व बीतते ही अगले साल के लिए नए डिजाइन तैयार करने की चिंता शुरू हो जाती है क्योंकि राखियों के सैंकड़ों आकर्षक डिजाइनों के बावजूद ग्राहक हर बार ‘मोर डिजाइन्स’ की डिमांड करते हैं। यही कारण है कि एक साल बनाए गए राखी के नए डिजाइन अगले साल ‘आउटडेटेड’ हो जाते हैं।
फैंसी राखियों में जो डिजाइन एक साल बिकते हैं, वे अगले साल नहीं बिकते जबकि राखी के जिन डिजाइनों में प्राचीन कलात्मकता का प्रयोग किया जाता है- फाइल फोटो
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फैंसी राखियों में जो डिजाइन एक साल बिकते हैं, वे अगले साल नहीं बिकते जबकि राखी के जिन डिजाइनों में प्राचीन कलात्मकता का प्रयोग किया जाता है, ऐसी राखियां महंगी होने के बावजूद ज्यादा बिकती हैं।
प्रकृति मित्र और परंपरागत राखियों के अलावा बाजार अब इलैक्ट्रॉनिक राखियों तथा हैरी पॉटर, फेंगसुई, स्पाइरडरमैन, मोगली, मिक्की माउस, बाल गणेश, छोटा भीम, बेनटेन, डोरीमॉन, वीडियो गेम, कम्प्यूटर, स्मार्टफोन इत्यादि तरह-तरह के डिजाइनों वाली आकर्षक राखियों से भरे नजर आते हैं।
कई वर्षों से राखियां बेच रहे दुकानदार राजेश कुमार का कहना है कि फैंसी हाईटेक राखियों के इस दौर में हर कोई अब राखियों के नए डिजाइनों की तलाश में रहता है। वह बताते हैं कि एक समय था, जब रेशम के साधारण धागे ही अधिक मात्रा में बिकते थे किंतु अब राखियों के डिजाइनों में भी इलैक्ट्रॉनिक राखियों की मांग ज्यादा रहती है।
हालांकि लौंग, इलायची व सुपारी वाली कलात्मक राखियां अब भी पसंद की जाती हैं। वह बताते हैं कि ग्रामीण महिलाओं का झुकाव अब भी पारंपरिक राखियों की ओर देखने को मिल रहा है, लेकिन बड़े लोगों की पसंद अब फैंसी राखियों को छोड़कर सोने-चांदी की राखियों पर टिकी है। चांदी की जंजीरनुमा राखियां तो अब आम हो चली हैं।
एक दुकान पर राखी खरीद रही पूनम शर्मा को परंपरागत गोल राखियों के बजाए नए डिजाइनों वाली इलैक्ट्रॉनिक राखियां ज्यादा पसंद आई जबकि उन्होंने बच्चों के लिए मिक्की माउस, स्पाइडरमैन, मोगली इत्यादि डिजाइनों की राखियां पसंद की। बहरहाल, स्वदेशी राखियों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण और धीरे-धीरे प्रकृति मित्र राखियों के बढ़ते चलन से रोजगार और पर्यावरण की दृष्टि से रक्षाबंधन पर्व की एक सुखद भावी तस्वीर नजरों के सामने उभरती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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