भारत के वायु सेना बेड़े में 5 राफेल फाइटर जेट के शरीक हो जाने के बाद से आम देशवासी को लग रहा है कि हम चीन को निपटा देंगे और पाकिस्तान की बारह बजा डालेंगे। यह महज ख्याली पुलाव है और क्षणिक भावुकता। यह बड़ी सामरिक उपलब्धि तो है, लेकिन कोई सामरिक संसाधन ऐसे नहीं होते,जिसके बूते एकतरफा जंग जीती जा सके या ये केवल युद्ध के लिए ही नहीं होते।
जैसे शेर,कुत्ता या बिल्ली तक के पंजे बेहद नुकीले होते हैं। ये अपने शिकार की चीर-फाड़ इन घातक पंजों के सहारे ही करते हैं, दांतों से तो केवल शिकार को दबोचे रखते हैं और उसे निपटा देने के बाद चबाकर खाने के काम आते हैं।
बाकी समय इन्हीं पंजों से अपने बच्चों को खिलाते हैं और दांतों से पकडक़र शिशुओं को एक से से दूसरी जगह ले जाते हैं। ऐसे ही होते हैं युद्धक संसाधन। शांतिकाल में ये सेना के खेलने के काम आते हैं, लेकिन जब बात संघर्ष की आती है तो इनसे दुश्मन का कलेजा चीर कर रख देते हैं।
बहरहाल, पहले तो ये जान लें कि भारत और चीन दोनों ही युद्ध के मूड में नहीं होंगे। ये दुनिया की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं और दुनिया को जंग से नहीं आयात-निर्यात से जीतना चाहते हैं। जो काम बाजारवाद को पोषित कर हो सकता है, उसके लिए खून बहाने की क्या जरूरत?
मौजूदा हालात में चीन हमसे कई गुना आगे है। युद्ध के संसाधनों के लिहाज से भी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से भी। इसका यह मतलब नहीं कि हम कमतर हैं या चीन बेहद भारी है।
इतिहास गवाह है कि ज्यादातर जंग का फैसला रणनीति से होता है,संख्या बल या हथियारों की तादाद से नहीं। इतिहास गवाह है कि युद्ध जीतते-जीतते एक राजा इसलिए हारे कि राजा हाथी के हौदे से उतरकर मैदान में मारकाट मचा रहे थे, लेकिन सेना समझी कि राजा मारे गए तो सैनिक भागने लगे और बाजी पलट गई।
ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्नल रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के 50 हजार सैनिकों की तुलना में महज 3 हजार सैनिकों के भरोसे युद्ध जीत लिया था, क्योंकि उसकी रणनीति नायब थी। नवाब से उनका सेनापति मीर जफर गद्दारी नहीं करता तो संभव था कि मुगलों के बाद हमें अंग्रेजों की गुलामी नहीं करना पड़ती।
तो आइए पहले यह देख लें कि भारत और चीन की सामरिक शक्ति कितनी है। मोटे तौर पर यह जान लें कि भारत केवल सैन्य बल में अधिक है, बाकी सब में कम है। उसके पास 34 लाख सैनिक हैं तो चीन के पास 27 लाख। भारत का रक्षा बजट 71.1 बिलियन डॉलर है तो चीन का 261 बिलियन डॉलर। तीन गुना से अधिक।