सचिन पायलट के हाथ फिर आते-आते रह गई सीएम की कुर्सी
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सीएम की कुर्सी फिलहाल पायलट की पहुंच से दूर
एक सवाल जो राजनीतिक हलकों में पिछले चार-पांच दिनों से घूम रहा है, वह यह है कि क्या कारण है, जो गहलोत कैंप इतना आक्रमक हो गया? दरअसल, जिस दिन अशोक गहलोत को सोनिया गांधी ने दिल्ली बुलाया था और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए कहा था, उसी के आसपास सचिन पायलट ने भी दिल्ली में आलाकमान से मुलाकात की थी।
यदि उसी दिन अशोक गहलोत से इस्तीफा ले लिया जाता और सचिन पायलट के नाम का ऐलान कर दिया जाता तो यह किस्सा वहीं खत्म हो जाता, लेकिन गहलोत कैंप को पूरा स्पेस दिया गया। साथ ही, पायलट गुट ने भी अतिउत्साह में सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बढ़-चढ़कर सचिन के लिए प्रचार शुरू कर दिया। सचिन पायलट ने भी ऐसा व्यवहार किया, जिससे साफ झलक रहा था कि उन्हें आलाकमान ने हरी झंडी दे दी है और अब वही अगले मुख्यमंत्री होंगे।
साथ ही, एकाएक जयपुर में विधायक दल की बैठक बुला ली गई। राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे को पर्यवेक्षक बनाकर भेज दिया गया। सारा खेल यहीं से शुरू हुआ। अशोक गहलोत को लगा कि उनके साथ कोई खेल हो रहा है, उन्हें फंसाया जा रहा है।
गहलोत गुट के शांति धारीवाल, प्रताप सिंह खाचरियावास, संयम लोढ़ा, सुभाष गर्ग समेत कई नेता मुखर हो गए। राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने अपनी चाल चल दी। रविवार शाम को नाटक से पर्दा उठा और इस्तीफों की झड़ी के बीच न केवल कांग्रेस आलाकमान की जगहंसाई हुई, बल्कि अति आत्मविश्वास में डूबे पायलट के फिलहाल मुख्यमंत्री बनने पर पूर्णविराम लग गया।
बिखरते कांग्रेस को बचाना पहला लक्ष्य
गांधी परिवार के लिए अब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना प्राथमिकता नहीं रह गया है। पहले बिखरती कांग्रेस को राजस्थान में संभालने की चुनौती सामने खड़ी है। वैसे सोशल मीडिया पर पायलट कैंप अब बेहद आक्रमक है और अशोक गहलोत के लिए जमकर अपशब्द कह रहा है। कुछ नेताओं ने तो यहां तक लिख दिया है कि वह जादूगर नहीं गंदगी हैं।
अगले एक-दो दिन राजस्थान में कांग्रेस के लिए संकट वाले रह सकते हैं। असली परीक्षा अब आलाकमान यानी गांधी परिवार की है। सोनिया गांधी के पास एक सख्त मुखिया बनने का अवसर है। या तो यहां से बची-खुची कांग्रेस बिखर जाएगी या संभल जाएगी। वैसे जो हालात हैं, उसमें तो यही प्रतीत होता है कि अब पानी बह चुका है।
कांग्रेस और राजस्थान के राजनीतिक हालातों पर भारतीय जनता पार्टी की नजर भी बनी हुई है। उनके नेता केवल कांग्रेस की उठापटक पर कटाक्ष कर रहे हैं। सरकार गिराने या अपनी सरकार बनाने जैसे बातें नहीं हो रही है।
वर्ष 2020 में जब सचिन पायलट ने बगावत करके 19 विधायकों को अपने साथ कर लिया था, तब भाजपा पर सरकार गिराने या अस्थिर करने के आरोप लगे थे। इस बार पार्टी यही जताने में लगी है कि उसका पूरे घटनाक्रम से कुछ लेना-देना नहीं है। यह कांग्रेस का अपना झगड़ा है और कुर्सी के लिए पार्टी नेताओं में जूतम-पैजार चल रही है। हालांकि, इस घटनाक्रम के बीच पार्टी को फायदा होता दिख रहा है।
इन दिनों देश में जिस विपक्षी एकता की बात जोर-शोर से उठाई जा रही है, उसको भी कांग्रेस के इस घटनाक्रम से करारा झटका लगा है। वर्ष 2024 के आम चुनावों में अभी वक्त है, लेकिन बिखरा हुआ विपक्ष ही एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देगा, यह करीब-करीब साफ दिखने लगा है।
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