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संघ प्रमुख की मुसलमानों से भेंट: क्या हैं इस संवाद के असल मायने?

सार

यह पहला मौका है, जब किसी संघ प्रमुख ने मदरसे का दौरा किया हो। वे वहां अखिल भारतीय इमाम संगठन (एआईआईओ) के निमंत्रण पर गए थे। इस दौरान आरएसएस प्रमुख ने संघ के पदाधिकारियों कृष्ण गोपाल और इंद्रेश कुमार के साथ मस्जिद प्रांगण में स्थित एआइआईओ के कार्यालय में एआईआईओ प्रमुख उमर अहमद इलियासी के साथ बैठक की।
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संघ के सरसंघचालक डाॅ मोहन भागवत मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिले। - फोटो : ANI
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विस्तार
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उधर उत्तर प्रदेश में मदरसों के सर्वे की कार्रवाई और इधर भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक डाॅ मोहन भागवत द्वारा अचानक दिल्ली की एक मस्जिद और एक मदरसे के दौरे से हिंदू मुसलमानों के बीच खाई कितनी पट पाएगी, कहना मुश्किल है, लेकिन संघ की यह पहल उसे पाटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है। सरसंघचालक ने मध्य दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित एक मस्जिद और बाद में उत्तरी दिल्ली के आजादपुर में मदरसा तजावीदुल कुरान का दौरा किया।

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यह पहला मौका है, जब किसी संघ प्रमुख ने मदरसे का दौरा किया हो। वे वहां अखिल भारतीय इमाम संगठन (एआईआईओ) के निमंत्रण पर गए थे। इस दौरान आरएसएस प्रमुख ने संघ के पदाधिकारियों कृष्ण गोपाल और इंद्रेश कुमार के साथ मस्जिद प्रांगण में स्थित एआइआईओ के कार्यालय में एआईआईओ प्रमुख उमर अहमद इलियासी के साथ बैठक की। फिर वो उत्तरी दिल्ली के आजादपुर स्थित मदरसा ताजवीदुल कुरान पहुंचे और छात्रों से बातचीत की।
 

संघ की इस पहल का देश में ज्यादातर स्वागत ही किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि संघ का मुस्लिमों तक पहुंच बनाने का यह प्रयास प्रतीकात्मकता से परे जमीनी स्तर पर भी नजर आना चाहिए।

 

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‘अलगाववादियों और कट्टरपंथियों' से मुकाबले का मकसद

संघ प्रमुख को अपने बीच पाकर अखिल भारतीय इमाम संघ के अध्यक्ष उमर इलियासी इतने भाव विभोर हुए कि उन्होंने भागवत को इस मुल्क का राष्ट्रपिता तक बता दिया। हालांकि स्वयं भागवत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपिता तो एक ही हैं, हम सब राष्ट्र की संतानें हैं। इलियासी के बयान की कुछ लोगों ने आलोचना भी की। बताया जाता है कि संघ प्रमुख का मुसलमानों से इस तरह मिलना आरएसएस के आउटरीच प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसका मकसद ‘अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से लड़ना’ है।

इसी के तहत पिछले साल जुलाई में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरएसएस से संबद्ध) की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में संघ प्रमुख भागवत ने कहा था कि भारत के हिंदू या मुसलमानों का डीएनए एक ही है और देश में रहने वाले सभी समुदायों के पूर्वज एक जैसे हैं।

इसके बाद इसी साल अगस्त में मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक समूह ने सरसंघचालक से भेंट की थी, जिसकी आलोचना एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने यह कहकर की थी कि ये तमाम बुद्धिजीवी ‘एलीट’ क्लास के हैं और आम मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। 

इसका जवाब मुस्लिम बुद्धिजीवियों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई कुरैशी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख के जरिए दिया।

क़ुरैशी ने लिखा कि पाँच मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा संघ प्रमुख से मिलने को लेकर तरह तरह की व्याख्याएं की गईं। इस दल में कुरैशी के अलावा दिल्ली के पूर्व राज्यपाल नजीब जंग, पत्रकार शाहिद सिद्दीक़ी, होटल उद्योगपति सईद शेरवानी, ले.जन. जमीरउददीन शाह (रि) शामिल थे।

कुरैशी के अनुसार संघ प्रमुख से मिलने की यह पहल हमने ही की थी और संवाद की प्रक्रिया में विश्वास रखते हुए मुस्लिमों की स्थिति और असुरक्षा पर विचार के उद्देश्य से थी। कुरैशी के मुताबिक इसे मुस्लिम समुदाय द्वारा बड़ी संख्या में समर्थन और कुछ विपरीत प्रतिक्रियाएं भी मिली। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने लिखा कि वे सभी संघ प्रमुख की सादगी से अचंभित थे। उनकी समय की पाबंदी, धैर्य और स्पष्टता ने हमें प्रभावित किया। 


भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व ऐसी पद्धति है,जिसमें सभी समुदायों के लिए समान जगह है। देश तभी प्रगति कर सकता है जब सभी एकजुट हों। उन्होंने जोड़ा कि देश के संविधान का सभी को पालन करना चाहिए साथ ही इस गलत धारणा को भी तिरोहित किया कि पहला अवसर मिलते ही संविधान बदल दिया जाएगा या मुसलमानों से मताधिकार छीन लिया जाएगा।

कुरैशी के अनुसार भागवत ने यह अवश्य कहा कि हिंदू दो बातों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। पहला है ‘गाय’ और दूसरा उन्हें ‘काफिर’ कहना। इस पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने जवाब दिया कि हम इस बात को समझते हैं। जहां गोहत्या पर पाबंदी है, वहां ऐसा करने वालों को कानूनन दंड दिया जाना चाहिए।

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संघ की मुसलमानों के साथ संवाद की इस पहल को कुछ लोग अभी संदेह की निगाहों से देख रहे हैं। - फोटो : PTI

गोहत्या और जिहादी- पाकिस्तानी जैसे संबोधनों पर चर्चा


चर्चा के दौरान संघ प्रमुख का आशय यह था कि जहां गोहत्या पर प्रतिबंध नहीं है, वहां मुस्लिमों को स्वेच्छा से गोमांस त्याग देना चाहिए। हिन्दुओं को काफिर कहे जाने पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने स्पष्ट किया कि यह अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ है न मानने वाला। इसे भारत में प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा कि भारत में सभी मुसलमानों के लिए जिहादी और पाकिस्तानी शब्द का प्रयोग किया जाता है, यह भी ठीक नहीं है। इससे भागवत सहमत दिखे और उन्होंने कहा कि इसे तत्काल रोका जाना चाहिए।

उन्होंने मुसलमानों से संवाद जारी रखने के लिए चार वरिष्ठ पदाधिकारियों को नामांकित भी किया। कुरैशी ने अपने लेख में उन्हें ‘एलीट’ ( कुलीन) कहने वाले ओवैसी पर तीखा कटाक्ष किया कि वो तो खुद महलों में रहते हैं। 

संघ की मुसलमानों के साथ संवाद की इस पहल को कुछ लोग अभी संदेह की निगाहों से देख रहे हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा-
जो लोग मोहन भागवत से मिले हैं, उन्हें यह समझना होगा कि आरएसएस की वैचारिक स्थिति सत्ताधारी पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक लाइन के साथ है या नहीं। क्या वे तटस्थ, लचीले और बदलाव चाहने वाले हैं? इन मुद्दों पर समय आने पर ही कोई राय बनाई जा सकती है।’ ‘हम जानना चाहेंगे कि आरएसएस की फिलहाल स्थिति क्या है? हमें इसे पूर्वाग्रहों से नहीं बल्कि सहजता के साथ देखे जाने की जरूरत है।’

बेशक कई लोग इसे ‘प्रतीकात्मकता’  के रूप में देख रहे हैं, लेकिन यह आरंभ है और रास्ता काफी लंबा है, जो कई पड़ावों से गुजरेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में रहने वाले मुसलमान सौ फीसदी भारत का हिस्सा हैं। इसी संदर्भ में आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना था कि हम ऐसे तत्वों का समर्थन नहीं करते, जो मुसलमानों को पाकिस्तानी कहते हैं। हम ऐसे फ्रिंज तत्वों को खत्म करने की कोशिश करेंगे जो देश के माहौल को खराब करते हैं। लेकिन हमारे प्रयासों को मुस्लिम संगठनों और समुदाय के नेताओं की ओर से समान रूप से समर्थन मिलना चाहिए और उनकी तरफ से भी ऐसे कदम उठाने चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो ही हम आउटरीच को सफल कह सकते हैं।’


आरएसएस में आ रहे इस ‘बदलाव’ को लेकर सवाल

हालांकि कुछ लोग आरएसएस में आ रहे इस ‘बदलाव’ को लेकर आशंकित भी हैं। लेखक और पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा, ‘लोकतंत्र में संवाद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मोहन भागवत से मिलने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवियों और इमामों के प्रतिनिधिमंडल में से कोई भी पूरे भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। उल्टे उन्होंने सवाल किया कि क्या इस बैठक के बाद दोनों पक्षों ने अपनी स्थिति या रुख में बदलाव किया है?

नीलांजन का आशय था कि एकपक्षीय होकर काम नहीं चल सकता। इन सवालों के जवाब में आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने साफ किया कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का एक मस्जिद जाना और इमामों के एक संगठन के प्रमुख के साथ मुलाकात संघ की लाइन से अलग नहीं है। उन्होंने संघ प्रमुख की इस भेंट को ‘भारत जोड़ो यात्रा का असर’ बताने के लिए कांग्रेस की आलोचना की। मीडिया से उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संघ की लाइन को गलत समझा है।

उधर बसपा नेत्री मायावती ने सवाल किया कि संघ प्रमुख के मस्जिद दौरे से क्या मुसलमानों के प्रति बीजेपी के नजरिए में बदलाव आएगा? हालांकि मायावती के इस बयान को यूपी में मुसलमानों के बीच अपनी पैठ कायम रखने की कोशिश से जोड़कर भी देखा जा रहा है। 

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। संघ प्रमुख इस तरह से समाज के सभी वर्गों के लोगों से मिलते रहते हैं। तमाम सवालों और शंकाओं के बीच हिंदू-मुसलमानों के बीच संवाद बढ़ाने की संघ की पहल अच्छी इस मायने में है कि परस्पर संवाद से ही शंकाएं दूर हो सकती हैं और अविश्वास पिघल सकता है।

सब कुछ बदल जाएगा, ऐसा भी नहीं है, लेकिन बदलाव चाहने वालों को संबल मिलेगा। यदि समाज के बिखरते ताने बाने को समय रहते संवाद के धागों से सिल दिया जाए तो देश को जोड़ने के लिए लंबी यात्राओं की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा तो खुद राजनीति ही है। यह रोड़ा कैसे, कौन और क्यों हटाएगा, यह यक्ष प्रश्न है। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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