संघ की मुसलमानों के साथ संवाद की इस पहल को कुछ लोग अभी संदेह की निगाहों से देख रहे हैं।
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गोहत्या और जिहादी- पाकिस्तानी जैसे संबोधनों पर चर्चा
चर्चा के दौरान संघ प्रमुख का आशय यह था कि जहां गोहत्या पर प्रतिबंध नहीं है, वहां मुस्लिमों को स्वेच्छा से गोमांस त्याग देना चाहिए। हिन्दुओं को काफिर कहे जाने पर मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने स्पष्ट किया कि यह अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ है न मानने वाला। इसे भारत में प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा कि भारत में सभी मुसलमानों के लिए जिहादी और पाकिस्तानी शब्द का प्रयोग किया जाता है, यह भी ठीक नहीं है। इससे भागवत सहमत दिखे और उन्होंने कहा कि इसे तत्काल रोका जाना चाहिए।
उन्होंने मुसलमानों से संवाद जारी रखने के लिए चार वरिष्ठ पदाधिकारियों को नामांकित भी किया। कुरैशी ने अपने लेख में उन्हें ‘एलीट’ ( कुलीन) कहने वाले ओवैसी पर तीखा कटाक्ष किया कि वो तो खुद महलों में रहते हैं।
संघ की मुसलमानों के साथ संवाद की इस पहल को कुछ लोग अभी संदेह की निगाहों से देख रहे हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा-
जो लोग मोहन भागवत से मिले हैं, उन्हें यह समझना होगा कि आरएसएस की वैचारिक स्थिति सत्ताधारी पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक लाइन के साथ है या नहीं। क्या वे तटस्थ, लचीले और बदलाव चाहने वाले हैं? इन मुद्दों पर समय आने पर ही कोई राय बनाई जा सकती है।’ ‘हम जानना चाहेंगे कि आरएसएस की फिलहाल स्थिति क्या है? हमें इसे पूर्वाग्रहों से नहीं बल्कि सहजता के साथ देखे जाने की जरूरत है।’
बेशक कई लोग इसे ‘प्रतीकात्मकता’ के रूप में देख रहे हैं, लेकिन यह आरंभ है और रास्ता काफी लंबा है, जो कई पड़ावों से गुजरेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में रहने वाले मुसलमान सौ फीसदी भारत का हिस्सा हैं। इसी संदर्भ में आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना था कि हम ऐसे तत्वों का समर्थन नहीं करते, जो मुसलमानों को पाकिस्तानी कहते हैं। हम ऐसे फ्रिंज तत्वों को खत्म करने की कोशिश करेंगे जो देश के माहौल को खराब करते हैं। लेकिन हमारे प्रयासों को मुस्लिम संगठनों और समुदाय के नेताओं की ओर से समान रूप से समर्थन मिलना चाहिए और उनकी तरफ से भी ऐसे कदम उठाने चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो ही हम आउटरीच को सफल कह सकते हैं।’
आरएसएस में आ रहे इस ‘बदलाव’ को लेकर सवाल
हालांकि कुछ लोग आरएसएस में आ रहे इस ‘बदलाव’ को लेकर आशंकित भी हैं। लेखक और पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने कहा, ‘लोकतंत्र में संवाद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन मोहन भागवत से मिलने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवियों और इमामों के प्रतिनिधिमंडल में से कोई भी पूरे भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। उल्टे उन्होंने सवाल किया कि क्या इस बैठक के बाद दोनों पक्षों ने अपनी स्थिति या रुख में बदलाव किया है?
नीलांजन का आशय था कि एकपक्षीय होकर काम नहीं चल सकता। इन सवालों के जवाब में आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने साफ किया कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का एक मस्जिद जाना और इमामों के एक संगठन के प्रमुख के साथ मुलाकात संघ की लाइन से अलग नहीं है। उन्होंने संघ प्रमुख की इस भेंट को ‘भारत जोड़ो यात्रा का असर’ बताने के लिए कांग्रेस की आलोचना की। मीडिया से उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने संघ की लाइन को गलत समझा है।
उधर बसपा नेत्री मायावती ने सवाल किया कि संघ प्रमुख के मस्जिद दौरे से क्या मुसलमानों के प्रति बीजेपी के नजरिए में बदलाव आएगा? हालांकि मायावती के इस बयान को यूपी में मुसलमानों के बीच अपनी पैठ कायम रखने की कोशिश से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। संघ प्रमुख इस तरह से समाज के सभी वर्गों के लोगों से मिलते रहते हैं। तमाम सवालों और शंकाओं के बीच हिंदू-मुसलमानों के बीच संवाद बढ़ाने की संघ की पहल अच्छी इस मायने में है कि परस्पर संवाद से ही शंकाएं दूर हो सकती हैं और अविश्वास पिघल सकता है।
सब कुछ बदल जाएगा, ऐसा भी नहीं है, लेकिन बदलाव चाहने वालों को संबल मिलेगा। यदि समाज के बिखरते ताने बाने को समय रहते संवाद के धागों से सिल दिया जाए तो देश को जोड़ने के लिए लंबी यात्राओं की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा तो खुद राजनीति ही है। यह रोड़ा कैसे, कौन और क्यों हटाएगा, यह यक्ष प्रश्न है।
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