Rahul Gandhi Statement On Narendra Modi
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राहुल के इसी आरोप को तमाम विपक्षी पार्टियों ने अपने ढंग से दोहराया। शिवसेना ( उद्धव) और ममता बैनर्जी ने कहा कि यदि फाइनल मैच मुंबई या कोलकाता में होता तो टीम रोहित हर हाल में जीतती। हालांकि इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि यदि ऐसा होता भी तो क्या पीएम मोदी वहां भी जाते और जाते तो नतीजा क्या अहमदाबाद से अलग आता? दबी जबान से यह आरोप भी सामने आए कि अहमदाबाद में भारतीय टीम की संभावित जीत को राजनीतिक श्रेय में बदलने की पूरी तैयारी थी, जिसे टीम कमिंस ने पहले ही ध्वस्त कर दिया।
कहा यह भी गया कि नमो स्टेडियम की जिस पिच नंबर पांच पर फाइनल मैच हुआ, उसी ने ऐन वक्त पर दगा दे दिया। वरना वर्ल्ड कप विजेता का सेहरा भारतीय टीम के सिर ही बंधता। चूंकि फाइनल नरेन्द्र मोदी के गृहराज्य अहमदाबाद के नमो स्टेडियम में रखा गया, पीएम वहां खुद मौजूद रहे, इसीलिए भारतीय टीम पर अनावश्यक मनोवैज्ञानिक दबाव बना, इसीलिए भारत विश्व विजेता बनते बनते रह गया। यानी कि छक्के के लिए मारा जाने वाला शॉट भी बाउंड्री पर कैच हो जाए तो वह हार की पनौती है। हालांकि टीम रोहित की हार के बावजूद प्रधानमंत्री ने ड्रेसिंग रूम में जाकर भारतीय खिलाडि़यों की हौसला अफजाई की सदाशयता जरूर दिखाई।
वैसे सुधि लोगों का मानना है कि नेताओं को खेलों से दूर ही रहना चाहिए। क्योंकि खेल से प्रतिष्ठा और पैसा मिल सकता है, वोट नहीं। वो चाहें तो जीत-हार के बाद खिलाडि़यों से मिल सकते हैं। दरअसल नेताओं के खिलाडि़यों को चीयर करने और आम खेल प्रेमियों के चीयर करने में बुनियादी फर्क यह है कि नेता चीयर करते- करते खुद ‘चीयरलीडर’ बनने का मोह नहीं टाल पाते। जबकि आम खेल प्रशंसक अपनी चहेती टीम को भी प्रभु के प्रसाद की तरह ही ग्रहण करता है।
इसलिए ‘राजनीतिक पनौती’ और साधारण ‘पनौती’ में फर्क है। पनौती दुर्भाग्य की धारणा को मूर्त रूप देने का दुराग्रह है। वह असल में एक लक्षित सिर है, जिस पर हार, अपयश अथवा विनाश का ठीकरा फोड़ा जा सकता है। वैसे यह काम भाजपा राहुल गांधी को लेकर बहुत पहले से करती आ रही है। लेकिन वह ‘पनौती’ शब्द के इस्तेमाल से बचती रही है।
अब राहुल ने (हालांकि वो हिंदी के इस देशज शब्द की मार को कितना ठीक से समझते हैं, पता नहीं) इसी ब्रह्मास्त्र का उपयोग अपने चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ किया। भाजपा इस आरोप से बिलबिला गई है और अब राजनीतिक शब्दावली में 'पनौती' कई प्लेटफार्मों और सोशल मीडिया में खूब ट्रेंड कर रहा है। प्रसिद्ध लेखिका मालती जोशी की एक कहानी है ‘मैं चुनौती हूं, पनौती नहीं।‘ इसमें नायिका अपने संघर्ष और दृढ़ संकल्प से आर्थिक संकटों से घिरे परिवार को बखूबी संभालती है, जबकि उसका पति और ससुराल वाले आर्थिक बदहाली के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराते हैं। कुछ राजनीतिक भाषा विज्ञानियों का मानना है कि चुनाव प्रचार में पीएम मोदी के लिए 'पनौती' का प्रयोग भाजपा द्वारा राहुल के लिए अब किए जाते रहे ‘पप्पू’ शब्द का सियासी जवाब है। जो दूसरा शब्द इन दिनो राजनीतिक स्क्रीन पर खूब ट्रेंड हुआ है और वो है ‘भौकाल।‘
इसके बारे में कहा जाता है कि यह उत्तर प्रदेश और खासकर लखनऊ और अवध के इलाके की बोली का शब्द है। भौकाल का अर्थ है बनावटी रूतबा.. मरतबा या हनक। जानकारों के मुताबिक भौकाल बनाया जाता है, मचाया जाता है और दिखाया भी जाता है। यानी खुद को बढ़ाचढ़ाकर पेश करने की कोशिश। दूसरे शब्दों में कहें तो भौकाल किसी शख्स का ऐसा जलवा है, जिसका निगेटिव एप्रिसियेशन किया जाता है। भाषा शास्त्री इसका अर्थ 'समय को संबोधित' (भो+काल) करने से जोड़ते हैं।
कहते हैं कि राजनीति में इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले स्व. मुलायम सिंह की बहू अपर्णा यादव ने एक दशक पहले तत्कालीन अखिलेश सरकार की कार्य शैली पर कटाक्ष के रूप में किया था। उन्होंने कहा था कि 'यूपी में तो बस भौकाल मंत्रालय चलता है। लोगों का अटेंशन अपनी ओर खींचना ही अगर भौकाल है तो अवश्य ही मैं भौकाली हूं।' अब इसी शब्द का उपयोग प्रियंका गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान किया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं ने मुझसे बड़ी गाड़ी में बैठने का अनुरोध किया। मैंने पूछा कि क्यों तो जवाब मिला कि दीदी आजकल भौकाल ( दिखावे) की राजनीति है। जनता की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है।
चुनाव प्रचार में ये दोनो शब्द जिस भी नीयत और समझ से इस्तेमाल किए गए हों, लेकिन ये हमारे देश की वर्तमान राजनीति और उसके चरित्र को बखूबी प्रतिबिम्बित करते हैं। दुर्भाग्य से सत्ता के खेल में आपसी कटुता और विद्वेष इस निचले स्तर तक पहुंच गया है कि असल खेल में हार जीत भी अब राजनीतिक पनौती का बायस है। दूसरी तरफ सियासत में 'भौकाल 'अब एक जरूरी फैक्टर बन चुका है। यह वास्तव में झूठ को सच के रैपर में लपेट कर जनता को बेचने का मार्केटिंग स्किल है। यक्ष प्रश्न उस जनता के सामने है कि वो किसे 'पनौती' माने और किसके 'भौकाल' को हकीकत समझे।
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