दुबई के उस शानदार ऑडिटोरियम में मुशायरे की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी, लेकिन इस बार ऐन मौके पर राहत इंदौरी नहीं आए। राहत साहब की शायरी पढ़ने के अंदाज पर मैं गजब फिदा था। वो एक अदद ऐसा लुटेरा था जो गजल पढ़ने से पहले ही मुशायरा लूट लेता था। शेर पढ़ने का उनका नाटकीय ढंग समां बांध देता था- ‘किसने दस्तक दी ये दिल पे, कौन है?
फिर राहत भाई इस लाइन को अपने खास अंदाज में एक-एक लफ्ज पर जोर देकर तीन बार दोहराते थे। फिर मुशायरे में थोड़ा समां बांधेंगे- ‘मैं शेर पढ़ कर बताता हूं मुन्नवर भाई आप सुन कर बताइएगा।’ फिर अगली लाइन में हाथ हिलाते हुए आपको चौकाएंगे-‘आप तो अंदर हैं, बाहर कौन है?’
इस तरह पब्लिक को किसी हुनरमंद मदारी की तरह खुश करके राहत भाई खूब तालियां बटोरते और मुशायरा लूट लेते थे, लेकिन उस बार वह दुबई नहीं आए।
मैं बहुत मायूस हुआ था। मेरे दुबई के दोस्त रेहान भाई ने बताया कि उनके जिस्म में शक्कर की गिनती अचानक इतनी बढ़ गई है कि डॉक्टर ने घर से निकलने से मना कर दिया। ये अफवाह नहीं पक्की खबर थी, क्योंकि इस मामले में राहत भाई अक्सर ये कह कर सब पर इलजाम लगाते हैं की ‘अफवाह थी कि मेरी तबियत खराब है/ लोगों ने पूछ-पूछ कर बीमार कर दिया।’ अरे भाई लोगों ने पूछ-
पूछ कर बीमार कर दिया कि आप खुद बे-परहेजी के शिकार हो गए।
पर मैं जानता हूं शायरों की दुकान ऐसे ही चलती है। कल शाम दफ्तर में ही था कि खबर आई कि राहत भाई नहीं रहे। ये मेरे लिए एक सदमे जैसा था।
मैंने मुंबई में अपने दोस्त आफताब भाई से पूछा- यूं अचानक कैसे? उन्होंने बताया कल रात में बात हुई, तो एकदम ठीक थे। लेकिन अभी खबर आई कि दिल ने धोखा दे दिया।
फेफड़े पहले से कमजोर हो चुके थे। ऊपर से चीनी वायरस का हमला। अक्सर मुशायरों में वह शेर की एक लाइन पढ़ते फिर सुनने वालों से बोलते- इसे संभाल लीजिएगा, अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा।
जब वह कोरोना के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए तो मुझे लगा उन्होंने डॉक्टर से भी जरूर कहा होगा- इसे संभाल लीजिएगा डाक्टर साहब ,अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा।
लखनऊ में उनसे एक दो बार की मुलाकात है। बहुत पहले अखबार के लिए उनका एक इंटरव्यू भी लिया था। जो तेवर उनकी शायरी में थे वही तेवर उनकी बातचीत के लहजे में थे। 'सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए। सोचता हूं कोई अखबार निकाला जाए।' मैंने उनके इस शेर के हवाले से पूछा कि अखबारों और सहाफियों (पत्रकारों) के बारे में आपके ख्यालात अच्छे नहीं हैं?