देश-विदेश में एक तरह की नैरेटिव को साबित करने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है कि कश्मीर में भारतीय सेना अत्याचार करती है
- फोटो : अमर उजाला
पुरस्कार तो केवल एक बहाना है। इसके पीछे के गहरी साजिश को समझने की आवश्यकता है। देश-विदेश में एक तरह की नैरेटिव को साबित करने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है तथा कश्मीर में भारतीय सेना अत्याचार करती है।
भारतीय सेना के खिलाफ लगातार तैयार हुए नैरेटिव भी इस तरह के प्रोपेगेंडा को बढ़ाने का काम करते हैं। वास्तव में यह नैरेटिव वह है जो पाकिस्तान की सूट करता है। अब इस 2020 पुलित्जर पुरस्कार को ही देख लें। इसके तहत भी उसी नैरेटिव को मजबूत करने के लिए इन फोटोग्राफरों को चयन किया गया है तथा उसके नीचे लिखे कैप्शन भी उसी नैरेटिव को आगे बढ़ाता है।
कश्मीर में ही आतंकवादियों द्वारा निर्दौष लोगों की हत्या की जाती है। उसके बाद उन परिवारों के लोग व बच्चों के रोते बिलखते फोटो भी खिंचा जाता है। क्या कभी इस तरह के फोटो के लिए भी किसी फोटो पत्रकार को कोई विदेशी संस्था द्वारा पुरस्कार मिला है ?
केवल वैसे ही फोटो को पुरस्कार मिलता है, जिसमें भारत व भारतीय सेना के छवि को धुमिल किया जाता है। इसी तरह देश के अनेक जिले नक्सलवाद प्रभावित हैं और नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में नक्सलवादियों के अत्याचार व निर्दौष लोगों को गला रेतकर हत्या करने की घटनाएं लगातार आती रहती हैं, लेकिन क्या कभी नक्सलवादियों के दमन व अत्याचारों के फोटो को किसी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान संस्था द्वारा पुरस्कार दिया गया है? इसका उत्तर है ‘नहीं’।
भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना अंतर्राष्ट्रीय संस्था की एक निहित मंशा है
- फोटो : अमर उजाला
यदि यह पुरस्कार निष्पक्ष रुप से दिया जाता तथा उसके पीछे पुरस्कार प्रदान करने वालों को किसी प्रकार की मंशा नहीं होती तो आतंकवादियों के काले कारनामों तथा नक्सलवादियों की अमानवीयता को उजागर करने वाले फोटो व फोटो पत्रकारों को भी निश्चित रुप से सम्मान प्रदान करती, लेकिन यहां पर अंतर्राष्ट्रीय संस्था निष्पक्ष नहीं है, बल्कि उसकी एक निहित मंशा है जो कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना।
पाकिस्तान समर्थक व भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाना ही इसका एक मात्र उद्देश्य है।
यहां पर एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि जम्मू के फोटो पत्रकार चन्नी आनंद को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनका एक फोटो भी इसमें शामिल है। इस फोटो में एक बीएसएफ जवान सीमा की ओर देख रहा है और नीचे कैप्शन में जम्मू को भारत का बताया गया है।
अब सवाल यह है कि चन्नी आनंद का ये फोटो उनके नैरेटिव को आगे नहीं बढ़ा रहा है। ऐसे में उन्हें क्यों यह पुरस्कार देने की घोषणा की गई। कोई इस पुरस्कार को भारत विरोधी प्रोपेगेंडा न कह दे, इसे बचने के लिए पुरस्कार प्रदान करने वाली संस्था ने आनंद को भी इसमें जोड़ दिया है, ताकि वह निष्पक्ष लग सके।
अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की सभी कहानी एक तरह की हैं। यह आज से नहीं बल्कि कई दशकों से चल रहा है। पुरस्कार देने के पीछे गहरी साजिश व राजनीति रहती है। इसका उदाहरण रमण मैैगसेसे सम्मान से लेकर अन्य तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय सम्मान हैं।
इनके माध्यम से भारत, भारतीय संस्कृति, भारतीयता विरोधी लोगों को प्रोजेक्ट किया जाता है और उसके बाद उन्हीं के माध्यम से भारत को नीचा दिखाने का काम किया जाता है। यह बड़ी गहरी व लंबी रणनीति का हिस्सा है। भारत के लोगों को इसके पीछे गहरी साजिश को समझने की आवश्यकता है।
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